ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १८३ हास-विलास किया तथापि तुलसीको इस बार पहलेकी अपेक्षा आकर्षण आदिमें व्यतिक्रमका अनुभव हुआ; अतः उसने सारी वास्तविकताका अनुमान लगा लिया और पूछा। तुलसीने कहा-मायेश ! बताओ तो तुम कौन हो ? तुमने कपटपूर्वक मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया; इसलिये अब मैं तुम्हें शाप दे रही हूँ। ब्रह्मन् ! तुलसीके वचन सुनकर शापके भयसे भगवान् श्रीहरिने लीलापूर्वक अपना सुन्दर मनोहर स्वरूप प्रकट कर दिया। देवी तुलसीने डाला। प्रभो ! आप अवश्य ही पाषाण-हृदय हैं, तभी तो इतने निर्दय बन गये ! अतः देव ! मेरे शापसे अब पाषाणरूप होकर आप पृथ्वीपर रहें। अहो ! बिना अपराध ही अपने भक्तको आपने क्यों मरवा दिया ? इस प्रकार कहकर शोकसे संतप्त हुई तुलसी आँखोंसे आँसू गिराती हुई बार-बार विलाप करने लगी। तदनन्तर करुण-रसके समुद्र कमलापति भगवान् श्रीहरि करुणायुक्त तुलसीदेवीको देखकर नीतिपूर्वक वचनोंसे उसे समझाने लगे। भगवान् श्रीहरि बोले- भद्रे ! तुम मेरे लिये भारतवर्षमें रहकर बहुत दिनोंतक तपस्या कर चुकी हो। उस समय तुम्हारे लिये शङ्खचूड़ भी तपस्या कर रहा था। (वह मेरा ही अंश था।) अपनी तपस्याके फलसे तुम्हें स्त्रीरूपमें प्राप्त करके वह गोलोकमें चला गया। अब मैं तुम्हारी तपस्याका फल देना उचित समझता हूँ। तुम इस शरीरका त्याग करके दिव्य देह धारणकर मेरे साथ आनन्द करो। लक्ष्मीके समान तुम्हें सदा मेरे साथ रहना चाहिये। तुम्हारा यह शरीर नदीरूपमें परिणत हो 'गण्डकी' नामसे प्रसिद्ध होगा। यह पवित्र नदी पुण्यमय भारतवर्षमें मनुष्योंको उत्तम पुण्य देनेवाली बनेगी। तुम्हारे केशकलाप पवित्र वृक्ष होंगे। तुम्हारे केशसे उत्पन्न होनेके कारण तुलसीके नामसे ही उनकी प्रसिद्धि होगी। वरानने ! तीनों लोकोंमें देवताओंकी पूजाके काममें आनेवाले जितने भी पत्र और पुष्प हैं, उन सबमें तुलसी प्रधान मानी जायगी। स्वर्गलोक, मर्त्यलोक, पाताल तथा वैकुण्ठलोकमें-सर्वत्र तुम मेरे संनिकट रहोगी। सुन्दरि ! तुलसीके वृक्ष सब पुष्पोंमें श्रेष्ठ हों। गोलोक, विरजा नदीके तट, रासमण्डल, वृन्दावन, भूलोक, भाण्डीरवन, चम्पकवन, मनोहर चन्दनवन एवं माधवी, केतकी, अपने सामने उन सनातन प्रभु देवेश्वर श्रीहरिको विराजमान देखा। भगवान्का दिव्य विग्रह नूतन मेघके समान श्याम था। आँखें शरत्कालीन कमलकी तुलना कर रही थीं। उनके अलौकिक रूप-सौन्दर्यमें करोड़ों कामदेवोंकी लावण्य-लीला प्रकाशित हो रही थी। रत्नमय भूषण उन्हें आभूषित किये हुए थे। उनका प्रसन्नवदन मुस्कानसे भरा था। उनके दिव्य शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था। उन्हें देखकर पतिके निधनका अनुमान करके कामिनी तुलसी मूर्च्छित हो गयी। फिर चेतना प्राप्त होनेपर उसने कहा। तुलसी बोली-नाथ ! आपका हृदय पाषाणके सदृश है; इसीलिये आपमें तनिक भी दया नहीं है। आज आपने छलपूर्वक (मेरे इस शरीरका) धर्म नष्ट करके मेरे (इस शरीरके) स्वामीको मार