भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

प्रकृतिखण्ड १७७

समय श्रीहीन हो जाते हैं। बलि भविष्यमें इन्द्र होंगे। यद्यपि इस समय श्रीहीन होकर ये सुतल-लोकमें स्थित हैं। समयपर विश्व नष्ट होते हैं और कालके प्रभावसे पुनः उनकी उत्पत्ति भी होती है। अखिल चराचर प्राणी कालकी प्रेरणाके अनुसार नष्ट और उत्पन्न होते हैं। केवल परमात्मा श्रीकृष्ण ही सम हैं; क्योंकि वे ही सबके ईश्वर हैं। उन्हींकी कृपासे मुझे भी 'मृत्युञ्जय' होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अतएव असंख्य प्राकृत प्रलयको मैंने देखा है और आगे भी मैं बार-बार देखूँगा। वे परमेश्वर ही प्रकृतिरूप हैं और उन्हींको पुरुष भी कहा जाता है। वे ही आत्मा और वे ही जीव हैं। वे नाना प्रकारके रूप धारण करके सदा कार्यमें संलग्न रहते हैं। जो सदा उनके नाम और गुणोंका कीर्तन करता है, वह काल, मृत्यु, जन्म, रोग तथा जराके भयको जीत लेता है। उन्हीं परमेश्वरने ब्रह्माको सृष्टिकर्ता, विष्णुको पालनकर्ता तथा मुझको संहारकर्ता बनाया है। उन्हींकी कृपासे हम सब लोग जगत्के शासक बने हैं। राजन्! इस समय मैं कालाग्निरुद्रको संहारके कार्यमें नियुक्त करके स्वयं उन परमेश्वरके नाम और गुणका निरन्तर कीर्तन करता हूँ। इसीसे मृत्यु मुझपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। इस ज्ञानकी महिमासे मैं सदा निर्भय रहता हूँ। मृत्यु भी मुझसे भय मानकर इस प्रकार भागती है, जैसे गरुड़के भयसे सर्प।

नारद! सर्वेश भगवान् शंकर सभाके मध्यभागमें उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये। तब दानवराजने उनके वचन सुनकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की, साथ ही मधुर वाणीमें विनयपूर्वक अपना भाषण आरम्भ किया।

शङ्खचूडने कहा—भगवन्! आपने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है। उसे कभी अन्यथा नहीं माना जा सकता; तथापि कुछ मेरी भी प्रार्थना है, उसे यथार्थतः सुननेकी कृपा करें। इस समय आपने यहाँ जातिद्रोहको जो महान् पाप बताया है, वह यदि देवताओंको मान्य है तो राजा बलिका सर्वस्व छीनकर उन्हें सुतललोकमें क्यों भेज दिया गया ? मैंने यह सारा ऐश्वर्य अपने पराक्रमसे प्राप्त किया है—दानवोंके पूर्ववैभवका उद्धार किया है। भगवान् गदाधर भी सुतललोकसे दानवसमाजको हटा देनेमें समर्थ नहीं हैं; क्योंकि वह उनका पैतृक स्थान है। यदि भाईके साथ द्रोह अनुचित है तो देवताओंने भाईसहित हिरण्याक्षकी हिंसा क्यों करवायी ? शुम्भ आदि असुरोंको देवताओंने क्यों मार गिराया ? पूर्वकालमें जब समुद्र मथा गया, उस समय अमृतका पान केवल देवताओंने किया; वे सम्पूर्ण फलके भागी हुए और हमें वहाँ केवल क्लेशका भागीदार बनाया गया। यह सारा विश्व परमात्मा श्रीकृष्णका क्रीड़ाक्षेत्र है। वे यहाँ जब जिसको देते हैं, उस समय उसीका ऐश्वर्यपर अधिकार होता है। देवताओं और दानवोंका ऐश्वर्यके निमित्त सदासे विवाद होता आया है। कालके अनुसार बारी-बारीसे कभी उनको और कभी हमलोगोंको जय अथवा पराजय प्राप्त होती रहती है। हम दोनोंके विरोधमें आपका आना निष्फल है; क्योंकि आप हम दोनोंके साथ समान सम्बन्ध रखनेवाले, बन्धु, ईश्वर एवं महात्मा हैं। हमलोगोंके साथ इस समय स्पर्धा रखना आपके लिये बड़ी लज्जाकी बात है और यदि कहीं युद्धमें आपकी पराजय हुई तो इससे भी अधिक आपकी अपकीर्ति फैलेगी।

मुने! शङ्खचूड़के ये वचन सुनकर भगवान् त्रिलोचन हँसने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने उस दानवेश्वरका समुचित उत्तर देना आरम्भ किया।

महादेवजी बोले—राजन्! तुमलोग भी तो ब्रह्माके ही वंशज हो। फिर तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें तो हमें क्या बड़ी लज्जा होगी और हारनेपर हमारी क्या भारी अपकीर्ति होगी? इसके पहले मधु और कैटभके साथ श्रीहरिका भी तो