ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १७८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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युद्ध हो चुका है। राजन्! एक बार वे हिरण्याक्षसे लड़े थे और पुनः दूसरी बार हिरण्यकशिपुसे। स्वयं मैं भी इससे पूर्व त्रिपुर नामक दैत्योंके साथ युद्ध कर चुका हूँ। यही नहीं, किंतु प्राचीन समयमें जो सर्वेश्वरी एवं प्रकृति नामसे प्रसिद्ध भगवती जगदम्बा हैं, उनका शुम्भ आदि असुरोंके साथ अत्यन्त अद्भुत युद्ध हुआ था। तुम तो स्वयं परमात्मा श्रीकृष्णके अंश और उनके पार्षद हो। जो-जो दैत्य मारे गये हैं, उनमेंसे कोई भी तुम्हारे-जैसे बलवान् नहीं थे। फिर राजन्! तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें मुझे क्या लज्जा है? देवता भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये हैं। तभी उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। अतः देवताओंका राज्य तुम लौटा दो। बस, मेरे कहनेका इतना ही अभिप्राय है अथवा मेरे साथ प्रसन्नतासे लड़नेके लिये तैयार हो जाओ। अब अधिक शब्दोंके अपव्ययसे क्या प्रयोजन है?
नारद! जब इस प्रकार कहकर भगवान् शंकर चुप हो गये, तब शङ्खचूड़ भी अपने मन्त्रियोंके साथ तुरंत उठकर खड़ा हो गया। (अध्याय १८)
भगवान् शंकर और शङ्खचूड़के पक्षोंमें युद्ध, भद्रकालीका घोर युद्ध और आकाशवाणी सुनकर कालीका शङ्खचूड़पर पाशुपतास्त्र न चलाना
**भगवान् नारायण कहते हैं—**मुने! प्रतापी दानवराज शङ्खचूड़ सिर झुका भगवान् शिवको प्रणाम करके अपने मन्त्रियोंके साथ तत्काल विमानपर जा बैठा। दोनों दलोंमें युद्ध आरम्भ हो गया। दानव स्कन्दकी शक्तिसे निरन्तर पीड़ित होने लगे। उनमें हलचल मच गयी। इधर स्वर्गमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। उस भयंकर समराङ्गणमें ही स्कन्दके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। स्कन्दका युद्ध अत्यन्त अद्भुत और भयानक था। वह प्राकृतिक प्रलयकी भाँति दानवोंके लिये विनाशकारी सिद्ध हो रहा था। उसे देखकर विमानपर बैठे हुए राजा शङ्खचूड़ने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। राजाके बाण इस तरह गिर रहे थे, मानो मेघ जलकी धारा गिरा रहा हो। वहाँ घोर अन्धकार छा गया। फिर आग प्रकट होने लगी। यह देख नन्दीश्वर आदि सब देवता वहाँसे भाग चले। केवल कार्तिकेय ही युद्धके मुहानेपर डटे रहे। राजा शङ्खचूड़ पर्वतों, सर्पों, शिलाओं तथा वृक्षोंकी भयानक वृष्टि करने लगा। उसका वेग दुःसह था। राजाकी बाणवर्षासे शिवकुमार कार्तिकेय ढक गये, मानो सूर्यदेवपर स्निग्ध मेघमालाका आवरण पड़ गया हो। शङ्खचूड़ने स्कन्दके भयंकर एवं दुर्वह धनुषको काट दिया। दिव्य रथके टुकड़े-टुकड़े कर डाले तथा रथके घोड़ोंको भी मार गिराया। उनके मोरको दिव्यास्त्रसे मार-मारकर छलनी कर दिया। इसके बाद दानवेन्द्रने उनके वक्षःस्थलपर सूर्यके समान जाज्वल्यमान प्राणघातक शक्ति चलायी। उस शक्तिके आघातसे एक क्षणतक मूर्च्छित होनेके पश्चात् कार्तिकेय फिर सचेत हो गये। उन्होंने वह दिव्य धनुष हाथमें लिया, जिसे पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने प्रदान किया था। फिर रत्नेन्द्रसारसे निर्मित यानपर आरूढ़ हो अस्त्र-शस्त्र लेकर कार्तिकेय भयंकर युद्ध करने लगे। शिवकुमार स्कन्दने अपने दिव्यास्त्रसे क्रोधपूर्वक दानवराजके चलाये हुए समस्त पर्वतों, शिलाखण्डों, सर्पों और वृक्षोंको काट गिराया। उन प्रतापी वीरने पार्जन्यास्त्रके द्वारा आग बुझा दी और खेल-खेलमें ही शङ्खचूड़के रथ, धनुष, कवच, सारथि और उज्ज्वल किरीट-मुकुटको काट डाला। फिर उल्काके समान प्रकाशित होनेवाली अपनी शक्ति दानवराजके वक्षःस्थलपर दे मारी। उसके आघातसे राजा मूर्च्छित हो गया। फिर तुरंत ही होशमें आकर वह दूसरे रथपर जा चढ़ा और दूसरा धनुष हाथमें ले