ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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असंख्य दूसरे दानव हाथोंमें अस्त्र लिये इधर-उधर घूम रहे थे। ऐसे वैभव-सम्पन्न शङ्खचूड़को देखकर पुष्पदन्त आश्चर्यमें पड़ गया। तदनन्तर उसने शंकरके कथनानुसार युद्धविषयक संदेश सुनाना आरम्भ किया।
पुष्पदन्तने कहा—राजेन्द्र! प्रभो! मैं भगवान् शंकरका दूत हूँ। मेरा नाम पुष्पदन्त है। शंकरजीकी कही हुई बातें ही मैं यहाँ आपसे कह रहा हूँ, सुननेकी कृपा करें। अब आप देवताओंका राज्य तथा उनका अधिकार उन्हें लौटा दें; क्योंकि वे देवेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये थे। उन प्रभुने अपना त्रिशूल देकर आपके विनाशके लिये शंकरको भेजा है। त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव इस समय चन्द्रभागा नदीके तटपर वटवृक्षके नीचे विराजमान हैं। आप या तो देवताओंका राज्य लौटा दें या निश्चित रूपसे युद्ध करें। मुझे यह भी बता दें कि मैं भगवान् शंकरके पास जाकर उनको क्या उत्तर दूँ?
नारद! दूतके रूपमें गये हुए पुष्पदन्तकी बात सुनकर शङ्खचूड़ ठठाकर हँस पड़ा और बोला—'दूत! मैं कल प्रातःकाल चलूँगा, तुम जाओ।' तब पुष्पदन्त तुरंत वटके नीचे विराजमान भगवान् शंकरके पास लौट गया और उनसे शङ्खचूड़की बात, जो स्वयं उसने अपने मुखसे कही थी, कह सुनायी। साथ ही, उसके पास जो सेना आदि युद्धोपकरण थे, उनका भी परिचय दिया। इतनेमें योजनानुसार कार्तिकेय शंकरके समीप आ पहुँचे। वीरभद्र, नन्दीश्वर, महाकाल, सुभद्रक, विशालाक्ष, बाणासुर, पिङ्गलाक्ष, विकम्पन, विरूप, विकृति, मणिभद्र, बास्कल, कपिलाक्ष, दीर्घदंष्ट्र, विकट, ताम्रलोचन, कालंकट, बलीभद्र, कालजिह्व, कुटीचर, बलोन्मत्त, रणश्लाघी, दुर्जय, दुर्गम, आठों भैरव, ग्यारहों रुद्र, आठों वसु, इन्द्र आदि देवता, बारहों सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, दोनों अश्विनीकुमार, कुबेर, यमराज, जयन्त, नलकुबर, वायु, वरुण, बुध, मङ्गल, धर्म, शनि, ईशान और प्रतापी कामदेव आदि भी आ गये।
साथ ही, उग्रदंष्ट्रा, उग्रचण्डा, कोटरा, कैटभी तथा स्वयं सौ भुजावाली भयंकर भगवती भद्रकाली देवी भी वहाँ आ गयीं। वे देवी अतिशय श्रेष्ठ रत्नद्वारा निर्मित विमानपर बैठी थीं। उनका विग्रह लाल रंगके वस्त्रसे सुशोभित था। उनके गलेमें लाल पुष्पोंकी माला थी। सभी अङ्ग लाल चन्दनसे अनुलिप्त थे। नाचना, हँसना, हर्षके उल्लासमें भरकर मीठे स्वरोंमें गाना, भक्तोंको अभय प्रदान करना तथा शत्रुओंको डराना उन अभयस्वरूपिणी भगवती भद्रकालीका सहज गुण बन गया था। उनके मुखमें बड़ी विकराल लंबी जीभ लपलपा रही थी। शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, ढाल, तलवार, धनुष, बाण, एक योजन विस्तृत वर्तुलाकार गम्भीर खप्पर, गगनचुम्बी त्रिशूल, एक योजनमें फैली हुई शक्ति, मुद्गर, मुसल, वज्र, पाश, खेटक, प्रकाशमान फलक, वैष्णवास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र, नागपाश, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गन्धर्व, गरुड़, पार्जन्य एवं पाशुपतास्त्र, जृम्भणास्त्र, पार्वतास्त्र, माहेश्वरास्त्र, वायव्यास्त्र, सम्मोहन दण्ड, शतशः अमोघास्त्र तथा सैकड़ों दिव्यास्त्रको धारण करके भगवती भद्रकाली अनन्त योगिनियोंके साथ वहाँ आकर विराज गयीं। उनके साथमें अत्यन्त भयंकर असंख्य डाकिनियोंका यूथ भी सुशोभित था। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, वेताल, राक्षस, यक्ष और किन्नर भी सहयोग देनेके लिये आ पहुँचे। इन सबको साथ लेकर स्वामी कार्तिकेयने अपने पिता चन्द्रशेखर शिवको प्रणाम किया और सहायता करनेके विचारसे उनकी आज्ञा लेकर पास बैठ गये।
इधर दूतके चले जानेपर प्रतापी शङ्खचूड़ अन्तःपुरमें गया और उसने अपनी पत्नी तुलसीसे युद्धसम्बन्धी बातें बतायीं। सुनते ही तुलसीके होठ और तालु सूख गये। उसका हृदय संतप्त