ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
भगवान् श्रीकृष्ण भी अन्तर्धान हो गये। गुरो! मैंने अपना वह शरीर त्याग दिया और अब इस भूमण्डलपर उत्पन्न हुई हूँ। सुन्दर विग्रहवाले शान्तस्वरूप भगवान् नारायणको मैं प्रियतम पतिरूपसे प्राप्त करनेके लिये वर माँग रही हूँ। आप मेरी अभिलाषा पूर्ण करनेकी कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले—भगवान् श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट सुदामा नामक एक गोप भी इस समय राधिकाके शापसे भारतवर्षमें उत्पन्न है। उस परम तेजस्वी गोपको श्रीकृष्णका साक्षात् अंश कहते हैं। शापवश उसे दनुके कुलमें उत्पन्न होना पड़ा है। 'शङ्खचूड़' नामसे वह प्रसिद्ध है। त्रिलोकीमें कोई भी ऐसा नहीं है जो उससे बढ़कर हो। वह सुदामा इस समय समुद्रमें विराजमान है। भगवान् श्रीकृष्णका अंश होनेसे उसे पूर्वजन्मकी सभी बातें स्मरण हैं। सुन्दरि! शोभने! तुम भी पूर्वजन्मके सभी प्रसङ्गोंसे परिचित हो। इस जन्ममें वह श्रीकृष्णका अंश तुम्हारा पति होगा। इसके बाद शान्तस्वरूप भगवान् नारायण तुम्हें पतिरूपसे प्राप्त होंगे। लीलावश वे ही नारायण तुमको शाप दे देंगे। अतः अपनी कलासे तुम्हें वृक्ष बनकर भारतमें रहना पड़ेगा और समस्त जगत्को पवित्र करनेकी योग्यता तुम्हें प्राप्त होगी। सम्पूर्ण पुष्पोंमें तुम प्रधान मानी जाओगी। भगवान् विष्णु तुम्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानेंगे। तुम्हारे बिना पूजा निष्फल समझी जायगी। वृन्दावनमें वृक्षरूपसे रहते समय लोग तुम्हें 'वृन्दावनी' कहेंगे। तुमसे उत्पन्न पत्तोंसे गोपी और गोपोंद्वारा भगवान् माधवकी पूजा सम्पन्न होगी। तुम मेरे वरके प्रभावसे वृक्षोंकी अधिष्ठात्री देवी बनकर गोपरूपसे विराजनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके साथ स्वेच्छापूर्वक निरन्तर आनन्द भोगोगी।
नारद! ब्रह्माकी यह अमरवाणी सुनकर तुलसीके मुखपर हँसी छा गयी। उसके मनमें अपार हर्ष हुआ। उसने महाभाग ब्रह्माको प्रणाम किया और वह कहने लगी।
तुलसीने कहा—पितामह! मैं बिलकुल सच्ची बातें कहती हूँ—दो भुजासे शोभा पानेवाले श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णको पानेके लिये मेरी जैसी अभिलाषा है, वैसी चतुर्भुज श्रीविष्णुके लिये नहीं है; परंतु उन गोविन्दकी आज्ञासे ही मैं चतुर्भुज श्रीहरिके लिये प्रार्थना करती हूँ। ओह! वे गोविन्द मेरे लिये परम दुर्लभ हो गये हैं। भगवन्! आप ऐसी कृपा करें कि उन्हीं गोविन्दको मैं पुनः निश्चय ही प्राप्त कर सकूँ। साथ ही मुझे राधाके भयसे भी मुक्त कर दीजिये।
ब्रह्माजी बोले—देवी! मैं तुम्हारे प्रति भगवती राधाके षोडशाक्षर-मन्त्रका उपदेश करता हूँ। तुम इसे हृदयमें धारण कर लो। मेरे वरके प्रभावसे अब तुम राधाको प्राणके समान प्रिय बन जाओगी। सुभगे! भगवान् गोविन्दके लिये तुम वैसी ही प्रेयसी बन जाओगी जैसी राधा हैं।
मुने! इस प्रकार कहकर जगद्धाता ब्रह्माने तुलसीको भगवती राधाका षोडशाक्षर-मन्त्र बता दिया। साथ ही स्तोत्र, कवच, पूजाकी सम्पूर्ण विधियाँ तथा किस क्रमसे अनुष्ठान करना चाहिये—ये सभी बातें बतला दीं। तब तुलसीने भगवती राधाकी उपासना की और उनके कृपाप्रसादसे वह देवी राधाके समान ही सिद्ध हो गयी। मन्त्रके प्रभावसे ब्रह्माजीने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही फल तुलसीको प्राप्त हो गया। तपस्या-सम्बन्धी जो भी क्लेश थे, वे मनमें प्रसन्नता उत्पन्न होनेके कारण दूर हो गये; क्योंकि फल सिद्ध हो जानेपर मनुष्योंका दुःख ही उत्तम सुखके रूपमें परिणत हो जाता है।
(अध्याय १५)
प्रकृतिखण्ड १६५
तुलसीको स्वप्नमें शङ्खचूड़के दर्शन, शङ्खचूड़ तथा तुलसीके विवाहके लिये ब्रह्माजीका दोनोंको आदेश, तुलसीके साथ शङ्खचूड़का गान्धर्व-विवाह तथा देवताओंके प्रति उसके पूर्वजन्मका स्पष्टीकरण
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! एक समयकी बात है। वृषध्वजकी कन्या तुलसी अत्यन्त प्रसन्न होकर शयन कर रही थी। उसने स्वप्नमें एक सुन्दर वेषवाले पुरुषको देखा। वह पुरुष अभी पूर्ण नवयुवक था। उसके मुखपर मुस्कान छायी थी। उसके सम्पूर्ण अङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन था। रत्नमय आभूषण उसे सुशोभित कर रहे थे। उसके गलेमें सुन्दर माला थी। उसके नेत्र-भ्रमर तुलसीके मुख-कमलका रस-पान कर रहे थे।
मुने! यों स्वप्न देखनेके पश्चात् तुलसी जगकर विषाद करने लगी। इस प्रकार तरुण अवस्थासे सम्पन्न वह देवी वहीं रहकर समय व्यतीत कर रही थी। नारद! उसी समय महान् योगी शङ्खचूड़का बदरीवनमें आगमन हो गया। जैगीषव्यमुनिकी कृपासे भगवान् श्रीकृष्णका मनोहर मन्त्र उसे प्राप्त हो चुका था। उसने पुष्करक्षेत्रमें रहकर उस मन्त्रको सिद्ध भी कर लिया था। सर्वमङ्गलमय कवचसे उसके गलेकी शोभा हो रही थी। ब्रह्मा उसे अभिलषित वर दे चुके थे और उन्हींकी आज्ञासे वह वहाँ आया भी था। वह आ रहा था, तभी तुलसीकी दृष्टि उसपर पड़ गयी। उसकी सुन्दर कमनीय कान्ति थी। उसकी कान्ति श्वेत चम्पाके समान थी। रत्नमय अलंकारोंसे वह अलंकृत था। उसके मुखकी शोभा शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी तुलना कर रही थी। नेत्र ऐसे जान पड़ते थे, मानो शरत्कालके प्रफुल्ल कमल हों। दो रत्नमय कुण्डल उसके गण्डस्थलकी छवि बढ़ा रहे थे। पारिजातके पुष्पोंकी माला उसके गलेको सुशोभित कर रही थी और उसका मुखकमल मुस्कानसे भरा था। कस्तूरी और कुङ्कुमसे युक्त सुगन्धपूर्ण चन्दनद्वारा उसके अङ्ग अनुलिप्त थे। मनको मुग्ध कर देनेवाला वह शङ्खचूड़ अमूल्य रत्नोंसे बने हुए विमानपर विराजमान था।
इस शङ्खचूड़को देखकर तुलसीने वस्त्रसे अपना मुख ढँक लिया। कारण, लज्जावश उसका मुख नीचेकी ओर झुक गया था। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमा उसके निर्मल दिव्य चन्द्र-जैसे मुखके सामने तुच्छ थे। अमूल्य रत्नोंसे बने हुए नूपुर उसके चरणोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह मनोहर त्रिवलीसे सम्पन्न थी। सर्वोत्तम मणिसे निर्मित करधनी सुन्दर शब्द करती हुई उसकी कमरमें सुशोभित थी। मालतीके पुष्पोंकी मालासे सम्पन्न केश-कलाप उसके मस्तकपर शोभा पा रहे थे। उसके कानोंमें अमूल्य रत्नोंसे बने हुए मकराकृत कुण्डल थे। सर्वोत्तम रत्नोंसे निर्मित हार उसके वक्षःस्थलको समुज्ज्वल बना रहा था। रत्नमय कंकण, केयूर, शङ्ख और अँगूठियाँ उस देवीकी शोभा बढ़ा रही थीं। साध्वी तुलसीका आचरण अत्यन्त प्रशंसनीय था। ऐसे भव्य शरीरसे शोभा पानेवाली उस सुन्दरी तुलसीको देखकर शङ्खचूड़ उसके पास आकर बैठ गया और मीठे शब्दोंमें बोला।
शङ्खचूड़ने पूछा—देवि! तुम कौन हो? तुम्हारे पिता कौन हैं? तुम अवश्य ही सम्पूर्ण स्त्रियोंमें धन्यवाद एवं समादरकी पात्र हो। समस्त मङ्गल प्रदान करनेवाली कल्याणि! तुम वास्तवमें हो कौन? सदा सम्मान पानेवाली सुन्दरि! तुम अपना परिचय देनेकी कृपा करो।
नारद! सुन्दर नेत्रोंसे शोभा पानेवाली तुलसीने शङ्खचूड़के ऐसे वचनको सुनकर मुख नीचेकी ओर झुकाकर उससे कहना आरम्भ किया।
१६- शङ्खचूड़का पुष्पभद्रा नदीके तटपर जाना, वहाँ भगवान् शंकरके दर्शन तथा उनसे विशद वार्तालाप
१६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तुलसीने कहा—भद्रपुरुष! मैं राजा धर्मध्वजकी कन्या हूँ। तपस्या करनेके विचारसे इस तपोवनमें ठहरी हुई हूँ। तुम कौन हो? यहाँसे सुखपूर्वक चले जाओ; क्योंकि उच्च कुलकी किसी भी अकेली साध्वी कन्याके साथ एकान्तमें कोई भी कुलीन पुरुष बातचीत नहीं करता—ऐसा नियम मैंने श्रुतिमें सुना है। जो कलुषित कुलमें उत्पन्न है तथा जिसे धर्मशास्त्र एवं श्रुतिका अर्थ सुननेका कभी सुअवसर नहीं मिला, वह दुराचारी व्यक्ति ही कामी बनकर परस्त्रीकी कामना करता है। स्त्रीकी मधुर वाणीमें कोई सार नहीं रहता। वह सदा अभिमानमें चूर रहती है। वास्तवमें वह विषसे भरे हुए घड़ेके समान है, परंतु उसका मुख ऐसा जान पड़ता है मानो सदा अमृतसे भरा हो। संसाररूपी कारागारमें जकड़नेके लिये वह साँकल है। स्त्रीको इन्द्रजाल-स्वरूपा तथा स्वप्नके समान मिथ्या कहते हैं। बाहरसे तो यह अत्यन्त सुन्दरता धारण करती है, परंतु उसके भीतरके अङ्ग कुत्सित भावोंसे भरे रहते हैं। उसका शरीर विष्ठा, मूत्र, पीब और मल आदि नाना प्रकारकी दुर्गन्धपूर्ण वस्तुओंका आधार है। रक्तरंजित तथा दोषयुक्त यह शरीर कभी पवित्र नहीं रहता। सृष्टिकी रचनाके समय ब्रह्माने मायावी व्यक्तियोंके लिये इस मायास्वरूपिणी स्त्रीका सृजन किया है। मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंके लिये यह विषका काम करती है। अतः मोक्ष चाहनेवाले व्यक्ति उसे देखना भी नहीं चाहते।
नारद! शङ्खचूड़से इस प्रकार कहकर तुलसी चुप हो गयी। तब शङ्खचूड़ हँसकर कहने लगा।
शङ्खचूड़ने कहा—देवी! तुमने जो कुछ कहा है, वह असत्य नहीं है। पर अब मेरी कुछ सत्यासत्यमिश्रित बातें सुननेकी कृपा करो। विधाताने दो प्रकारकी स्त्रियोंका निर्माण किया है—वास्तव-स्वरूपा और दूसरी कृत्या-स्वरूपा। दोनों ही एक समान मनोहर होती हैं, पर एकको प्रशस्त कहते हैं और दूसरीको अप्रशस्त। लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री और राधिका—ये पाँच देवियाँ सृष्टिसूत्र हैं—सृष्टिकी मूल कारण हैं। इन आद्या देवियोंके प्रादुर्भावका प्रयोजन केवल सृष्टि करना है। इनके अंशसे प्रकट गङ्गा आदि देवियाँ वास्तव-रूपा कहलाती हैं। इनको श्रेष्ठ माना जाता है। ये यशःस्वरूपा और सम्पूर्ण मङ्गलोंकी जननी हैं। शतरूपा, देवहूति, स्वधा, स्वाहा, दक्षिणा, छायावती, रोहिणी, वरुणाणी, शची, कुबेरपत्नी, अदिति, दिति, लोपामुद्रा, अनसूया, कोटिवी, तुलसी, अहल्या, अरुन्धती, मेना, तारा, मन्दोदरी, दमयन्ती, वेदवती, गङ्गा, मनसा, पुष्टि, तुष्टि, स्मृति, मेधा, कालिका, वसुन्धरा, षष्ठी, मङ्गलचण्डी, धर्म-पत्नी मूर्ति, स्वस्ति, श्रद्धा, शान्ति, कान्ति, क्षमा, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, पिपासा, सन्ध्या, रात्रि, दिवा, सम्पत्ति, धृति, कीर्ति, क्रिया, शोभा, प्रभा और शिवा—स्त्रीरूपमें प्रकट ये देवियाँ प्रत्येक युगमें उत्तम मानी जाती हैं।
जो स्वर्गकी दिव्य अप्सराएँ हैं, वे कृत्या-स्वरूपा हैं, उन्हें अप्रशस्त कहा गया है। अखिल विश्वमें पुंश्चली-रूपसे ये विख्यात हैं। स्त्रियोंका जो सत्त्वप्रधान रूप है, वही स्वभावतः शुद्ध है; उसीको उत्तम माना जाता है। विश्वमें इन साध्वीरूपा स्त्रियोंकी प्रशंसा की गयी है। विद्वान् पुरुष कहते हैं, इन्हींको ‘वास्तव-रूपा’ जानना चाहिये। कृत्या स्त्रियोंके दो भेद हैं—रजोमय-रूपा और तमोमय-रूपा। सुन्दरि! जो रजोमय-रूपवाली स्त्रियाँ हैं, उनमें निम्नाङ्कित कारणोंसे ही साध्वीपन रहता है—परपुरुषसे मिलनेके लिये स्थानका न होना, अवसर न मिलना, किसी मध्यवर्ती दूत या दूतीका न होना, शरीरमें क्लेशका होना, रोगका होना, सत्सङ्गका लाभ होना, बहुत-से जनसमुदायद्वारा घिरी रहना तथा शत्रु अथवा राजासे भयका प्राप्त होना। इन्हीं कारणोंसे वे अपने सतीत्वकी रक्षा कर पाती हैं।
३०- विमानसे उतरकर शङ्खचूड़का भगवान्को भक्तिपूर्वक प्रणाम करना तथा शंकरजी, भद्रकाली और स्वामी कार्तिकेयका शङ्खचूड़को आशीर्वाद देना
प्रकृतिखण्ड १६७
मनीषी पुरुषोंका कथन है कि स्त्रियोंका यह रूप मध्यम है। जो तमोमय-रूपवाली स्त्रियाँ हैं, उन्हें कुमार्गपर जानेसे रोक पाना बहुत कठिन होता है। विद्वानोंके मतमें यह स्त्रियोंका अधम रूप है। देवि! तुमने जो कहा है, सत् और असत्का विचार रखनेवाले कुलीन पुरुष निर्जन, निर्जल अथवा एकान्त स्थानमें किसी परस्त्रीसे कुछ भी नहीं पूछते, सो ठीक है; मैं भी यही मानता हूँ। परंतु शोभने! मैं तो इस समय ब्रह्माकी आज्ञा पाकर ही तुम्हारे कार्यसाधनके लिये तुम्हारे पास आया हूँ और गान्धर्व-विवाहकी विधिके अनुसार तुम्हें अपनी सहधर्मिणी बनाऊँगा। देवताओंमें भगदड़ मचा देनेवाला शङ्खचूड़ मैं ही हूँ। दनुवंशमें मेरी उत्पत्ति हुई है। विशेष बात तो यह है कि मैं पूर्वजन्ममें श्रीहरिके साथ रहनेवाला उन्हींका अंश सुदामा नामक गोप था। जो सुप्रसिद्ध आठ गोप स्वयं भगवान्के पार्षद थे, उनमें एक मैं ही था। देवी राधिकाके शापसे इस समय मैं दानवेन्द्र बना हूँ। भगवान् श्रीकृष्णका मन्त्र मुझे इष्ट है, अतः पूर्वजन्मकी बातोंको मैं जान जाता हूँ। तुम भी पूर्वजन्ममें श्रीकृष्णके पास रहनेवाली तुलसी थी। यह जाननेकी योग्यता तो तुम्हें भी प्राप्त है। तुम भी जो भारतवर्षमें उत्पन्न हुई हो, इसमें मुख्य कारण श्रीराधिकाका रोष ही है।
मुनिवर! जब इस प्रकार कहकर शङ्खचूड़ चुप हो गया, उस समय तुलसीका मन हर्षसे उल्लसित हो उठा, उसके मुखपर मुसकराहट छा गयी। तब उसने यों कहना आरम्भ किया।
तुलसीने कहा—इस प्रकारके सद्विचारसे सम्पन्न विज्ञ पुरुष ही विश्वमें सदा प्रशंसित होते हैं। स्त्री ऐसे ही सत्पतिकी निरन्तर अभिलाषा करती है। सचमुच ही इस समय मैं आपके सद्विचारसे परास्त हो गयी। निन्दाका पात्र तथा अपवित्र तो वह पुरुष माना जाता है, जिसे स्त्रीने जीत लिया हो। स्त्रीजित मनुष्यकी तो पितर, देवता तथा बान्धव—सभी निन्दा करते हैं। यहाँ-तक कि माता, पिता तथा भ्राता भी मन-ही-मन तथा वाणीद्वारा भी उसकी निन्दा करनेसे नहीं चूकते। जिस प्रकार जन्म तथा मृत्युके अशौचमें ब्राह्मण दस दिनोंपर शुद्ध हो जाता है, क्षत्रिय बारह दिनोंपर और वैश्य पंद्रह दिनोंपर शुद्ध होते हैं तथा शूद्रोंकी शुद्धि एक महीनेपर होती है, वैसे ही गान्धर्व-विवाह-सम्बन्धी पति-पत्नीकी संतान भी समयानुसार शुद्ध हो जाती है। उसमें वर्णसंकर-दोष नहीं आ सकता। यह बात शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है। स्त्रीजित मनुष्यकी तो आजीवन शुद्धि नहीं होती। चितापर जलते समय ही वह इस पापसे मुक्त होता है। स्त्रीजित मनुष्यके पितर उसके दिये हुए पिण्ड और तर्पणको इच्छापूर्वक ग्रहण नहीं करते। देवता भी उसके समर्पण किये हुए पुष्प और जल आदिके लेनेमें सम्मत नहीं होते। जिसके मनको स्त्रीने हरण कर लिया है, उस व्यक्तिको ज्ञान, तप, जप, होम, पूजन, विद्या अथवा यशसे क्या लाभ हुआ? मैंने विद्याका प्रभाव जाननेके लिये ही आपकी परीक्षा की है। कारण, कामिनी स्त्रीका प्रधान कर्तव्य है कि कान्तकी परीक्षा करके ही उसे पतिरूपमें स्वीकार करे।
गुणहीन, वृद्ध, अज्ञानी, दरिद्र, मूर्ख, रोगी, कुरूप, परम क्रोधी, अशोभन मुखवाले, पङ्गु, अङ्गहीन, नेत्रहीन, बधिर, जड़, मूक तथा नपुंसकके समान पापी वरको जो अपनी कन्या देता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है। शान्त, गुणी, नवयुवक, विद्वान् तथा साधुस्वभाववाले वरको अपनी कन्या अर्पण करनेवाले पुरुषको दस अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। जो व्यक्ति कन्याको पाल-पोसकर विपत्तिवश अथवा धनके
१६८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
लोभसे बेच देता है, वह 'कुम्भीपाक' नरकमें पचता है*। उस पापीको नरकमें भोजनके स्थानपर कन्याके मल-मूत्र प्राप्त होते हैं। कीड़ों और कौओंंद्वारा उसका शरीर नोचा जाता है। बहुत लम्बे समयतक वह कुम्भीपाक नरकमें रहता है। फिर जगत्में जन्म पाकर उसका रोगग्रस्त रहना निश्चित है।
तपको ही सर्वस्व माननेवाले नारद! इस प्रकार कहकर देवी तुलसी चुप हो गयी।
इतनेमें ब्रह्माजीने आकर कहा—शङ्खचूड़!
तुम इस देवीके साथ क्या बातचीत कर रहे हो? अब गान्धर्व-विवाहके नियमानुसार इसे पत्नीरूपसे स्वीकार कर लेना तुम्हारे लिये परम आवश्यक है; क्योंकि तुम पुरुषोंमें रत्न हो और यह साध्वी देवी भी कन्याओंमें रत्न समझी जाती है। इसके बाद ब्रह्माजीने तुलसीसे कहा—'पतिव्रते! तुम ऐसे गुणी पतिकी क्या परीक्षा करती हो? देवता, दानव और असुर—सबको कुचल डालनेकी इसमें शक्ति है। जिस प्रकार भगवान् नारायणके पास लक्ष्मी, श्रीकृष्णके पास राधिका, मेरे पास सावित्री, भगवान् वाराहके पास पृथ्वी, यज्ञके पास दक्षिणा, अत्रिके पास अनसूया, नलके पास दमयन्ती, चन्द्रमाके पास रोहिणी, कामदेवके पास रति, कश्यपके पास अदिति, वसिष्ठके पास अरुन्धती, गौतमके पास अहल्या, कर्दमके पास देवहूति, बृहस्पतिके पास तारा, मनुके पास शतरूपा, अग्निके पास स्वाहा, इन्द्रके पास शची, गणेशके पास पुष्टि, स्कन्दके पास देवसेना तथा धर्मके पास साध्वी मूर्ति पत्नीरूपसे शोभा पाती हैं, वैसे ही तुम भी इस शङ्खचूड़की सौभाग्यवती प्रिया बन जाओ। शङ्खचूड़की मृत्युके पश्चात् तुम पुनः गोलोकमें भगवान् श्रीकृष्णके पास चली जाओगी और फिर वैकुण्ठमें चतुर्भुज भगवान् विष्णुको प्राप्त करोगी।†'
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! शङ्खचूड़ और तुलसीको इस प्रकार आशीर्वाद-रूपमें आज्ञा देकर ब्रह्माजी अपने लोकमें चले गये। तब शङ्खचूड़ने गान्धर्व-विवाहके अनुसार तुलसीको अपनी पत्नी बना लिया। उस समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। आकाशसे पुष्प बरसने लगे। तदनन्तर शङ्खचूड़ अपने भवनमें जाकर तुलसीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा।
अपनी चिरसङ्गिनी धर्मपत्नी परम सुन्दरी तुलसीके साथ आनन्दमय जीवन बिताते हुए राजाधिराज प्रतापी शङ्खचूड़ने दीर्घकालतक राज्य किया। देवता, दानव, असुर, गन्धर्व, किन्नर और राक्षस—सभी शङ्खचूड़के शासनकालमें सदा शान्त रहते थे। अधिकार छिन जानेके कारण देवताओंकी स्थिति भिक्षुक-जैसी हो गयी थी। अतः वे सभी अत्यन्त उदास होकर ब्रह्माकी सभामें गये और अपनी स्थिति बतलाकर बार-बार अत्यन्त विलाप
* यः कन्यापालनं कृत्वा करोति विक्रयं यदि। विपदा धनलोभेन कुम्भीपाकं स गच्छति॥
(प्रकृतिखण्ड १६। ९८)
† पश्चात् प्राप्स्यसि गोविन्दं गोलोके पुनरेव च। चतुर्भुजं च वैकुण्ठे शङ्खचूडे मृते सति॥
(प्रकृतिखण्ड १६। ११४)
प्रकृतिखण्ड
१६९
करने लगे। तब विधाता ब्रह्मा देवताओंको साथ लेकर भगवान् शंकरके स्थानपर गये। वहाँ पहुँचकर मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करनेवाले सर्वेश शिवसे सभी बातें कह सुनायीं। फिर ब्रह्मा और शंकर देवताओंको साथ लेकर वैकुण्ठके लिये प्रस्थित हुए। वैकुण्ठ परम धाम है। यह सबके लिये दुर्लभ है। वहाँ बुढ़ापा और मृत्युका प्रभाव नहीं है। भगवान् श्रीहरिके भवनका प्रवेशद्वार परम श्रेष्ठ है। वहाँ पहुँचकर रत्नमय सिंहासनपर बैठे हुए द्वारपालोंको जब देखा, तब इन ब्रह्मादि देवताओंका मन आश्चर्यसे भर गया। वे सभी परम सुन्दर थे। सभी पीताम्बर धारण किये हुए थे। रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। सबके गलेमें दिव्य वनमाला लहरा रही थी; सुन्दर शरीर श्याम रंगके थे। उनके शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मसे सुशोभित चार भुजाएँ थीं और प्रसन्न वदन मुस्कानसे भरे थे। उन मनोहर द्वारपालोंके नेत्र कमलके सदृश विशाल थे।
उन द्वारपालोंसे अनुमति पाकर ब्रह्मा क्रमशः सोलह द्वारोंको पार करके भगवान् श्रीहरिकी सभामें पहुँचे। उस सभाभवनमें चारों ओर देवर्षि तथा पार्षद विराजमान थे। सभी पार्षदोंके चार भुजाएँ थीं; सबका रूप भगवान् नारायणके समान था और सभी कौस्तुभमणिसे अलंकृत थे। वह सभा बाहरसे पूर्ण चन्द्रमण्डलके आकारकी गोल और भीतरसे चौकोर थी। बड़ी मनोहर दिखायी देती थी। श्रेष्ठ रत्नोंके सारभूत सर्वोत्तम दिव्य मणियोंसे उसका निर्माण हुआ था। हीरोंके सारभागसे ही वह सजी हुई थी। श्रीहरिके इच्छानुसार बने हुए उस भवनमें अमूल्य दिव्य रत्न जड़े गये थे। माणिक्य-मालाएँ जालीके रूपमें शोभा दे रही थीं और दिव्य मोतियोंकी झालरें उसकी छबि बढ़ा रही थीं। मण्डलाकार करोड़ों रत्नमय दर्पणोंसे वह सभा सुशोभित थी। उसकी दीवारोंमें लिखित अनेक प्रकारके विचित्र चित्र उसकी सुन्दरता बढ़ा रहे थे। सर्वोत्कृष्ट पद्मराग-मणिसे निर्मित कृत्रिम कमलोंसे वह परम सुशोभित थी। स्यमन्तकमणिसे बनी हुई सैकड़ों सीढ़ियाँ उस भवनकी शोभा बढ़ाती थीं। रेशमकी डोरीमें गूँथे हुए दिव्य चन्दन-वृक्षके सुन्दर पल्लव वन्दनवारका काम दे रहे थे। यहाँके खंभोंका निर्माण इन्द्रनील-मणिसे हुआ था। उत्तम रत्नोंसे भरे कलशोंसे संयुक्त वह सभा अत्यन्त मनोरम जान पड़ती थी। पारिजात-पुष्पोंके बहुत-से हार उसे अलंकृत किये हुए थे। कस्तूरी एवं कुङ्कुमसे युक्त सुगन्धपूर्ण चन्दनके द्रवसे वह भवन सुसज्जित तथा सुसंस्कृत किया गया था। सुगन्धित वायुसे वह सभा सब ओरसे सुवासित थी। उसका विस्तार एक सहस्र योजन था। सर्वत्र सेवक खड़े थे। वहाँ सभी कुछ दिव्य था। सभी उस सभाभवनको देखकर मुग्ध हो गये।
नारद! भगवान् श्रीहरि उस अनुपम सभाके मध्य भागमें इस प्रकार विराजमान थे मानो नक्षत्रोंके बीच चन्द्रमा हो। देवताओंसहित ब्रह्मा और शंकरने उनके साक्षात् दर्शन किये। उस समय श्रीहरि दिव्य रत्नोंसे निर्मित अद्भुत सिंहासनपर विराजित थे। दिव्य किरीट, कुण्डल और वनमालाने उनकी छबिको और भी अधिक बढ़ा दिया था। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त थे। एक हाथमें कमल शोभा पा रहा था। भगवान्का श्रीविग्रह अतिशय शान्त था। लक्ष्मीजी उनके चरणकमलोंकी सेवामें संलग्न थीं। भक्तके दिये हुए सुवासित ताम्बूलको प्रभु चबा रहे थे। देवी गङ्गा उत्तम भक्तिके साथ सफेद चँवर डुलाकर उनकी सेवा कर रही थीं। उपस्थित समाज अत्यन्त भक्तिविनम्र होकर उनका स्तव-गान कर रहा था।
१७- भगवान् शंकरऔर शङ्खचूड़के पक्षोंमें युद्ध, भद्रकालीका घोर युद्ध और आकाशवाणी सुनकर कालीका शङ्खचूड़पर पाशुपतास्त्र न चलाना
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मुने! ऐसे परम विशिष्ट परिपूर्णतम भगवान् श्रीहरिके दर्शन प्राप्त होनेपर ब्रह्मा प्रभृति समस्त भगवद्भक्त देवता भयभीत-से होकर भक्तिभावसे गर्दन झुकाये उन्हें प्रणाम करके स्तुति करने लगे। उस समय हर्षके कारण उनके सर्वाङ्गमें पुलकावली छा गयी थी, आँखोंमें आँसू भर आये थे और वाणी गद्गद थी। परम श्रद्धाके साथ उपासना करके जगत्के व्यवस्थापक ब्रह्माजीने हाथ जोड़कर बड़ी विनयके साथ भगवान् श्रीहरिके सामने सारी परिस्थिति निवेदित की। श्रीहरि सर्वत्र एवं सबके अभिप्रायसे पूर्ण परिचित हैं। ब्रह्माकी बात सुनकर उनके मुखपर हँसी छा गयी और उन्होंने मनको मुग्ध करनेवाला अद्भुत रहस्य कहना आरम्भ किया।
भगवान् श्रीहरि बोले—ब्रह्मन्! यह महान् तेजस्वी शङ्खचूड़ पूर्वजन्ममें एक गोप था। यह मेरा ही अंश था। मेरे प्रति इसकी अटूट श्रद्धा थी। इसके सम्पूर्ण वृत्तान्तसे मैं पूर्ण परिचित हूँ। यह वृत्तान्त एक पुराना इतिहास है। गोलोकसे सम्बन्ध रखनेवाले इस समस्त पुण्यप्रद इतिहासको सुनिये। शङ्खचूड़ उस समय सुदामा नामसे प्रसिद्ध गोप था। मेरे पार्षदोंमें उसकी प्रधानता थी। श्रीराधाके शापने उसे दानव-योनिमें उत्पन्न होनेके लिये विवश कर दिया।
राधा अति करुणामयी हैं। सखियोंका तिरस्कार करनेके कारण राधाने शाप तो दे दिया, परंतु जब सुदामा मुझे प्रणाम करके रोता हुआ सभाभवनसे बाहर जाने लगा, तब दयामयी राधा कृपावश तुरंत संतुष्ट हो गयीं। उनकी आँखोंमें आँसू भर आये। उन्होंने सुदामाको रोक लिया। कहा—'वत्स! रुके रहो, मत जाओ, कहाँ जाओगे?' तब मैंने उन राधाको समझाया और कहा—'सभी धैर्य रखें, यह सुदामा आधे क्षणमें ही शापका पालन करके पुनः लौट आयेगा।' 'सुदामन्! तुम यहाँ अवश्य आ जाना'—यों कहकर मैंने किसी प्रकार राधाको शान्त किया। अखिल जगत्के रक्षक ब्रह्मन्! गोलोकके आधे क्षणमें ही भूमण्डलपर एक मन्वन्तरका समय हो जाता है।
ब्रह्मन्! इस प्रकार यह सब कुछ पूर्वनिश्चित व्यवस्थाके अनुसार ही हो रहा है। अतः सम्पूर्ण मायाओंका पूर्ण ज्ञाता अपार बलशाली योगीश यह शङ्खचूड़ समयपर पुनः उस गोलोकमें ही चला जायगा। आपलोग मेरा यह त्रिशूल लेकर शीघ्र भारतवर्षमें चलें। शंकर मेरे त्रिशूलसे उस दानवका संहार करें। दानव शङ्खचूड़ मेरे ही सम्पूर्ण मङ्गल प्रदान करनेवाले कवचोंको कण्ठमें सदा धारण किये रहता है; इसीलिये वह अखिल विश्वविजयी है। ब्रह्मन्! उसके कण्ठमें कवच रहते हुए कोई भी उसे मारनेमें सफल नहीं हो सकता। अतः मैं ही ब्राह्मणका वेष धारण करके कवचके लिये उससे याचना करूँगा। साथ ही जिस समय उसकी स्त्रीका सतीत्व नष्ट होगा, उसी समय उसकी मृत्यु होगी—यह आपने उसको वर दे रखा है। एतदर्थ उसकी पत्नीके उदरमें मैं वीर्य स्थापित करूँगा—मैंने यह निश्चित कर लिया है। (वैसे 'तुलसी' मेरी नित्यप्रिया है, इससे वस्तुतः मुझ सर्वात्माको कोई दोष भी नहीं होगा।) उसी समय शङ्खचूड़की मृत्यु हो जायगी—इसमें कोई संदेह नहीं है। तदनन्तर उस दानवकी वह पत्नी अपने उस शरीरको त्यागकर पुनः मेरी प्रिय पत्नी बन जायगी।
नारद! इस प्रकार कहकर जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिने शंकरको त्रिशूल सौंप दिया। त्रिशूल लेकर रुद्र और ब्रह्मा सब देवताओंके साथ भारतवर्षको चल दिये।
(अध्याय १६)
प्रकृतिखण्ड १७१
पुष्पदन्तका दूत बनकर शङ्खचूड़के पास जाना और शङ्खचूड़के द्वारा तुलसीके प्रति ज्ञानोपदेश
**भगवान् नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर ब्रह्मा दानवके संहार-कार्यमें शंकरको नियुक्त करके स्वयं उसी क्षण अपने स्थानपर चले गये। देवता भी अपने-अपने स्थानोंको चले गये। तब चन्द्रभागा नदीके तटपर एक मनोहर वट-वृक्षके नीचे जाकर देवताओंका अभ्युदय करनेके विचारसे महादेवजीने आसन जमा लिया। गन्धर्वराज पुष्पदन्त शंकरका बड़ा प्रेमी था। उन्होंने उसे दूत बनाकर तुरंत हर्षपूर्वक शङ्खचूड़के पास भेजा। उनकी आज्ञा पाकर पुष्पदन्त उसी क्षण शङ्खचूड़के नगरकी ओर चल दिया। दानवराजकी पुरी अमरावतीसे भी श्रेष्ठ थी। कुबेरका भवन उसके सामने तुच्छ था। उस नगरकी लम्बाई दस योजन थी और चौड़ाई पाँच योजन। स्फटिक-मणिके समान रत्नोंसे बने हुए परकोटोंद्वारा वह घिरा था। सात दुर्गम खाइयोंसे वह सुरक्षित था। प्रज्वलित अग्निके समान निरन्तर चमकनेवाले करोड़ों रत्नोंद्वारा उसका निर्माण किया गया था। उसमें सैकड़ों सुन्दर सड़कें और मणिमय विचित्र वेदियाँ थीं। व्यापारकुशल पुरुषोंके द्वारा बनवाये हुए भवन और ऊँचे-ऊँचे महल चारों ओर सुशोभित थे, जिनमें नाना प्रकारकी बहुमूल्य वस्तुएँ भरी थीं। सिन्दूरके समान लाल मणियोंद्वारा बने हुए असंख्य, विचित्र, दिव्य एवं सुन्दर आश्रम उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे।
मुने! इस प्रकारके सुन्दर नगरमें जाकर पुष्पदन्तने शङ्खचूड़का भवन देखा। वह नगरके बिलकुल मध्यभागमें था। नगरकी आकृति वलयके समान गोल थी। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो पूर्ण चन्द्रमण्डल हो। प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान चार परिखाएँ उसे सुरक्षित किये हुए थीं। शत्रुओंके लिये उस भवनमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था, परंतु हितैषी व्यक्ति बड़ी सुगमतासे उसमें जा सकते थे। अत्यन्त उच्च, गगनस्पर्शी मणिमय प्राचीरोंसे वह भवन घिरा हुआ था। बारह द्वारोंसे भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी। प्रत्येक द्वारपर द्वारपाल थे। सर्वोत्तम मणियोंद्वारा निर्मित लाखों मन्दिर, बहुत-से सोपान तथा रत्नमय खंभे थे। एक द्वारको देखनेके बाद पुष्पदन्तने दूसरे प्रधान द्वारको भी देखा। उस द्वारपर हाथमें त्रिशूल लिये एक पुरुष विराजमान था। उसके मुखपर हँसी छायी थी। उसकी पीली आँखें थीं। उसके शरीरका रंग ताँबेके सदृश लाल था। भय उत्पन्न करनेवाले उस द्वारपालसे आज्ञा पाकर पुष्पदन्त आगे बढ़ा और दूसरे द्वारको लाँघकर भीतर चला गया। यह दूत युद्धकी सूचना पहुँचानेवाला है—यह सुनकर कोई भी उसे रोकता नहीं था। इस तरह नौ द्वारोंको लाँघकर पुष्पदन्त सबसे भीतरके द्वारपर पहुँच गया। वहाँ द्वारपालसे अनुमति लेकर वह भीतर गया। वहाँ जाकर देखा, परम मनोहर शङ्खचूड़ राजाओंके मध्यमें सुवर्णके सिंहासनपर बैठा था। उसके मस्तकपर सोनेका सुन्दर छत्र तना था, जिसे एक भृत्यने ले रखा था। उस छत्रमें मणियाँ जड़ी गयी थीं। वह विचित्र छत्र रत्नमय दण्डसे सुशोभित था। रत्ननिर्मित कृत्रिम पुष्प उसकी शोभाको और भी प्रशस्त कर रहे थे। सफेद एवं चमकीले चँवर हाथमें लेकर अनेक पार्षद शङ्खचूड़की सेवामें संलग्न थे। उत्तम वेष एवं रत्नमय भूषणोंसे विभूषित होनेके कारण वह बड़ा सुन्दर जान पड़ता था। मुने! उसके गलेमें माला थी। शरीरपर चन्दनका अनुलेपन था। वह दो महीन उत्तम वस्त्र पहिने हुए था। वह दानव उस समय सुन्दर वेषवाले असंख्य प्रसिद्ध दानवोंसे घिरा था और
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असंख्य दूसरे दानव हाथोंमें अस्त्र लिये इधर-उधर घूम रहे थे। ऐसे वैभव-सम्पन्न शङ्खचूड़को देखकर पुष्पदन्त आश्चर्यमें पड़ गया। तदनन्तर उसने शंकरके कथनानुसार युद्धविषयक संदेश सुनाना आरम्भ किया।
पुष्पदन्तने कहा—राजेन्द्र! प्रभो! मैं भगवान् शंकरका दूत हूँ। मेरा नाम पुष्पदन्त है। शंकरजीकी कही हुई बातें ही मैं यहाँ आपसे कह रहा हूँ, सुननेकी कृपा करें। अब आप देवताओंका राज्य तथा उनका अधिकार उन्हें लौटा दें; क्योंकि वे देवेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये थे। उन प्रभुने अपना त्रिशूल देकर आपके विनाशके लिये शंकरको भेजा है। त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव इस समय चन्द्रभागा नदीके तटपर वटवृक्षके नीचे विराजमान हैं। आप या तो देवताओंका राज्य लौटा दें या निश्चित रूपसे युद्ध करें। मुझे यह भी बता दें कि मैं भगवान् शंकरके पास जाकर उनको क्या उत्तर दूँ?
नारद! दूतके रूपमें गये हुए पुष्पदन्तकी बात सुनकर शङ्खचूड़ ठठाकर हँस पड़ा और बोला—'दूत! मैं कल प्रातःकाल चलूँगा, तुम जाओ।' तब पुष्पदन्त तुरंत वटके नीचे विराजमान भगवान् शंकरके पास लौट गया और उनसे शङ्खचूड़की बात, जो स्वयं उसने अपने मुखसे कही थी, कह सुनायी। साथ ही, उसके पास जो सेना आदि युद्धोपकरण थे, उनका भी परिचय दिया। इतनेमें योजनानुसार कार्तिकेय शंकरके समीप आ पहुँचे। वीरभद्र, नन्दीश्वर, महाकाल, सुभद्रक, विशालाक्ष, बाणासुर, पिङ्गलाक्ष, विकम्पन, विरूप, विकृति, मणिभद्र, बास्कल, कपिलाक्ष, दीर्घदंष्ट्र, विकट, ताम्रलोचन, कालंकट, बलीभद्र, कालजिह्व, कुटीचर, बलोन्मत्त, रणश्लाघी, दुर्जय, दुर्गम, आठों भैरव, ग्यारहों रुद्र, आठों वसु, इन्द्र आदि देवता, बारहों सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, दोनों अश्विनीकुमार, कुबेर, यमराज, जयन्त, नलकुबर, वायु, वरुण, बुध, मङ्गल, धर्म, शनि, ईशान और प्रतापी कामदेव आदि भी आ गये।
साथ ही, उग्रदंष्ट्रा, उग्रचण्डा, कोटरा, कैटभी तथा स्वयं सौ भुजावाली भयंकर भगवती भद्रकाली देवी भी वहाँ आ गयीं। वे देवी अतिशय श्रेष्ठ रत्नद्वारा निर्मित विमानपर बैठी थीं। उनका विग्रह लाल रंगके वस्त्रसे सुशोभित था। उनके गलेमें लाल पुष्पोंकी माला थी। सभी अङ्ग लाल चन्दनसे अनुलिप्त थे। नाचना, हँसना, हर्षके उल्लासमें भरकर मीठे स्वरोंमें गाना, भक्तोंको अभय प्रदान करना तथा शत्रुओंको डराना उन अभयस्वरूपिणी भगवती भद्रकालीका सहज गुण बन गया था। उनके मुखमें बड़ी विकराल लंबी जीभ लपलपा रही थी। शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, ढाल, तलवार, धनुष, बाण, एक योजन विस्तृत वर्तुलाकार गम्भीर खप्पर, गगनचुम्बी त्रिशूल, एक योजनमें फैली हुई शक्ति, मुद्गर, मुसल, वज्र, पाश, खेटक, प्रकाशमान फलक, वैष्णवास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र, नागपाश, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गन्धर्व, गरुड़, पार्जन्य एवं पाशुपतास्त्र, जृम्भणास्त्र, पार्वतास्त्र, माहेश्वरास्त्र, वायव्यास्त्र, सम्मोहन दण्ड, शतशः अमोघास्त्र तथा सैकड़ों दिव्यास्त्रको धारण करके भगवती भद्रकाली अनन्त योगिनियोंके साथ वहाँ आकर विराज गयीं। उनके साथमें अत्यन्त भयंकर असंख्य डाकिनियोंका यूथ भी सुशोभित था। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, वेताल, राक्षस, यक्ष और किन्नर भी सहयोग देनेके लिये आ पहुँचे। इन सबको साथ लेकर स्वामी कार्तिकेयने अपने पिता चन्द्रशेखर शिवको प्रणाम किया और सहायता करनेके विचारसे उनकी आज्ञा लेकर पास बैठ गये।
इधर दूतके चले जानेपर प्रतापी शङ्खचूड़ अन्तःपुरमें गया और उसने अपनी पत्नी तुलसीसे युद्धसम्बन्धी बातें बतायीं। सुनते ही तुलसीके होठ और तालु सूख गये। उसका हृदय संतप्त
१८- भगवान् शंकर और शङ्खचूड़का युद्ध, शंकरके त्रिशूलसे शङ्खचूड़का भस्म होना तथा सुदामा गोपके स्वरूपमें उसका विमानद्वारा गोलोक पधारना
प्रकृतिखण्ड १७३
हो उठा। फिर परम साध्वी तुलसी मधुर वाणीमें कहने लगी।
तुलसीने कहा—प्राणबन्धो! नाथ! आप मेरे प्राणोंके अधिष्ठाता देव हैं। आप विराजिये। क्षणभर मेरे जीवनकी रक्षा कीजिये। मैं अपने नेत्रोंसे कुछ समयतक तो आदरपूर्वक आपके दर्शन कर लूँ। मेरे प्राण फड़फड़ा रहे हैं। आज मैंने रातके अन्तिम क्षणमें एक बुरा स्वप्न देखा है।
महाराज शङ्खचूड़ ज्ञानी पुरुष था। तुलसीकी बात सुनकर उसने भोजन किया। जल पिया। फिर अवसर पाकर उसने सत्य, हितकर एवं यथार्थ वचन तुलसीसे कहे।
शङ्खचूड़ बोला—प्रिये! कर्म-भोगका सारा निबन्ध कालके सूत्रमें बँधा है। शुभ, हर्ष, सुख, दुःख, भय, शोक और मङ्गल—सभी कालके अधीन हैं। समयानुसार वृक्ष उगते, उनपर शाखाएँ फैलतीं, पुष्प लगते और क्रमशः वे फलसे लद जाते हैं। फिर काल ही उन फलोंको पकाता भी है। बादमें कालके प्रभावसे फूल-फलकर वे सम्पूर्ण वृक्ष नष्ट भी हो जाते हैं। सुन्दरि! समयपर विश्व उत्पन्न होता है और समयानुसार उसकी अन्तिम घड़ी आ जाती है। कालकी महिमा स्वीकार करके ब्रह्मा सृष्टि करते हैं और विष्णु पालनमें तत्पर रहते हैं। रुद्रका संहार-कार्य भी कालके संकेतपर ही निर्भर है। सभी क्रमशः कालानुसार अपने व्यापारमें नियुक्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि प्रधान देवताओंके भी अधीश्वर हैं—परमात्मा श्रीकृष्ण। जो प्रकृतिसे परे हैं, उन्हींको स्रष्टा, पाता और संहर्ता कहते हैं। वे सदा अपने सम्पूर्ण अंशसे विराजमान रहते हैं। वे ही समयपर स्वेच्छापूर्वक प्रकृतिको उत्पन्न करके विश्वमें रहनेवाले सम्पूर्ण चराचर पदार्थोंको रचते हैं। उन्हें सर्वेश, सर्वरूप, सर्वात्मा और परमेश्वर कहते हैं। वे जनसे जनकी सृष्टि करते, जनसे जनकी रक्षा करते तथा जनसे जनका संहार करते हैं, उन्हीं त्रिगुणातीत परम प्रभु राधावल्लभकी तुम उपासना करो। उन्हींकी आज्ञासे सदा शीघ्रगामी पवन प्रवाहित होते हैं, सूर्य आकाशमें तपते हैं, इन्द्र समयानुसार वर्षा करते हैं, मृत्यु प्राणियोंमें विचरती है, अग्नि यथावसर दाह उत्पन्न करते हैं तथा शीतल चन्द्रमा भयभीतकी भाँति आकाशमण्डलमें चक्कर लगाते हैं। प्रिये! जो मृत्युकी मृत्यु, कालके काल, यमराजके श्रेष्ठ शासक, ब्रह्माके स्वामी, माता-की-माता, जगत्की जननी तथा संहार करनेवालेके भी संहारकर्ता हैं, उन परम प्रभु भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें तुम जाओ। प्रिये! यहाँ कौन किनका बन्धु है! जो सबके बन्धु हैं, उन्हींकी तुम उपासना करो। ब्रह्माने हम दोनोंको एक रस्सीमें बाँध दिया। इससे तुम्हारे साथ जगत्के व्यवहारमें मैं फँस गया। पुनः विलग हो जाना विधिकी इच्छापर ही निर्भर है। शोक एवं विपत्ति सामने आनेपर अज्ञानी व्यक्ति घबराता है न कि पण्डित पुरुष। कालचक्रके क्रमसे सुख और दुःख एकके बाद एक आते-जाते ही रहते हैं। अब तुम्हें निश्चय ही वे सर्वेश भगवान् नारायण साक्षात् पतिरूपमें प्राप्त होंगे, जिनके लिये बदरिकाश्रममें रहकर तुम तपस्या कर चुकी हो। तपस्या तथा ब्रह्माके वर-प्रदानसे तुम्हें पानेका सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ था। कामिनि! उस समय तुम भगवान् श्रीहरिके लिये तप कर रही थी। अतः अब उन्हींको प्राप्त करोगी। गोलोकमें वृन्दावन है। वहीं तुम भगवान् गोविन्दको पाओगी। मैं भी इस दानवी शरीरका परित्याग करके उसी दिव्यलोकमें चलूँगा। वहीं तुम मुझे देख सकोगी और मैं तुम्हें। इस समय जो मैं परम दुर्लभ भारतवर्षमें आया हूँ, इसमें कारण केवल श्रीराधाजीका शाप है। प्रिये! सुनो! मेरा गोलोकमें पुनः जाना सर्वथा निश्चित है। अतः शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? कान्ते! तुम
१९- शङ्खचूड़-वेषधारी श्रीहरिद्वारा तुलसीका पातिव्रत्यभङ्ग, शङ्खचूड़का पुनः गोलोक जाना, तुलसी और श्रीहरिका वृक्ष एवं शालग्रामपाषाणके रूपमें भारतवर्षमें रहना तथा तुलसीमहिमा, शालग्रामके विभिन्न लक्षण तथा महत्त्वका वर्णन
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भी अब शीघ्र ही इस शरीरका परित्याग करके दिव्य रूप धारणकर श्रीहरिको पतिरूपसे प्राप्त कर लोगी। अतः तनिक भी घबरानेकी आवश्यकता नहीं है।
इस प्रकार शङ्खचूड़ तुलसीके साथ सुन्दर बातचीत कर रहा था, इतनेमें सायंकालका समय हो गया। रत्नमय भवनमें पुष्प और चन्दनसे चर्चित श्रेष्ठ शय्या बिछी थी। वह उसपर सो गया और भाँति-भाँतिके वैभवोंकी बात उसके मनमें स्फुरित होने लगी। उसके भवनमें रत्नका दीपक जल रहा था। परम सुन्दरी स्त्रियोंमें रत्न तुलसी सेवामें उपस्थित थी। ज्ञानी शङ्खचूड़ने पुनः तुलसीको दिव्य ज्ञान प्रदर्शित करते हुए समझाया। साथ ही शङ्खचूड़ने तुलसीको सम्पूर्ण शोकोंको दूर करनेवाले उस उत्तम ज्ञानको बतलाया जो दिव्य भाण्डीरवनमें भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे उसे प्राप्त हुआ था। ऐसे श्रेष्ठ ज्ञानको पाकर उस देवीका मुख प्रसन्नतासे भर गया। समस्त जगत् नश्वर है—यह मानकर वह हर्षपूर्वक हास-विलास करने लगी। फिर दोनों सुखपूर्वक सो गये। (अध्याय १७)
शङ्खचूड़का पुष्पभद्रा नदीके तटपर जाना, वहाँ भगवान् शंकरके दर्शन तथा उनसे विशद वार्तालाप
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! राजा शङ्खचूड़ श्रीकृष्णका भक्त था। वह मनमें भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करके ब्राह्ममुहूर्तमें ही अपनी पुष्पमयी शय्यासे उठ गया। उसने स्वच्छ जलसे स्नान करके रातके वस्त्र त्याग दिये। धुले हुए दो वस्त्रोंको पहनकर उज्ज्वल तिलक कर लिया; फिर इष्ट देवताके वन्दन आदि प्रतिदिनके आवश्यक कर्तव्योंको पूरा किया। दही, घृत, मधु और लाजा आदि माङ्गलिक वस्तुएँ देखीं। नारद! प्रतिदिनकी भाँति उसने भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको उत्तम रत्न, मणि, स्वर्ण और वस्त्र दान किये। यात्रा मङ्गलमयी होनेके लिये उसने अमूल्य रत्न तथा कुछ मोती, मणि एवं हीरे भी अपने गुरुदेव ब्राह्मणकी सेवामें समर्पित किये। वह अपने कल्याणार्थ श्रेष्ठ हाथी, घोड़े और सर्वोत्तम सुन्दर धन दरिद्र ब्राह्मणोंको खुले हाथों बाँटने लगा। उस समय हजारों वस्तुपूर्ण भवन, लाखों नगर तथा असंख्य गाँव शङ्खचूड़ने दानरूपमें ब्राह्मणोंको दिये। इसके बाद उसने अपने पुत्रको सम्पूर्ण दानवोंका राजा बनाकर उसे अपनी प्रेयसी पत्नी, राज्य, सम्पूर्ण सम्पत्ति, प्रजा एवं सेवकवर्ग, कोष तथा हाथी-घोड़े आदि वाहन सौंप दिये। उसने स्वयं कवच पहन लिया। हाथमें धनुष और बाण ले लिये। सब सैनिकोंको एकत्र किया। तीन लाख घोड़े और पाँच लाख उत्तम श्रेणीके हाथी उपस्थित हुए। दस हजार रथ तथा तीन-तीन करोड़ धनुर्धारी, ढाल-तलवारधारी और त्रिशूलधारी वीर उसकी सेनाके अङ्ग बने।
नारद! इस प्रकार दानवेश्वर शङ्खचूड़ने अपरिमित सेना सजा ली। युद्धशास्त्रके पारगामी एक महारथी वीरको सेनापतिके पदपर नियुक्त किया। महारथी उसे समझना चाहिये जो रथियोंमें श्रेष्ठ हो। राजा शङ्खचूड़ने उस महारथीको अगणित अक्षौहिणी सेनापर अधिकार प्रदान कर दिया। उस सेनाध्यक्षमें ऐसी योग्यता थी कि स्वयं तीस अक्षौहिणी सेनासे अपनी सेनाको बचा सकता था। तत्पश्चात् शङ्खचूड़ मन-ही-मन भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करता हुआ बाहर निकला। उत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानपर सवार हुआ और गुरुवरोंको आगे करके भगवान् शंकरकी सेवामें चल दिया।
३१- तुलसीके वचन सुनकर शापके भयसे श्रीहरिका लीलापूर्वक अपना सुन्दर स्वरूप प्रकट कर देना
प्रकृतिखण्ड
१७५
नारद! पुष्पभद्रा (या चन्द्रभागा) नदीके तटपर एक सुन्दर अक्षयवट है। वहीं सिद्धोंके बहुत-से आश्रम हैं। उस स्थानको सिद्धक्षेत्र कहा गया है। यह पवित्र स्थान भारतवर्षमें है। इसे कपिलमुनिकी तपोभूमि कहते हैं। यह पश्चिमी समुद्रसे पूर्व तथा मलयपर्वतसे पश्चिममें है, श्रीशैलपर्वतसे उत्तर तथा गन्धमादनसे दक्षिण भागमें है। इसकी चौड़ाई पाँच योजन है और लम्बाई पाँच सौ योजन। वहाँ भारतवर्षमें एक पुण्यप्रदा नदी बहती है। उसका जल स्वच्छ स्फटिकमणिके समान उद्भासित होता है। वह जलसे कभी खाली नहीं होती। उसे पुष्पभद्रा कहते हैं। वह नदी समुद्रकी पत्नीरूपसे विराजमान होकर सदा सौभाग्यवती बनी रहती है। वह शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल जलसे पूर्ण है। उसका उद्गम-स्थान हिमालय है। कुछ दूर आगे आनेपर शरावती नामकी नदी उसमें मिल गयी है। वह गोमन्तपर्वतको बायें करके बहती हुई पश्चिम समुद्रकी ओर प्रस्थान करती है। वहाँ पहुँचकर शङ्खचूड़ने भगवान् शंकरको देखा।
उस समय भगवान् शंकर वटवृक्षके नीचे विराजमान थे। उनका विग्रह करोड़ों सूर्योंके समान उद्भासित हो रहा था। वे योगासनसे बैठे थे, उनके हाथोंमें वर और अभयकी मुद्रा थी। मुखमण्डल मुस्कानसे भरा था। वे ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल थी। उनके हाथमें त्रिशूल और पट्टिश थे तथा शरीरपर श्रेष्ठ बाघम्बर शोभा पा रहा था। वस्तुतः गौरीके प्रिय पति भगवान् शंकर परम सुन्दर हैं। उनका शान्त विग्रह भक्तके मृत्युभयको दूर करनेमें पूर्ण समर्थ है। तपस्याका फल देना तथा अखिल सम्पत्तियोंको भरपूर रखना उनका स्वाभाविक गुण है। वे बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं। उनके मुखपर कभी उदासी नहीं आती। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। उन्हें विश्वनाथ, विश्वबीज, विश्वरूप, विश्वज, विश्वम्भर, विश्ववर और विश्वसंहारक कहा जाता है। वे कारणोंके कारण तथा नरकसे उद्धार करनेमें परम कुशल हैं। वे सनातन प्रभु ज्ञान प्रदान करनेवाले, ज्ञानके बीज तथा ज्ञानानन्द हैं। दानवराज शङ्खचूड़ने विमानसे उतरकर उनके दर्शन किये और सबके साथ सिर झुकाकर उन भगवान् शंकरको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। उस समय शंकरके वाम-भागमें भद्रकाली विराजित थीं और सामने स्वामिकार्तिकेय थे। इन तीनों महानुभावोंने शङ्खचूड़को आशीर्वाद दिया। उसे आया देखकर नन्दीश्वर प्रभृति सब-के-सब उठकर खड़े हो गये। तदनन्तर सबमें परस्पर सामयिक बातें आरम्भ हो गयीं। उनसे बातचीत करनेके पश्चात् राजा शङ्खचूड़ भगवान् शंकरके समीप बैठ गया। तब प्रसन्नात्मा भगवान् महादेव उससे कहने लगे।
**महादेवजीने कहा—**राजन्! ब्रह्मा अखिल जगत्के रचयिता हैं। वे धर्मज्ञ एवं धर्मके पिता हैं। उनके पुत्र मरीचि हैं। इनमें श्रीहरिके प्रति अपार श्रद्धा तथा धर्मके प्रति निष्ठा है। मरीचिने धर्मात्मा कश्यपको पुत्ररूपसे प्राप्त किया है। प्रजापति दक्षने प्रसन्नतापूर्वक अपनी तेरह कन्याएँ
१७६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
इन्हें सौंपी हैं। उन्हीं कन्याओंमें उस वंशकी वृद्धि करनेवाली परम साध्वी एक दनु है। दनुके चालीस पुत्र हैं, जिन्हें परम तेजस्वी दानव कहा जाता है। उन पुत्रोंमें बल एवं पराक्रमसे युक्त एक पुत्रका नाम विप्रचित्ति है। विप्रचित्तिके पुत्र दम्भ हैं। ये दम्भ धर्मात्मा, जितेन्द्रिय एवं वैष्णव पुरुष हैं। इन्होंने शुक्राचार्यको गुरु बनाकर भगवान् श्रीकृष्णके उत्तम मन्त्रका पुष्करक्षेत्रमें लाख वर्षतक जप किया था; तब तुम कृष्णपरायण श्रेष्ठ पुरुष उन्हें पुत्ररूपसे प्राप्त हुए हो। पूर्वजन्ममें तुम भगवान् श्रीकृष्णके पार्षद एक महान् धर्मात्मा गोप थे। गोपोंमें तुम्हारी महती प्रतिष्ठा थी। इस समय तुम श्रीराधिकाके शापसे भारतवर्षमें आकर दानवेश्वर बने हो। वैष्णव पुरुष ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सारी वस्तुओंको भ्रममात्र मानते हैं। उन्हें केवल भगवान् श्रीहरिकी सेवा ही अभीष्ट है। उसे छोड़कर वे सालोक्य, सार्ष्टि, सायुज्य और सामीप्य—इन चार प्रकारकी मुक्तियोंतकको दिये जानेपर भी स्वीकार नहीं करते। वैष्णवोंने ब्रह्मत्व या अमरत्वको भी तुच्छ माना है। इन्द्रत्व या कुबेरत्वको तो वे कुछ गिनते ही नहीं हैं। तुम वही परम वैष्णव श्रीकृष्ण-भक्त पुरुष हो; तुम्हारे लिये देवताओंका राज्य भ्रममात्र है। उसमें तुम्हारी क्या आस्था हो सकती है? राजन्! तुम देवताओंका राज्य उन्हें लौटा दो और मुझे आनन्दित करो। तुम अपने राज्यमें सुखसे रहो और देवता अपने स्थानपर रहें। भाई-भाईमें विरोधसे कोई लाभ नहीं है; तुम सब-के-सब एक ही पिता कश्यपजीके वंशज हो। ब्रह्महत्या आदिसे उत्पन्न हुए जितने पाप हैं, उनकी यदि जातिद्रोह-सम्बन्धी पापोंसे तुलना की जाय तो वे इनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते।
राजेन्द्र! यदि तुम अपनी सम्पत्तिकी हानि समझते हो तो भला, सोचो तो कौन ऐसे पुरुष हैं जिनकी सदा एक-सी स्थिति बनी रह सकी है? प्राकृतिक प्रलयके समय ब्रह्मा भी अन्तर्धान हो जाते हैं। परमेश्वरकी इच्छासे फिर उनका प्राकट्य हो जाता है। फिर तपस्यासे निश्चय ही उनमें पूर्ववत् ज्ञान, बुद्धि तथा लोककी स्मृतिका उदय होता है। फिर वे स्रष्टा ज्ञानपूर्वक क्रमशः सृष्टि करते हैं। राजन्! सत्ययुगमें धर्म अपने परिपूर्णतम रूपसे प्रतिष्ठित रहता है। उस समय सदा सत्य ही उसका आधार होता है। वही धर्म त्रेतामें तीन भागसे, द्वापरमें दो भागसे तथा कलिमें एक भागसे युक्त कहा जाता है। इन तीन युगोंमें उसका क्रमशः ह्रास होता है। अमावास्याके चन्द्रमाकी भाँति कलिके अन्तमें धर्मकी एक कलामात्र शेष रह जाती है। ग्रीष्म-ऋतुमें सूर्यका जैसा तेज रहता है, वैसा फिर शिशिर-ऋतुमें नहीं रह सकता। दिनमें भी दोपहरके समय जैसा उनका तेज होता है, वैसा प्रातःकाल और सायंकालमें नहीं रहता। सूर्य समयसे उदित होते हैं, फिर क्रमशः बाल एवं प्रचण्ड-अवस्थामें आकर अन्तमें पुनः अस्त हो जाते हैं। कालक्रमसे जब दुर्दिन (वर्षाका समय) आता है, तब उन्हें दिनमें ही छिप जाना पड़ता है। राहुसे ग्रस्त होनेपर सूर्य काँपने लगते हैं; पुनः थोड़ी देरके बाद प्रसन्नता आ जाती है।
राजन्! पूर्णिमाकी रातमें चन्द्रमा जैसे अपनी सभी कलाओंसे पूर्ण रहते हैं, वैसे ही सदा नहीं रहते। प्रतिदिन क्षीण होते रहते हैं। फिर अमावास्याके बाद वे प्रतिदिन पुष्ट होने लगते हैं। शुक्लपक्षमें वे शोभा-सम्पत्तिसे युक्त रहते और कृष्णपक्षमें क्षय-रोगसे पुनः म्लान हो जाते हैं। ग्रहणके अवसरपर उनकी शोभा नष्ट हो जाती है तथा दुर्दिन आनेपर अर्थात् मेघाच्छन्न आकाशमें वे नहीं चमक पाते। काल-भेदके अनुसार चन्द्रमा किसी समय शुद्ध-श्रीसम्पन्न होते हैं तो किसी
प्रकृतिखण्ड १७७
समय श्रीहीन हो जाते हैं। बलि भविष्यमें इन्द्र होंगे। यद्यपि इस समय श्रीहीन होकर ये सुतल-लोकमें स्थित हैं। समयपर विश्व नष्ट होते हैं और कालके प्रभावसे पुनः उनकी उत्पत्ति भी होती है। अखिल चराचर प्राणी कालकी प्रेरणाके अनुसार नष्ट और उत्पन्न होते हैं। केवल परमात्मा श्रीकृष्ण ही सम हैं; क्योंकि वे ही सबके ईश्वर हैं। उन्हींकी कृपासे मुझे भी 'मृत्युञ्जय' होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अतएव असंख्य प्राकृत प्रलयको मैंने देखा है और आगे भी मैं बार-बार देखूँगा। वे परमेश्वर ही प्रकृतिरूप हैं और उन्हींको पुरुष भी कहा जाता है। वे ही आत्मा और वे ही जीव हैं। वे नाना प्रकारके रूप धारण करके सदा कार्यमें संलग्न रहते हैं। जो सदा उनके नाम और गुणोंका कीर्तन करता है, वह काल, मृत्यु, जन्म, रोग तथा जराके भयको जीत लेता है। उन्हीं परमेश्वरने ब्रह्माको सृष्टिकर्ता, विष्णुको पालनकर्ता तथा मुझको संहारकर्ता बनाया है। उन्हींकी कृपासे हम सब लोग जगत्के शासक बने हैं। राजन्! इस समय मैं कालाग्निरुद्रको संहारके कार्यमें नियुक्त करके स्वयं उन परमेश्वरके नाम और गुणका निरन्तर कीर्तन करता हूँ। इसीसे मृत्यु मुझपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। इस ज्ञानकी महिमासे मैं सदा निर्भय रहता हूँ। मृत्यु भी मुझसे भय मानकर इस प्रकार भागती है, जैसे गरुड़के भयसे सर्प।
नारद! सर्वेश भगवान् शंकर सभाके मध्यभागमें उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये। तब दानवराजने उनके वचन सुनकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की, साथ ही मधुर वाणीमें विनयपूर्वक अपना भाषण आरम्भ किया।
शङ्खचूडने कहा—भगवन्! आपने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है। उसे कभी अन्यथा नहीं माना जा सकता; तथापि कुछ मेरी भी प्रार्थना है, उसे यथार्थतः सुननेकी कृपा करें। इस समय आपने यहाँ जातिद्रोहको जो महान् पाप बताया है, वह यदि देवताओंको मान्य है तो राजा बलिका सर्वस्व छीनकर उन्हें सुतललोकमें क्यों भेज दिया गया ? मैंने यह सारा ऐश्वर्य अपने पराक्रमसे प्राप्त किया है—दानवोंके पूर्ववैभवका उद्धार किया है। भगवान् गदाधर भी सुतललोकसे दानवसमाजको हटा देनेमें समर्थ नहीं हैं; क्योंकि वह उनका पैतृक स्थान है। यदि भाईके साथ द्रोह अनुचित है तो देवताओंने भाईसहित हिरण्याक्षकी हिंसा क्यों करवायी ? शुम्भ आदि असुरोंको देवताओंने क्यों मार गिराया ? पूर्वकालमें जब समुद्र मथा गया, उस समय अमृतका पान केवल देवताओंने किया; वे सम्पूर्ण फलके भागी हुए और हमें वहाँ केवल क्लेशका भागीदार बनाया गया। यह सारा विश्व परमात्मा श्रीकृष्णका क्रीड़ाक्षेत्र है। वे यहाँ जब जिसको देते हैं, उस समय उसीका ऐश्वर्यपर अधिकार होता है। देवताओं और दानवोंका ऐश्वर्यके निमित्त सदासे विवाद होता आया है। कालके अनुसार बारी-बारीसे कभी उनको और कभी हमलोगोंको जय अथवा पराजय प्राप्त होती रहती है। हम दोनोंके विरोधमें आपका आना निष्फल है; क्योंकि आप हम दोनोंके साथ समान सम्बन्ध रखनेवाले, बन्धु, ईश्वर एवं महात्मा हैं। हमलोगोंके साथ इस समय स्पर्धा रखना आपके लिये बड़ी लज्जाकी बात है और यदि कहीं युद्धमें आपकी पराजय हुई तो इससे भी अधिक आपकी अपकीर्ति फैलेगी।
मुने! शङ्खचूड़के ये वचन सुनकर भगवान् त्रिलोचन हँसने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने उस दानवेश्वरका समुचित उत्तर देना आरम्भ किया।
महादेवजी बोले—राजन्! तुमलोग भी तो ब्रह्माके ही वंशज हो। फिर तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें तो हमें क्या बड़ी लज्जा होगी और हारनेपर हमारी क्या भारी अपकीर्ति होगी? इसके पहले मधु और कैटभके साथ श्रीहरिका भी तो
| १७८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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युद्ध हो चुका है। राजन्! एक बार वे हिरण्याक्षसे लड़े थे और पुनः दूसरी बार हिरण्यकशिपुसे। स्वयं मैं भी इससे पूर्व त्रिपुर नामक दैत्योंके साथ युद्ध कर चुका हूँ। यही नहीं, किंतु प्राचीन समयमें जो सर्वेश्वरी एवं प्रकृति नामसे प्रसिद्ध भगवती जगदम्बा हैं, उनका शुम्भ आदि असुरोंके साथ अत्यन्त अद्भुत युद्ध हुआ था। तुम तो स्वयं परमात्मा श्रीकृष्णके अंश और उनके पार्षद हो। जो-जो दैत्य मारे गये हैं, उनमेंसे कोई भी तुम्हारे-जैसे बलवान् नहीं थे। फिर राजन्! तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें मुझे क्या लज्जा है? देवता भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये हैं। तभी उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। अतः देवताओंका राज्य तुम लौटा दो। बस, मेरे कहनेका इतना ही अभिप्राय है अथवा मेरे साथ प्रसन्नतासे लड़नेके लिये तैयार हो जाओ। अब अधिक शब्दोंके अपव्ययसे क्या प्रयोजन है?
नारद! जब इस प्रकार कहकर भगवान् शंकर चुप हो गये, तब शङ्खचूड़ भी अपने मन्त्रियोंके साथ तुरंत उठकर खड़ा हो गया। (अध्याय १८)
भगवान् शंकर और शङ्खचूड़के पक्षोंमें युद्ध, भद्रकालीका घोर युद्ध और आकाशवाणी सुनकर कालीका शङ्खचूड़पर पाशुपतास्त्र न चलाना
**भगवान् नारायण कहते हैं—**मुने! प्रतापी दानवराज शङ्खचूड़ सिर झुका भगवान् शिवको प्रणाम करके अपने मन्त्रियोंके साथ तत्काल विमानपर जा बैठा। दोनों दलोंमें युद्ध आरम्भ हो गया। दानव स्कन्दकी शक्तिसे निरन्तर पीड़ित होने लगे। उनमें हलचल मच गयी। इधर स्वर्गमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। उस भयंकर समराङ्गणमें ही स्कन्दके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। स्कन्दका युद्ध अत्यन्त अद्भुत और भयानक था। वह प्राकृतिक प्रलयकी भाँति दानवोंके लिये विनाशकारी सिद्ध हो रहा था। उसे देखकर विमानपर बैठे हुए राजा शङ्खचूड़ने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। राजाके बाण इस तरह गिर रहे थे, मानो मेघ जलकी धारा गिरा रहा हो। वहाँ घोर अन्धकार छा गया। फिर आग प्रकट होने लगी। यह देख नन्दीश्वर आदि सब देवता वहाँसे भाग चले। केवल कार्तिकेय ही युद्धके मुहानेपर डटे रहे। राजा शङ्खचूड़ पर्वतों, सर्पों, शिलाओं तथा वृक्षोंकी भयानक वृष्टि करने लगा। उसका वेग दुःसह था। राजाकी बाणवर्षासे शिवकुमार कार्तिकेय ढक गये, मानो सूर्यदेवपर स्निग्ध मेघमालाका आवरण पड़ गया हो। शङ्खचूड़ने स्कन्दके भयंकर एवं दुर्वह धनुषको काट दिया। दिव्य रथके टुकड़े-टुकड़े कर डाले तथा रथके घोड़ोंको भी मार गिराया। उनके मोरको दिव्यास्त्रसे मार-मारकर छलनी कर दिया। इसके बाद दानवेन्द्रने उनके वक्षःस्थलपर सूर्यके समान जाज्वल्यमान प्राणघातक शक्ति चलायी। उस शक्तिके आघातसे एक क्षणतक मूर्च्छित होनेके पश्चात् कार्तिकेय फिर सचेत हो गये। उन्होंने वह दिव्य धनुष हाथमें लिया, जिसे पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने प्रदान किया था। फिर रत्नेन्द्रसारसे निर्मित यानपर आरूढ़ हो अस्त्र-शस्त्र लेकर कार्तिकेय भयंकर युद्ध करने लगे। शिवकुमार स्कन्दने अपने दिव्यास्त्रसे क्रोधपूर्वक दानवराजके चलाये हुए समस्त पर्वतों, शिलाखण्डों, सर्पों और वृक्षोंको काट गिराया। उन प्रतापी वीरने पार्जन्यास्त्रके द्वारा आग बुझा दी और खेल-खेलमें ही शङ्खचूड़के रथ, धनुष, कवच, सारथि और उज्ज्वल किरीट-मुकुटको काट डाला। फिर उल्काके समान प्रकाशित होनेवाली अपनी शक्ति दानवराजके वक्षःस्थलपर दे मारी। उसके आघातसे राजा मूर्च्छित हो गया। फिर तुरंत ही होशमें आकर वह दूसरे रथपर जा चढ़ा और दूसरा धनुष हाथमें ले
२०- तुलसी-पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसी-स्तवनका वर्णन
प्रकृतिखण्ड १७९
लिया। नारद! शङ्खचूड़ मायावियोंका शिरोमणि था। उसने मायासे उस युद्धभूमिमें बाणोंका जाल बिछा दिया और उसके द्वारा कार्तिकेयको ढककर सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित होनेवाली एक अमोघ शक्ति हाथमें ली। भगवान् विष्णुके तेजसे व्याप्त हुई वह शक्ति प्रलयाग्निकी शिखाके समान जान पड़ती थी। दानवराजने उसे क्रोधपूर्वक कार्तिकेयके ऊपर बड़े वेगसे दे मारा। वह शक्ति उनके शरीरपर प्रज्वलित अग्निकी राशिके समान गिरी। महाबली कार्तिकेय उस शक्तिसे आहत हो मूर्च्छित हो गये। तब काली उन्हें गोदमें उठाकर भगवान् शिवके पास ले गयी।
शिवने लीलापूर्वक ज्ञान-बलसे उन्हें जीवित कर दिया। साथ ही असीम बल प्रदान किया। प्रतापी वीर कार्तिकेय तत्काल उठकर खड़े हो गये। उसी क्षण भगवान् शंकरने अपनी सेना तथा देवताओंको युद्धके लिये प्रेरित किया। सेनासहित दानवराजोंके साथ देवताओंका युद्ध पुनः प्रारम्भ हुआ। स्वयं देवराज इन्द्र वृषपर्वाके साथ युद्ध करने लगे। सूर्यदेवने विप्रचित्तिके साथ युद्ध छेड़ दिया। चन्द्रमा दम्भके साथ भिड़ गये और बड़ा भारी युद्ध करने लगे। कालने कालेश्वरके साथ और अग्निदेवने गोकर्णके साथ जूझना आरम्भ किया। कालकेयसे कुबेर और मयासुरसे विश्वकर्मा लड़ने लगे। मृत्युदेवता भयंकर नामक दानवसे और यम संहारके साथ भिड़ गये। कलविङ्क और वरुणमें, चञ्चल और वायुमें, बुध और घृतपृष्ठमें तथा रक्ताक्ष और शनैश्चरमें युद्ध होने लगा। जयन्तने रत्नसारका सामना किया। वसुगण और वर्चोगण परस्पर जूझने लगे। दीप्तिमान्के साथ अश्विनीकुमार और धूम्रके साथ नलकूबरका युद्ध आरम्भ हुआ। धर्म और धनुर्धर, मङ्गल और मण्डूकाक्ष, शोभाकर और ईशान तथा पीठर और मन्मथ एक-दूसरेका सामना करने लगे। उल्कामुख, धूम्र, खड्गध्वज, काञ्चीमुख, पिण्ड, धूम्र, नन्दी, विश्व और पलाश—इन सबके साथ आदित्यगण घोर युद्ध करने लगे। ग्यारह महारुद्रगण ग्यारह भयंकर दानवोंके साथ भिड़ गये। उग्रदण्डा आदि और महामारीमें युद्ध होने लगा। नन्दीश्वर आदि समस्त रुद्रगण दानवगणोंके साथ लड़ने लगे। वह महान् युद्ध प्रलयकालके समान भयंकर जान पड़ता था। उस समय भगवान् शंकर काली और पुत्रके साथ वटवृक्षके नीचे ठहरे हुए थे। मुने! शेष समस्त सैन्यसमुदाय निरन्तर युद्धमें तत्पर थे। शङ्खचूड़ रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो करोड़ों दानवोंके साथ रमणीय रत्नमय सिंहासनपर विराजमान था। उस युद्धमें भगवान् शंकरके समस्त योद्धा पराजित हो गये। समस्त देवता क्षत-विक्षत हो भयके मारे भाग चले।
यह देख भगवान् स्कन्दको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने देवताओंको अभय दान दिया और अपने तेजसे आत्मीय गणोंका बल बढ़ाया। वे स्वयं भी दानवगणोंके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने समराङ्गणमें दानवोंकी सौ अक्षौहिणी सेनाका संहार कर डाला। कमलोचना कालीने कुपित हो खप्पर गिराना आरम्भ किया। वे दानवोंके सौ-सौ खप्पर खून एक साथ पी जाती थीं। लाखों हाथी और घोड़ोंको एक ही हाथसे समेटकर लीलापूर्वक लील जाती थीं। मुने! समरभूमिमें सहस्रों कबन्ध (बिना सिरके धड़) नृत्य करने लगे। स्कन्दके बाण-समूहोंसे क्षत-विक्षत हुए महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न सभी दानव भयके मारे भाग चले। वृषपर्वा, विप्रचित्ति, दम्भ और विकङ्कन—ये सब बारी-बारीसे स्कन्दके साथ युद्ध करने लगे। अब कालीने समराङ्गणमें प्रवेश किया। भगवान् शिव कार्तिकेयकी रक्षा करने लगे। नन्दीश्वर आदि वीर कालीके ही पीछे-पीछे गये। समस्त देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, किन्नर, बहुत-से राज्यभाण्ड और करोड़ों मेघ भी उन्हींके साथ थे। संग्राममें पहुँचकर
| १८० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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कालीने सिंहनाद किया। देवीके उस सिंहनादसे दानव मूर्च्छित हो गये। कालीने बारंबार दैत्योंके लिये अमङ्गलसूचक अट्टहास किया। वे युद्धके मुहानेपर हर्षपूर्वक मधु पीने और नृत्य करने लगीं। उग्रदंष्ट्रा, उग्रचण्डा और कौट्टरी भी मधु-पान करने लगीं। योगिनियों और डाकिनियोंके गण तथा देवगण आदि भी इस कार्यमें योग देने लगे। कालीको उपस्थित देख शङ्खचूड़ तुरंत रणभूमिमें आ पहुँचा। दानव डरे हुए थे। दानवराजने उन सबको अभय दान दिया। कालीने प्रलयाग्निकी शिखाके समान अग्नि फेंकना आरम्भ किया, परंतु राजा शङ्खचूड़ने पार्जन्यास्त्रके द्वारा उसे अवहेलनापूर्वक बुझा दिया। तब कालीने तीव्र एवं परम अद्भुत वारुणास्त्र चलाया। परंतु दानवेन्द्रने गान्धर्वास्त्र चलाकर खेल-खेलमें ही उसे काट डाला। तदनन्तर कालीने अग्निशिखाके समान तेजस्वी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, किंतु राजा शङ्खचूड़ने वैष्णवास्त्रका प्रयोग करके उस अस्त्रको अवहेलनापूर्वक शीघ्र शान्त कर दिया। तब देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक नारायणास्त्र चलाया। उसे देखते ही राजा रथसे उतर पड़ा और उस नारायणास्त्रको प्रणाम करने लगा। शङ्खचूड़ने दण्डकी भाँति भूमिपर पड़कर भक्तिभावसे नारायणास्त्रको साष्टाङ्ग प्रणाम किया। तब प्रलयाग्निकी शिखाके समान तेजस्वी वह अस्त्र ऊपरको चला गया। तदनन्तर कालीने मन्त्रके साथ यत्नपूर्वक ब्रह्मास्त्र चलाया; किंतु महाराज शङ्खचूड़ने अपने ब्रह्मास्त्रसे उसे शान्त कर दिया। फिर तो देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक बड़े-बड़े दिव्यास्त्र चलाये। परंतु राजाने अपने दिव्यास्त्रोंसे उन सबको शान्त कर दिया। इसके बाद देवीने बड़े यत्नसे शक्तिका प्रहार किया, जो एक योजन लंबी थी। परंतु दानवराजने अपने तीखे अस्त्रोंके समूहसे उसके सौ टुकड़े कर डाले। तब देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक पाशुपतास्त्रको हाथमें उठा लिया और उसे चलाना ही चाहती थीं कि उन्हें मना करती हुई यह स्पष्ट आकाशवाणी हुई—'यह राजा एक महान् पुरुष है, इसकी मृत्यु पाशुपतास्त्रसे कदापि नहीं होगी। जबतक यह अपने गलेमें भगवान् श्रीहरिके मन्त्रका कवच धारण किये रहेगा और जबतक इसकी पतिव्रता पत्नी अपने सतीत्वकी रक्षा करती रहेगी, तबतक इसके समीप जरा और मृत्यु अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकती—यह ब्रह्माका वर है।'
इस आकाशवाणीको सुनकर भगवती भद्रकालीने शस्त्र चलाना बंद कर दिया। अब वे क्षुधातुर होकर करोड़ों दानवोंको लीलापूर्वक निगलने लगीं। भयंकर वेषवाली वे देवी शङ्खचूड़को खा जानेके लिये बड़े वेगसे उसकी ओर झपटीं। तब दानवने अपने अत्यन्त तेजस्वी दिव्यास्त्रसे उन्हें रोक दिया। भद्रकाली अपनी सहयोगिनी योगिनियोंके साथ भाँति-भाँतिसे दैत्यदलका विनाश करने लगीं। उन्होंने दानवराज शङ्खचूड़को भी बड़ी चोट पहुँचायी, पर वे दानवराजका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकीं। तब वे भगवान् शंकरके पास चली गयीं और उन्होंने आरम्भसे लेकर अन्ततक क्रमशः युद्ध-सम्बन्धी सभी बातें भगवान् शंकरको बतलायीं। दानवोंका विनाश सुनकर भगवान् हँसने लगे।
भद्रकालीने यह भी कहा—'अब भी रणभूमिमें लगभग एक लाख प्रधान दानव बचे हुए हैं। मैं उन्हें खा रही थी, उस समय जो मुखसे निकल गये, वे ही बच रहे हैं। फिर जब मैं संग्राममें दानवराज शङ्खचूड़पर पाशुपतास्त्र छोड़नेको तैयार हुई और जब आकाशवाणी हुई कि यह राजा तुमसे अवध्य है, तबसे महान् ज्ञानी एवं असीम बल-पराक्रमसे सम्पन्न उस दानवराजने मुझपर अस्त्र छोड़ना बंद कर दिया। वह मेरे छोड़े हुए बाणोंको काट भर देता था। (अध्याय १९)
प्रकृतिखण्ड १८१ भगवान् शंकर और शङ्खचूड़ का युद्ध, शंकरके त्रिशूलसे शङ्खचूड़का भस्म होना तथा सुदामा गोपके स्वरूपमें उसका विमानद्वारा गोलोक पधारना भगवान् नारायण कहते हैं- नारद ! भगवान् शिव तत्त्व जाननेमें परम प्रवीण हैं। भद्रकालीद्वारा युद्धकी सारी बातें सुनकर वे स्वयं अपने गणोंके साथ संग्राममें पहुँच गये। उन्हें देखकर शङ्खचूड़ विमानसे उतर गया और उसने परम भक्तिके साथ पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। यों भक्तिविनम्र होकर प्रणाम करनेके पश्चात् वह तुरंत रथपर सवार हो गया और भगवान् शिवके साथ युद्ध करने लगा। ब्रह्मन् ! उस समय शिव और शङ्खचूड़में बहुत लंबे कालतक युद्ध होता रहा। कोई किसीसे न जीतते थे और न हारते थे। कभी समयानुसार शङ्खचूड़ शस्त्र रखकर रथपर ही विश्राम कर लेता और कभी भगवान् शंकर भी शस्त्र रखकर वृषभपर ही आराम कर लेते। शंकरके बाणोंसे असंख्य दानवोंका संहार हुआ। इधर संग्राममें देवपक्षके जो-जो योद्धा मरते थे, उनको विभु शंकर पुनः जीवित कर देते थे। उसी समय भगवान् श्रीहरि एक अत्यन्त आतुर बूढ़े ब्राह्मणका वेष बनाकर युद्धभूमिमें आये और दानवराज शङ्खचूड़से कहने लगे। वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें पधारे हुए श्रीहरिने कहा - राजेन्द्र ! तुम मुझ ब्राह्मणको भिक्षा देनेकी कृपा करो। इस समय सम्पूर्ण शक्तियाँ प्रदान करनेकी तुममें पूर्ण योग्यता है। अतः तुम मेरी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं निरीह, तृषित एवं वृद्ध ब्राह्मण हूँ। पहले तुम देनेके लिये सत्य प्रतिज्ञा कर लो, तब मैं तुमसे कहूँगा। राजेन्द्र शङ्खचूड़ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा - 'हाँ, हाँ, बहुत ठीक - आप जो चाहें सो ले सकते हैं।' तब अतिशय माया फैलाते हुए उन वृद्ध ब्राह्मणने कहा- 'मैं तुम्हारा 'कृष्णकवच' चाहता हूँ।' उनकी बात सुनकर सत्यप्रतिज्ञ शङ्खचूड़ने तुरंत वह दिव्य कवच उन्हें दे दिया और उन्होंने उसे ले भी लिया। फिर वे ही श्रीहरि शङ्खचूड़का रूप बनाकर तुलसीके निकट गये। वहाँ जाकर कपटपूर्वक उन्होंने उससे हास-विलास किया। (इस प्रकार शङ्खचूड़की पत्नीके रूपमें उसका सतीत्व भङ्ग हो गया। यद्यपि तत्त्वरूपसे तो वह श्रीहरिकी परम प्रेयसी पत्नी ही थी।) ठीक इसी समय शंकरने शङ्खचूड़पर चलानेके लिये श्रीहरिका दिया हुआ त्रिशूल हाथमें उठा लिया। वह त्रिशूल इतना प्रकाशमान था, मानो ग्रीष्म ऋतुका मध्याह्नकालीन सूर्य हो, अथवा प्रलयकालीन प्रचण्ड अग्नि। वह दुर्निवार्य, दुर्धर्ष, अव्यर्थ और शत्रुसंहारक था। सम्पूर्ण शस्त्रोंके सारभूत उस त्रिशूलकी तेजमें चक्रके साथ तुलना की जाती थी। उस भयंकर त्रिशूलको शिव अथवा केशव - ये दो ही उठा सकते थे। अन्य किसीके मानका वह नहीं था। वह साक्षात् सजीव ब्रह्म ही था। उसके रूपका कभी परिवर्तन नहीं होता और सभी उसे देख भी नहीं पाते थे। नारद ! अखिल ब्रह्माण्डका संहार करनेकी उस त्रिशूलमें पूर्ण शक्ति थी। भगवान् शंकरने लीलासे ही उसे उठाकर हाथपर जमाया और शङ्खचूड़पर फेंक दिया। तब उस बुद्धिमान् नरेशने सारा रहस्य जानकर अपना धनुष धरतीपर फेंक दिया और वह बुद्धिपूर्वक योगासन लगाकर भक्तिके साथ अनन्य-चित्तसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलका ध्यान करने लगा। त्रिशूल कुछ समयतक तो चक्कर काटता रहा। तदनन्तर वह शङ्खचूड़के ऊपर जा गिरा। उसके गिरते ही तुरंत वह दानवेश्वर तथा उसका रथ - सभी जलकर भस्म हो गये।
२१- सावित्री देवीकी पूजा-स्तुतिका विधान
| १८२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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दानव-शरीरके भस्म होते ही उसने एक दिव्य गोपका वेष धारण कर लिया। उसकी किशोर अवस्था थी। वह दो दिव्य भुजाओंसे सुशोभित था। उसके हाथमें मुरली शोभा पा रही थी और रत्नमय आभूषण उसके शरीरको विभूषित कर रहे थे। इतनेमें अकस्मात् सर्वोत्तम दिव्य मणियोंद्वारा निर्मित एक दिव्य विमान गोलोकसे उतर आया। उसमें चारों ओर असंख्य गोपियाँ बैठी थीं। शङ्खचूड़ उसीपर सवार होकर गोलोकके लिये प्रस्थित हो गया।
मुने! उस समय वृन्दावनमें रासमण्डलके मध्य भगवान् श्रीकृष्ण और भगवती श्रीराधिका विराजमान थीं। वहाँ पहुँचते ही शङ्खचूड़ने भक्तिके साथ मस्तक झुकाकर उनके चरणकमलोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम किया। अपने चिरसेवक सुदामाको देखकर उन दोनोंके श्रीमुख प्रसन्नतासे खिल उठे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे अपनी गोदमें उठा लिया। तदनन्तर वह त्रिशूल बड़े वेगसे आदरपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णके पास लौट आया। शङ्खचूड़की हड्डियोंसे शङ्खकी उत्पत्ति हुई। वही शङ्ख अनेक प्रकारके रूपोंमें विराजमान होकर देवताओंकी पूजामें निरन्तर पवित्र माना जाता है। उसके जलको श्रेष्ठ मानते हैं; क्योंकि देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये वह अचूक साधन है। उस पवित्र जलको तीर्थमय माना जाता है। उसके प्रति केवल शंकरकी आदरबुद्धि नहीं है। जहाँ-कहीं भी शङ्खध्वनि होती है, वहीं लक्ष्मीजी सम्यक् प्रकारसे विराजमान रहती हैं। जो शङ्खके जलसे स्नान कर लेता है, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त हो जाता है। शङ्ख साक्षात् भगवान् श्रीहरिका अधिष्ठान है। जहाँपर शङ्ख रहता है, वहाँ भगवान् श्रीहरि भगवती लक्ष्मीसहित सदा निवास करते हैं। अमङ्गल दूरसे ही भाग जाता है।
उधर शिव भी शङ्खचूड़को मारकर अपने लोकको पधार गये। उनके मनमें अपार हर्ष था। वे वृषभपर आरूढ़ होकर अपने गणोंसहित चले गये। अपना राज्य पा जानेके कारण देवताओंके हर्षकी सीमा नहीं रही। स्वर्गमें देव-दुन्दुभियाँ बज उठीं और गन्धर्व तथा किन्नर यशोगान करने लगे। भगवान् शंकरके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा आरम्भ हो गयी। देवताओं और मुनिगणोंने भगवान् शंकरकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। (अध्याय २०)
शङ्खचूड़-वेषधारी श्रीहरिद्वारा तुलसीका पातिव्रत्यभङ्ग, शङ्खचूड़का पुनः गोलोक जाना, तुलसी और श्रीहरिका वृक्ष एवं शालग्राम-पाषाणके रूपमें भारतवर्षमें रहना तथा तुलसीमहिमा, शालग्रामके विभिन्न लक्षण तथा महत्त्वका वर्णन
**नारदजीने कहा—**प्रभो! भगवान् नारायणने कौन-सा रूप धारण करके तुलसीसे हास-विलास किया था? यह प्रसङ्ग मुझे बतानेकी कृपा करें।
**भगवान् नारायण ऋषि कहते हैं—**नारद! भगवान् श्रीहरिने वैष्णवी माया फैलाकर शङ्खचूड़से कवच ले लिया। फिर शङ्खचूड़का ही रूप धारण करके वे साध्वी तुलसीके घर पहुँचे, वहाँ उन्होंने तुलसीके महलके दरवाजेपर दुन्दुभि बजवायी और जय-जयकारके घोषसे उस सुन्दरीको अपने आगमनकी सूचना दी।
तुलसीने पतिको युद्धसे आया देख उत्सव मनाया और महान् हर्षभरे हृदयसे स्वागत किया। फिर दोनोंमें युद्धसम्बन्धी चर्चा हुई; तदनन्तर शङ्खचूड़के वेषमें जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरि सो गये। नारद! उस समय तुलसीके साथ उन्होंने सुचारूरूपसे
प्रकृतिखण्ड १८३ हास-विलास किया तथापि तुलसीको इस बार पहलेकी अपेक्षा आकर्षण आदिमें व्यतिक्रमका अनुभव हुआ; अतः उसने सारी वास्तविकताका अनुमान लगा लिया और पूछा। तुलसीने कहा-मायेश ! बताओ तो तुम कौन हो ? तुमने कपटपूर्वक मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया; इसलिये अब मैं तुम्हें शाप दे रही हूँ। ब्रह्मन् ! तुलसीके वचन सुनकर शापके भयसे भगवान् श्रीहरिने लीलापूर्वक अपना सुन्दर मनोहर स्वरूप प्रकट कर दिया। देवी तुलसीने डाला। प्रभो ! आप अवश्य ही पाषाण-हृदय हैं, तभी तो इतने निर्दय बन गये ! अतः देव ! मेरे शापसे अब पाषाणरूप होकर आप पृथ्वीपर रहें। अहो ! बिना अपराध ही अपने भक्तको आपने क्यों मरवा दिया ? इस प्रकार कहकर शोकसे संतप्त हुई तुलसी आँखोंसे आँसू गिराती हुई बार-बार विलाप करने लगी। तदनन्तर करुण-रसके समुद्र कमलापति भगवान् श्रीहरि करुणायुक्त तुलसीदेवीको देखकर नीतिपूर्वक वचनोंसे उसे समझाने लगे। भगवान् श्रीहरि बोले- भद्रे ! तुम मेरे लिये भारतवर्षमें रहकर बहुत दिनोंतक तपस्या कर चुकी हो। उस समय तुम्हारे लिये शङ्खचूड़ भी तपस्या कर रहा था। (वह मेरा ही अंश था।) अपनी तपस्याके फलसे तुम्हें स्त्रीरूपमें प्राप्त करके वह गोलोकमें चला गया। अब मैं तुम्हारी तपस्याका फल देना उचित समझता हूँ। तुम इस शरीरका त्याग करके दिव्य देह धारणकर मेरे साथ आनन्द करो। लक्ष्मीके समान तुम्हें सदा मेरे साथ रहना चाहिये। तुम्हारा यह शरीर नदीरूपमें परिणत हो 'गण्डकी' नामसे प्रसिद्ध होगा। यह पवित्र नदी पुण्यमय भारतवर्षमें मनुष्योंको उत्तम पुण्य देनेवाली बनेगी। तुम्हारे केशकलाप पवित्र वृक्ष होंगे। तुम्हारे केशसे उत्पन्न होनेके कारण तुलसीके नामसे ही उनकी प्रसिद्धि होगी। वरानने ! तीनों लोकोंमें देवताओंकी पूजाके काममें आनेवाले जितने भी पत्र और पुष्प हैं, उन सबमें तुलसी प्रधान मानी जायगी। स्वर्गलोक, मर्त्यलोक, पाताल तथा वैकुण्ठलोकमें-सर्वत्र तुम मेरे संनिकट रहोगी। सुन्दरि ! तुलसीके वृक्ष सब पुष्पोंमें श्रेष्ठ हों। गोलोक, विरजा नदीके तट, रासमण्डल, वृन्दावन, भूलोक, भाण्डीरवन, चम्पकवन, मनोहर चन्दनवन एवं माधवी, केतकी, अपने सामने उन सनातन प्रभु देवेश्वर श्रीहरिको विराजमान देखा। भगवान्का दिव्य विग्रह नूतन मेघके समान श्याम था। आँखें शरत्कालीन कमलकी तुलना कर रही थीं। उनके अलौकिक रूप-सौन्दर्यमें करोड़ों कामदेवोंकी लावण्य-लीला प्रकाशित हो रही थी। रत्नमय भूषण उन्हें आभूषित किये हुए थे। उनका प्रसन्नवदन मुस्कानसे भरा था। उनके दिव्य शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था। उन्हें देखकर पतिके निधनका अनुमान करके कामिनी तुलसी मूर्च्छित हो गयी। फिर चेतना प्राप्त होनेपर उसने कहा। तुलसी बोली-नाथ ! आपका हृदय पाषाणके सदृश है; इसीलिये आपमें तनिक भी दया नहीं है। आज आपने छलपूर्वक (मेरे इस शरीरका) धर्म नष्ट करके मेरे (इस शरीरके) स्वामीको मार