भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

१६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भगवान् श्रीकृष्ण भी अन्तर्धान हो गये। गुरो! मैंने अपना वह शरीर त्याग दिया और अब इस भूमण्डलपर उत्पन्न हुई हूँ। सुन्दर विग्रहवाले शान्तस्वरूप भगवान् नारायणको मैं प्रियतम पतिरूपसे प्राप्त करनेके लिये वर माँग रही हूँ। आप मेरी अभिलाषा पूर्ण करनेकी कृपा करें।

ब्रह्माजी बोले—भगवान् श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट सुदामा नामक एक गोप भी इस समय राधिकाके शापसे भारतवर्षमें उत्पन्न है। उस परम तेजस्वी गोपको श्रीकृष्णका साक्षात् अंश कहते हैं। शापवश उसे दनुके कुलमें उत्पन्न होना पड़ा है। 'शङ्खचूड़' नामसे वह प्रसिद्ध है। त्रिलोकीमें कोई भी ऐसा नहीं है जो उससे बढ़कर हो। वह सुदामा इस समय समुद्रमें विराजमान है। भगवान् श्रीकृष्णका अंश होनेसे उसे पूर्वजन्मकी सभी बातें स्मरण हैं। सुन्दरि! शोभने! तुम भी पूर्वजन्मके सभी प्रसङ्गोंसे परिचित हो। इस जन्ममें वह श्रीकृष्णका अंश तुम्हारा पति होगा। इसके बाद शान्तस्वरूप भगवान् नारायण तुम्हें पतिरूपसे प्राप्त होंगे। लीलावश वे ही नारायण तुमको शाप दे देंगे। अतः अपनी कलासे तुम्हें वृक्ष बनकर भारतमें रहना पड़ेगा और समस्त जगत्को पवित्र करनेकी योग्यता तुम्हें प्राप्त होगी। सम्पूर्ण पुष्पोंमें तुम प्रधान मानी जाओगी। भगवान् विष्णु तुम्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानेंगे। तुम्हारे बिना पूजा निष्फल समझी जायगी। वृन्दावनमें वृक्षरूपसे रहते समय लोग तुम्हें 'वृन्दावनी' कहेंगे। तुमसे उत्पन्न पत्तोंसे गोपी और गोपोंद्वारा भगवान् माधवकी पूजा सम्पन्न होगी। तुम मेरे वरके प्रभावसे वृक्षोंकी अधिष्ठात्री देवी बनकर गोपरूपसे विराजनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके साथ स्वेच्छापूर्वक निरन्तर आनन्द भोगोगी।

नारद! ब्रह्माकी यह अमरवाणी सुनकर तुलसीके मुखपर हँसी छा गयी। उसके मनमें अपार हर्ष हुआ। उसने महाभाग ब्रह्माको प्रणाम किया और वह कहने लगी।

तुलसीने कहा—पितामह! मैं बिलकुल सच्ची बातें कहती हूँ—दो भुजासे शोभा पानेवाले श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णको पानेके लिये मेरी जैसी अभिलाषा है, वैसी चतुर्भुज श्रीविष्णुके लिये नहीं है; परंतु उन गोविन्दकी आज्ञासे ही मैं चतुर्भुज श्रीहरिके लिये प्रार्थना करती हूँ। ओह! वे गोविन्द मेरे लिये परम दुर्लभ हो गये हैं। भगवन्! आप ऐसी कृपा करें कि उन्हीं गोविन्दको मैं पुनः निश्चय ही प्राप्त कर सकूँ। साथ ही मुझे राधाके भयसे भी मुक्त कर दीजिये।

ब्रह्माजी बोले—देवी! मैं तुम्हारे प्रति भगवती राधाके षोडशाक्षर-मन्त्रका उपदेश करता हूँ। तुम इसे हृदयमें धारण कर लो। मेरे वरके प्रभावसे अब तुम राधाको प्राणके समान प्रिय बन जाओगी। सुभगे! भगवान् गोविन्दके लिये तुम वैसी ही प्रेयसी बन जाओगी जैसी राधा हैं।

मुने! इस प्रकार कहकर जगद्धाता ब्रह्माने तुलसीको भगवती राधाका षोडशाक्षर-मन्त्र बता दिया। साथ ही स्तोत्र, कवच, पूजाकी सम्पूर्ण विधियाँ तथा किस क्रमसे अनुष्ठान करना चाहिये—ये सभी बातें बतला दीं। तब तुलसीने भगवती राधाकी उपासना की और उनके कृपाप्रसादसे वह देवी राधाके समान ही सिद्ध हो गयी। मन्त्रके प्रभावसे ब्रह्माजीने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही फल तुलसीको प्राप्त हो गया। तपस्या-सम्बन्धी जो भी क्लेश थे, वे मनमें प्रसन्नता उत्पन्न होनेके कारण दूर हो गये; क्योंकि फल सिद्ध हो जानेपर मनुष्योंका दुःख ही उत्तम सुखके रूपमें परिणत हो जाता है।

(अध्याय १५)