भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 810 में से

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पृष्ठ 162

१५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

राधाने योगद्वारा इस रहस्यको जानकर सर्वत्र विद्यमान उन जलस्वरूपिणी गङ्गाको अञ्जलिसे उठाकर पीना आरम्भ कर दिया। ऐसी स्थितिमें राधाका अभिप्राय पूर्ण योगसिद्धा गङ्गासे छिपा नहीं रह सका। अतः वे भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें जाकर उनके चरणकमलोंमें लीन हो गयीं।

तब राधाने गोलोक, वैकुण्ठलोक तथा ब्रह्मलोक आदि सम्पूर्ण स्थानोंमें गङ्गाको खोजा; परंतु कहीं भी वह दिखायी नहीं दीं। उस समय सर्वत्र जलका नितान्त अभाव हो गया था। कीचड़तक सूख गया था। जलचर जन्तुओंके मृत शरीरसे ब्रह्माण्डका कोई भी भाग खाली नहीं रहा था। फिर तो ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, अनन्त, धर्म, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, मनुगण, मुनि-समाज, देवता, सिद्ध और तपस्वी—सभी गोलोकमें आये। उस समय उनके कण्ठ, ओठ और तालू सूख गये थे। प्रकृतिसे परे सर्वेश भगवान् श्रीकृष्णको सबने प्रणाम किया; क्योंकि ये श्रीकृष्ण सबके परम पूज्य हैं। वर देना इन सर्वोत्तम प्रभुका स्वाभाविक गुण है। इन्हें वरका प्रवर्तक ही माना जाता है। ये परमप्रभु सम्पूर्ण गोप और गोपियोंके समाजमें प्रमुख हैं। इन्हें निरीह, निराकार, निर्लिप्त, निराश्रय, निर्गुण, निरुत्साह, निर्विकार और निरञ्जन कहा गया है। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये अपनी इच्छासे ये साकार रूपमें प्रकट हो जाते हैं। ये सत्त्वस्वरूप, सत्येश, साक्षीरूप और सनातनपुरुष हैं। इनसे बढ़कर जगत्में दूसरा कोई शासक नहीं है। अतएव इन पूर्णब्रह्म परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको उन ब्रह्मादि समस्त उपस्थित देवताओंने प्रणाम करके स्तवन आरम्भ कर दिया। भक्तिके कारण उनके कंधे झुक गये थे। उनकी वाणी गद्गद हो गयी थी। आँखोंमें आँसू भर आये थे। उनके सभी अङ्गोंमें पुलकावली छायी थी। सबने उन परात्पर ब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की। इन सर्वेश प्रभुका विग्रह ज्योतिर्मय है। सम्पूर्ण कारणोंके भी ये कारण हैं। ये उस समय अमूल्य रत्नोंसे निर्मित दिव्य सिंहासनपर विराजमान थे। गोपाल इनकी सेवामें संलग्न होकर श्वेत चँवर डुला रहे थे। गोपियोंके नृत्यको देखकर प्रसन्नताके कारण इनका मुखमण्डल मुस्कानसे भरा था। प्राणोंसे भी अधिक प्रिय श्रीराधा इनके वक्षःस्थलपर शोभा पा रही थीं। उनके दिये हुए सुवासित पान ये चबा रहे थे। ऐसे ये देवाधिदेव परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण रासमण्डलमें विराजमान थे।

वहीं मुनियों, मनुष्यों, सिद्धों और तपस्वियोंने तपके प्रभावसे इनके दिव्य दर्शन प्राप्त किये। दिव्य दर्शनसे सबके मनमें अपार हर्ष हुआ। साथ ही आश्चर्यकी सीमा भी न रही। सभी परस्पर एक-दूसरेको देखने लगे। तत्पश्चात् उन समस्त सज्जनोंने अपना अभीष्ट अभिप्राय जगत्प्रभु चतुरानन ब्रह्मासे निवेदन किया। ब्रह्माजी उनकी प्रार्थना सुनकर विष्णुको दाहिने और महादेवको बायें करके भगवान् श्रीकृष्णके निकट पहुँचे। उस समय परम आनन्दस्वरूप श्रीकृष्ण और परम आनन्दस्वरूपिणी श्रीराधा साथ विराजमान थीं। उसी समय ब्रह्माने रासमण्डलको केवल श्रीकृष्णमय देखा। सबकी वेश-भूषा एक समान थी। सभी एक-जैसे आसनोंपर बैठे थे। द्विभुज श्रीकृष्णके रूपमें परिणत सभीने हाथोंमें मुरली ले रखी थी। वनमाला सबकी छवि बढ़ा रही थी। सबके मुकुटमें मोरके पंख थे। कौस्तुभमणिसे वे सभी परम सुशोभित थे। गुण, भूषण, रूप, तेज, अवस्था और प्रभासे सम्पन्न उन सबका अत्यन्त कमनीय विग्रह परम शान्त था। सभी परिपूर्णतम थे और सबमें सभी शक्तियाँ संनिहित थीं। उन्हें देखकर कौन सेवक हैं और कौन सेव्य—इस बातका निर्णय करनेमें ब्रह्मा सफल नहीं हो सके।

क्षणभरमें ही भगवान् श्रीकृष्ण तेजःस्वरूप हो जाते और तुरंत आसनपर बैठे हुए भी दिखायी

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