भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चाहिये। आप देवेश्वरी इसकी माता हैं और यह सदाके लिये आपकी पुत्री है।

नारद! ब्रह्माकी इस प्रार्थनाको सुनकर भगवती राधा हँस पड़ीं। उन्होंने ब्रह्माजीकी सभी बातोंको स्वीकार कर लिया। तब गङ्गा श्रीकृष्णके चरणके अँगूठेके नखाग्रसे निकलकर वहीं विराजमान हो गयी। सब लोगोंने उसका सम्मान किया। फिर जलस्वरूपा गङ्गासे उसकी अधिष्ठात्री देवी जलसे निकलकर परम शान्त विग्रहसे शोभा पाने लगी। ब्रह्माने गङ्गाके उस जलको अपने कमण्डलुमें रख लिया। भगवान् शंकरने उस जलको अपने मस्तकपर स्थान दिया। तत्पश्चात् कमलोद्भव ब्रह्माने गङ्गाको 'राधा-मन्त्र' की दीक्षा दी। साथ ही राधाके स्तोत्र, कवच, पूजा और ध्यानकी विधि भी बतलायी। ये सभी अनुष्ठानक्रम सामवेदकथित थे। गङ्गाने इन नियमोंके द्वारा राधाकी पूजा करके वैकुण्ठके लिये प्रस्थान किया।

मुने! लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और विश्वपावनी तुलसी—ये चारों देवियाँ भगवान् नारायणकी पत्नियाँ हैं। तत्पश्चात् परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने हँसकर ब्रह्माको दुर्बोध एवं अपरिचित सामयिक बातें बतलायीं।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— ब्रह्मन्! तुम गङ्गाको स्वीकार करो। विष्णो! महेश्वर! विधाता! मैं समयकी स्थितिका परिचय कराता हूँ; आपको ध्यान देकर सुनना चाहिये। तुमलोग तथा अन्य जो देवता, मुनिगण, मनु, सिद्ध और यशस्वी यहाँ आये हुए हैं, इन्हींको जीवित समझना चाहिये; क्योंकि गोलोकमें कालके चक्रका प्रभाव नहीं पड़ता। इस समय कल्प समास होनेके कारण सारा विश्व जलार्णवमें डूब गया है। विविध ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले जो ब्रह्मा आदि प्रधान देवता हैं, वे इस समय मुझमें विलीन हो गये हैं। ब्रह्मन्! केवल वैकुण्ठको छोड़कर और सब-का-सब जलमग्न है। तुम जाकर पुनः ब्रह्मलोकादिकी सृष्टि करो। अपने ब्रह्माण्डकी भी रचना करना आवश्यक है। इसके पश्चात् गङ्गा वहाँ जायगी। इसी प्रकार मैं अन्य ब्रह्माण्डोंमें भी इस सृष्टिके अवसरपर ब्रह्मादि लोकोंकी रचनाका प्रयत्न करता हूँ। अब तुम देवताओंके साथ यहाँसे शीघ्र पधारो। बहुत समय व्यतीत हो गया; तुमलोगोंमें कई ब्रह्मा समास हो गये और कितने अभी होंगे भी।

मुने! इस प्रकार कहकर परमाराध्या राधाके प्राणपति भगवान् श्रीकृष्ण अन्तःपुरमें चले गये। ब्रह्मा प्रभृति देवता वहाँसे चलकर यत्नपूर्वक पुनः सृष्टि करनेमें तत्पर हो गये। फिर तो गोलोक, वैकुण्ठ, शिवलोक और ब्रह्मलोक तथा अन्यत्र भी जिस-जिस स्थानमें गङ्गाको रहनेके लिये परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने आज्ञा दी थी, उस-उस स्थानके लिये उसने प्रस्थान कर दिया। भगवान् श्रीहरिके चरणकमलसे गङ्गा प्रकट हुई, इसलिये उसे लोग 'विष्णुपदी' कहने लगे। ब्रह्मन्! इस प्रकार गङ्गाके इस उत्तम उपाख्यानका वर्णन कर चुका। इस सारगर्भित प्रसङ्गसे सुख और मोक्ष सुलभ हो जाते हैं। अब पुनः तुम्हें क्या सुननेकी इच्छा है?

नारदने कहा— भगवन्! लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और जगत्को पावन बनानेवाली तुलसी—ये चारों देवियाँ भगवान् नारायणकी ही प्रिया हैं। यह प्रसङ्ग तथा गङ्गाके वैकुण्ठको जानेकी बात मैं आपसे सुन चुका; परंतु गङ्गा विष्णुकी पत्नी कैसे हुई, यह वृत्तान्त सुननेका सुअवसर मुझे नहीं मिला। उसे कृपया सुनाइये।

भगवान् नारायण बोले— नारद! जब गङ्गा वैकुण्ठमें चली गयी, तब थोड़ी देरके बाद जगत्की व्यवस्था करनेवाले ब्रह्मा भी उसके साथ ही वैकुण्ठ पहुँचे और जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिको प्रणाम करके कहने लगे।