ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भी अब शीघ्र ही इस शरीरका परित्याग करके दिव्य रूप धारणकर श्रीहरिको पतिरूपसे प्राप्त कर लोगी। अतः तनिक भी घबरानेकी आवश्यकता नहीं है।
इस प्रकार शङ्खचूड़ तुलसीके साथ सुन्दर बातचीत कर रहा था, इतनेमें सायंकालका समय हो गया। रत्नमय भवनमें पुष्प और चन्दनसे चर्चित श्रेष्ठ शय्या बिछी थी। वह उसपर सो गया और भाँति-भाँतिके वैभवोंकी बात उसके मनमें स्फुरित होने लगी। उसके भवनमें रत्नका दीपक जल रहा था। परम सुन्दरी स्त्रियोंमें रत्न तुलसी सेवामें उपस्थित थी। ज्ञानी शङ्खचूड़ने पुनः तुलसीको दिव्य ज्ञान प्रदर्शित करते हुए समझाया। साथ ही शङ्खचूड़ने तुलसीको सम्पूर्ण शोकोंको दूर करनेवाले उस उत्तम ज्ञानको बतलाया जो दिव्य भाण्डीरवनमें भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे उसे प्राप्त हुआ था। ऐसे श्रेष्ठ ज्ञानको पाकर उस देवीका मुख प्रसन्नतासे भर गया। समस्त जगत् नश्वर है—यह मानकर वह हर्षपूर्वक हास-विलास करने लगी। फिर दोनों सुखपूर्वक सो गये। (अध्याय १७)
शङ्खचूड़का पुष्पभद्रा नदीके तटपर जाना, वहाँ भगवान् शंकरके दर्शन तथा उनसे विशद वार्तालाप
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! राजा शङ्खचूड़ श्रीकृष्णका भक्त था। वह मनमें भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करके ब्राह्ममुहूर्तमें ही अपनी पुष्पमयी शय्यासे उठ गया। उसने स्वच्छ जलसे स्नान करके रातके वस्त्र त्याग दिये। धुले हुए दो वस्त्रोंको पहनकर उज्ज्वल तिलक कर लिया; फिर इष्ट देवताके वन्दन आदि प्रतिदिनके आवश्यक कर्तव्योंको पूरा किया। दही, घृत, मधु और लाजा आदि माङ्गलिक वस्तुएँ देखीं। नारद! प्रतिदिनकी भाँति उसने भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको उत्तम रत्न, मणि, स्वर्ण और वस्त्र दान किये। यात्रा मङ्गलमयी होनेके लिये उसने अमूल्य रत्न तथा कुछ मोती, मणि एवं हीरे भी अपने गुरुदेव ब्राह्मणकी सेवामें समर्पित किये। वह अपने कल्याणार्थ श्रेष्ठ हाथी, घोड़े और सर्वोत्तम सुन्दर धन दरिद्र ब्राह्मणोंको खुले हाथों बाँटने लगा। उस समय हजारों वस्तुपूर्ण भवन, लाखों नगर तथा असंख्य गाँव शङ्खचूड़ने दानरूपमें ब्राह्मणोंको दिये। इसके बाद उसने अपने पुत्रको सम्पूर्ण दानवोंका राजा बनाकर उसे अपनी प्रेयसी पत्नी, राज्य, सम्पूर्ण सम्पत्ति, प्रजा एवं सेवकवर्ग, कोष तथा हाथी-घोड़े आदि वाहन सौंप दिये। उसने स्वयं कवच पहन लिया। हाथमें धनुष और बाण ले लिये। सब सैनिकोंको एकत्र किया। तीन लाख घोड़े और पाँच लाख उत्तम श्रेणीके हाथी उपस्थित हुए। दस हजार रथ तथा तीन-तीन करोड़ धनुर्धारी, ढाल-तलवारधारी और त्रिशूलधारी वीर उसकी सेनाके अङ्ग बने।
नारद! इस प्रकार दानवेश्वर शङ्खचूड़ने अपरिमित सेना सजा ली। युद्धशास्त्रके पारगामी एक महारथी वीरको सेनापतिके पदपर नियुक्त किया। महारथी उसे समझना चाहिये जो रथियोंमें श्रेष्ठ हो। राजा शङ्खचूड़ने उस महारथीको अगणित अक्षौहिणी सेनापर अधिकार प्रदान कर दिया। उस सेनाध्यक्षमें ऐसी योग्यता थी कि स्वयं तीस अक्षौहिणी सेनासे अपनी सेनाको बचा सकता था। तत्पश्चात् शङ्खचूड़ मन-ही-मन भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करता हुआ बाहर निकला। उत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानपर सवार हुआ और गुरुवरोंको आगे करके भगवान् शंकरकी सेवामें चल दिया।