भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

प्रकृतिखण्ड १५३


पड़ने लगते। एक ही क्षणमें उनके दो रूप निराकार और साकार ब्रह्माको दृष्टिगोचर हुए। फिर एक ही क्षणमें ब्रह्माजीने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अकेले हैं। इसके बाद तुरंत ही झट उन्हें राधा और कृष्ण प्रत्येक आसनपर बैठे दीख पड़े। फिर क्या देखते हैं कि भगवान् श्रीकृष्णने राधाका रूप धारण कर लिया है और राधाने श्रीकृष्णका। कौन स्त्रीके वेषमें है और कौन पुरुषके वेषमें—विधाता इस रहस्यको समझ न सके। तब ब्रह्माजीने अपने हृदयरूपी कमलपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान किया। ध्यान-चक्षुसे भगवान् दीख गये। अतः अनेक प्रकारसे परिहार करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् भगवान्‌की आज्ञासे उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं। फिर देखा तो श्रीराधाको वक्षःस्थलपर बैठाये हुए भगवान् श्रीकृष्ण आसनपर अकेले ही विराजमान हैं। इन्हें पार्षदोंने घेर रखा है। झुंड-की-झुंड गोपियाँ इनकी शोभा बढ़ा रही हैं। फिर उन ब्रह्मा प्रभृति प्रधान देवताओंने परम प्रभु भगवान्‌का दर्शन करके प्रणाम किया और स्तुति भी की। तब जो सबके आत्मा, सब कुछ जाननेमें कुशल, सबके शासक तथा सर्वभावन हैं, उन लक्ष्मीपति परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णने उपस्थित देवताओंका अभिप्राय समझकर उनसे कहा।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—ब्रह्मन्! आपकी कुशल हो, यहाँ आइये। मैं समझ गया, आप सभी महानुभाव गङ्गाको ले जानेके लिये यहाँ पधारे हैं; परंतु इस समय यह गङ्गा शरणार्थी बनकर मेरे चरणकमलोंमें छिपी है। कारण, वह मेरे पास बैठी थी। राधाजी उसे देखकर पी जानेके लिये उद्यत हो गयीं। तब वह चरणोंमें आकर ठहर गयी। मैं आपलोगोंको उसे सहर्ष दे दूँगा; परंतु आप पहले उसको निर्भय बनानेका पूर्ण प्रयत्न करें।

नारद! भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर कमलोद्भव ब्रह्माका मुख मुस्कानसे भर गया। फिर तो वे सम्पूर्ण देवता, जो सबकी आराध्या तथा भगवान् श्रीकृष्णसे भी सुपूजिता हैं, उन भगवती राधाकी स्तुति करनेमें संलग्न हो गये! भक्तिके कारण अत्यन्त विनीत होकर ब्रह्माजीने अपने चारों मुखोंसे राधाजीकी स्तुति की। चारों वेदोंके प्रणेता चतुरानन ब्रह्माने भगवती राधाका इस प्रकार स्तवन किया।

ब्रह्माजी बोले—देवी! यह गङ्गा आपके तथा भगवान् श्रीकृष्णके श्रीअङ्गसे समुत्पन्न है। आप दोनों महानुभाव रासमण्डलमें पधारे थे। शंकरके संगीतने आपको मुग्ध कर दिया था। उसी अवसरपर यह द्रवरूपमें प्रकट हो गयी। अतः आप तथा श्रीकृष्णके अङ्गसे समुत्पन्न होनेके कारण यह आपकी प्रिय पुत्रीके समान शोभा पानेवाली गङ्गा आपके मन्त्रोंका अभ्यास करके उपासना करे। इसके द्वारा आपकी आराधना होनी चाहिये। फलस्वरूप वैकुण्ठाधिपति चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि इसके पति हो जायँगे। साथ ही अपनी एक कलासे यह भूमण्डलपर भी पधारेगी और वहाँ भगवान्‌के अंश क्षारसमुद्रको इसका पति बननेका सुअवसर प्राप्त होगा। माता! यह गङ्गा जैसे गोलोकमें है, वैसे ही इसे सर्वत्र रहना