भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

प्रकृतिखण्ड १७३

हो उठा। फिर परम साध्वी तुलसी मधुर वाणीमें कहने लगी।

तुलसीने कहा—प्राणबन्धो! नाथ! आप मेरे प्राणोंके अधिष्ठाता देव हैं। आप विराजिये। क्षणभर मेरे जीवनकी रक्षा कीजिये। मैं अपने नेत्रोंसे कुछ समयतक तो आदरपूर्वक आपके दर्शन कर लूँ। मेरे प्राण फड़फड़ा रहे हैं। आज मैंने रातके अन्तिम क्षणमें एक बुरा स्वप्न देखा है।

महाराज शङ्खचूड़ ज्ञानी पुरुष था। तुलसीकी बात सुनकर उसने भोजन किया। जल पिया। फिर अवसर पाकर उसने सत्य, हितकर एवं यथार्थ वचन तुलसीसे कहे।

शङ्खचूड़ बोला—प्रिये! कर्म-भोगका सारा निबन्ध कालके सूत्रमें बँधा है। शुभ, हर्ष, सुख, दुःख, भय, शोक और मङ्गल—सभी कालके अधीन हैं। समयानुसार वृक्ष उगते, उनपर शाखाएँ फैलतीं, पुष्प लगते और क्रमशः वे फलसे लद जाते हैं। फिर काल ही उन फलोंको पकाता भी है। बादमें कालके प्रभावसे फूल-फलकर वे सम्पूर्ण वृक्ष नष्ट भी हो जाते हैं। सुन्दरि! समयपर विश्व उत्पन्न होता है और समयानुसार उसकी अन्तिम घड़ी आ जाती है। कालकी महिमा स्वीकार करके ब्रह्मा सृष्टि करते हैं और विष्णु पालनमें तत्पर रहते हैं। रुद्रका संहार-कार्य भी कालके संकेतपर ही निर्भर है। सभी क्रमशः कालानुसार अपने व्यापारमें नियुक्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि प्रधान देवताओंके भी अधीश्वर हैं—परमात्मा श्रीकृष्ण। जो प्रकृतिसे परे हैं, उन्हींको स्रष्टा, पाता और संहर्ता कहते हैं। वे सदा अपने सम्पूर्ण अंशसे विराजमान रहते हैं। वे ही समयपर स्वेच्छापूर्वक प्रकृतिको उत्पन्न करके विश्वमें रहनेवाले सम्पूर्ण चराचर पदार्थोंको रचते हैं। उन्हें सर्वेश, सर्वरूप, सर्वात्मा और परमेश्वर कहते हैं। वे जनसे जनकी सृष्टि करते, जनसे जनकी रक्षा करते तथा जनसे जनका संहार करते हैं, उन्हीं त्रिगुणातीत परम प्रभु राधावल्लभकी तुम उपासना करो। उन्हींकी आज्ञासे सदा शीघ्रगामी पवन प्रवाहित होते हैं, सूर्य आकाशमें तपते हैं, इन्द्र समयानुसार वर्षा करते हैं, मृत्यु प्राणियोंमें विचरती है, अग्नि यथावसर दाह उत्पन्न करते हैं तथा शीतल चन्द्रमा भयभीतकी भाँति आकाशमण्डलमें चक्कर लगाते हैं। प्रिये! जो मृत्युकी मृत्यु, कालके काल, यमराजके श्रेष्ठ शासक, ब्रह्माके स्वामी, माता-की-माता, जगत्‌की जननी तथा संहार करनेवालेके भी संहारकर्ता हैं, उन परम प्रभु भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें तुम जाओ। प्रिये! यहाँ कौन किनका बन्धु है! जो सबके बन्धु हैं, उन्हींकी तुम उपासना करो। ब्रह्माने हम दोनोंको एक रस्सीमें बाँध दिया। इससे तुम्हारे साथ जगत्‌के व्यवहारमें मैं फँस गया। पुनः विलग हो जाना विधिकी इच्छापर ही निर्भर है। शोक एवं विपत्ति सामने आनेपर अज्ञानी व्यक्ति घबराता है न कि पण्डित पुरुष। कालचक्रके क्रमसे सुख और दुःख एकके बाद एक आते-जाते ही रहते हैं। अब तुम्हें निश्चय ही वे सर्वेश भगवान् नारायण साक्षात् पतिरूपमें प्राप्त होंगे, जिनके लिये बदरिकाश्रममें रहकर तुम तपस्या कर चुकी हो। तपस्या तथा ब्रह्माके वर-प्रदानसे तुम्हें पानेका सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ था। कामिनि! उस समय तुम भगवान् श्रीहरिके लिये तप कर रही थी। अतः अब उन्हींको प्राप्त करोगी। गोलोकमें वृन्दावन है। वहीं तुम भगवान् गोविन्दको पाओगी। मैं भी इस दानवी शरीरका परित्याग करके उसी दिव्यलोकमें चलूँगा। वहीं तुम मुझे देख सकोगी और मैं तुम्हें। इस समय जो मैं परम दुर्लभ भारतवर्षमें आया हूँ, इसमें कारण केवल श्रीराधाजीका शाप है। प्रिये! सुनो! मेरा गोलोकमें पुनः जाना सर्वथा निश्चित है। अतः शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? कान्ते! तुम