ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १५१
जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा। उस समय श्रीराधाका विग्रह परम शान्त था। उनमें नम्रता आ गयी थी और उनके मुखपर मुस्कान छायी थी।
श्रीराधाने कहा—प्राणेश! आपके प्रसन्न मुखकमलको मुस्कराकर निहारनेवाली यह कल्याणी कौन है? इसके तिरछे नेत्र आपको लक्ष्य कर रहे हैं। इसके भीतर मिलनेच्छाका भाव जाग्रत् है। आपके मनोहर रूपने इसे अचेत कर दिया है। इसके सर्वाङ्ग पुलकित हो रहे हैं। वस्त्रसे मुख ढँककर बार-बार आपको देखा करना मानो इसका स्वभाव ही बन गया है। आप भी उसकी ओर दृष्टिपात करके मधुर-मधुर हँस रहे हैं। आप अनेक बार ऐसा करते हैं और कोमल-स्वभावकी स्त्री-जाति होनेके कारण प्रेमवश मैं क्षमा कर देती हूँ।
आपने 'विरजा' (रजोगुणरहिता देवी)-से प्रेम किया। फिर वह अपना शरीर त्यागकर महान् नदीके रूपमें परिणत हो गयी। आपकी सत्कीर्तिस्वरूपिणी वह देवी नदीरूपमें अब भी विराजमान है। आपके औरस पुत्रके रूपमें उससे समयानुसार सात समुद्र उत्पन्न हो गये। प्राणनाथ! आपने 'शोभा' से प्रेम किया। वह भी शरीर त्यागकर चन्द्रमण्डलमें चली गयी। तदनन्तर उसका शरीर परम स्निग्ध तेज बन गया। आपने उस तेजको टुकड़े-टुकड़े करके वितरण कर दिया। रत्न, सुवर्ण, श्रेष्ठ मणि, स्त्रियोंके मुखकमल, राजा, पुष्पोंकी कलियाँ, पके हुए फल, लहलहाती खेतियाँ, राजाओंके सजे-धजे महल, नवीन पात्र और दूध—ये सब आपके द्वारा उस शोभाके कुछ-कुछ भाग पा गये। मैंने आपको 'प्रभा' के साथ प्रेम करते देखा। वह भी शरीर त्यागकर सूर्यमण्डलमें प्रवेश कर गयी। उस समय उसका शरीर अत्यन्त तेजोमय बन गया था। उस तेजोमयी प्रभाको आपने विभाजन करके जगह-जगह बाँट दिया। श्रीकृष्ण! आपकी आँखोंसे दूर हुई प्रभा अग्नि, यक्ष, नरेश, देवता, वैष्णवजन, नाग, ब्राह्मण, मुनि, तपस्वी, सौभाग्यवती स्त्री तथा यशस्वी पुरुष—इन सबको थोड़े-थोड़े रूपोंमें प्राप्त हुई।
एक बार मैंने आपको 'शान्ति' नामक गोपीके साथ रासमण्डलमें प्रेम करते देखा था। प्रभो! वह शान्ति भी अपने उस शरीरको छोड़कर आपमें लीन हो गयी। उस समय उसका शरीर उत्तम गुणके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर आपने उसको विभाजित करके विश्वमें बाँट दिया। प्रभो! उसका कुछ अंश मुझ (राधा)-में, कुछ इस निकुञ्जमें और कुछ ब्राह्मणमें प्राप्त हुआ। विभो! फिर आपने उसका कुछ भाग शुद्ध सत्त्वस्वरूपा लक्ष्मीको, कुछ अपने मन्त्रके उपासकोंको, कुछ वैष्णवोंको, कुछ तपस्वियोंको, कुछ धर्मको और कुछ धर्मात्मा पुरुषोंको सौंप दिया।
पूर्वसमयकी बात है, 'क्षमा' के साथ आप मुझे प्रेम करते दृष्टिगोचर हुए थे। उस समय क्षमा अपना वह शरीर त्यागकर पृथ्वीपर चली गयी। तदनन्तर उसका शरीर उत्तम गुणके रूपमें परिणत हो गया था। फिर उसके शरीरका आपने विभाजन किया और उसमेंसे कुछ-कुछ अंश विष्णुको, वैष्णवोंको, धार्मिक पुरुषोंको, धर्मको, दुर्बलोंको, तपस्वियोंको, देवताओं और पण्डितोंको दे दिया। प्रभो! इतनी सब बातें तो मैं सुना चुकी। आपके ऐसे-ऐसे बहुत-से गुण हैं। आप सदा ही उच्च सुन्दरी देवियोंसे प्रेम किया करते हैं।
इस प्रकार रक्त कमलके समान नेत्रोंवाली राधाने भगवान् श्रीकृष्णसे कहकर साध्वी गङ्गासे कुछ कहना चाहा। गङ्गा योगमें परमप्रवीण थीं। योगके प्रभावसे राधाका मनोभाव उन्हें ज्ञात हो गया। अतः बीच सभामें ही अन्तर्धान होकर वे अपने जलमें प्रविष्ट हो गयीं। तब सिद्धयोगिनी