ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड
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नारद! पुष्पभद्रा (या चन्द्रभागा) नदीके तटपर एक सुन्दर अक्षयवट है। वहीं सिद्धोंके बहुत-से आश्रम हैं। उस स्थानको सिद्धक्षेत्र कहा गया है। यह पवित्र स्थान भारतवर्षमें है। इसे कपिलमुनिकी तपोभूमि कहते हैं। यह पश्चिमी समुद्रसे पूर्व तथा मलयपर्वतसे पश्चिममें है, श्रीशैलपर्वतसे उत्तर तथा गन्धमादनसे दक्षिण भागमें है। इसकी चौड़ाई पाँच योजन है और लम्बाई पाँच सौ योजन। वहाँ भारतवर्षमें एक पुण्यप्रदा नदी बहती है। उसका जल स्वच्छ स्फटिकमणिके समान उद्भासित होता है। वह जलसे कभी खाली नहीं होती। उसे पुष्पभद्रा कहते हैं। वह नदी समुद्रकी पत्नीरूपसे विराजमान होकर सदा सौभाग्यवती बनी रहती है। वह शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल जलसे पूर्ण है। उसका उद्गम-स्थान हिमालय है। कुछ दूर आगे आनेपर शरावती नामकी नदी उसमें मिल गयी है। वह गोमन्तपर्वतको बायें करके बहती हुई पश्चिम समुद्रकी ओर प्रस्थान करती है। वहाँ पहुँचकर शङ्खचूड़ने भगवान् शंकरको देखा।
उस समय भगवान् शंकर वटवृक्षके नीचे विराजमान थे। उनका विग्रह करोड़ों सूर्योंके समान उद्भासित हो रहा था। वे योगासनसे बैठे थे, उनके हाथोंमें वर और अभयकी मुद्रा थी। मुखमण्डल मुस्कानसे भरा था। वे ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल थी। उनके हाथमें त्रिशूल और पट्टिश थे तथा शरीरपर श्रेष्ठ बाघम्बर शोभा पा रहा था। वस्तुतः गौरीके प्रिय पति भगवान् शंकर परम सुन्दर हैं। उनका शान्त विग्रह भक्तके मृत्युभयको दूर करनेमें पूर्ण समर्थ है। तपस्याका फल देना तथा अखिल सम्पत्तियोंको भरपूर रखना उनका स्वाभाविक गुण है। वे बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं। उनके मुखपर कभी उदासी नहीं आती। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। उन्हें विश्वनाथ, विश्वबीज, विश्वरूप, विश्वज, विश्वम्भर, विश्ववर और विश्वसंहारक कहा जाता है। वे कारणोंके कारण तथा नरकसे उद्धार करनेमें परम कुशल हैं। वे सनातन प्रभु ज्ञान प्रदान करनेवाले, ज्ञानके बीज तथा ज्ञानानन्द हैं। दानवराज शङ्खचूड़ने विमानसे उतरकर उनके दर्शन किये और सबके साथ सिर झुकाकर उन भगवान् शंकरको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। उस समय शंकरके वाम-भागमें भद्रकाली विराजित थीं और सामने स्वामिकार्तिकेय थे। इन तीनों महानुभावोंने शङ्खचूड़को आशीर्वाद दिया। उसे आया देखकर नन्दीश्वर प्रभृति सब-के-सब उठकर खड़े हो गये। तदनन्तर सबमें परस्पर सामयिक बातें आरम्भ हो गयीं। उनसे बातचीत करनेके पश्चात् राजा शङ्खचूड़ भगवान् शंकरके समीप बैठ गया। तब प्रसन्नात्मा भगवान् महादेव उससे कहने लगे।
**महादेवजीने कहा—**राजन्! ब्रह्मा अखिल जगत्के रचयिता हैं। वे धर्मज्ञ एवं धर्मके पिता हैं। उनके पुत्र मरीचि हैं। इनमें श्रीहरिके प्रति अपार श्रद्धा तथा धर्मके प्रति निष्ठा है। मरीचिने धर्मात्मा कश्यपको पुत्ररूपसे प्राप्त किया है। प्रजापति दक्षने प्रसन्नतापूर्वक अपनी तेरह कन्याएँ