भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१८२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दानव-शरीरके भस्म होते ही उसने एक दिव्य गोपका वेष धारण कर लिया। उसकी किशोर अवस्था थी। वह दो दिव्य भुजाओंसे सुशोभित था। उसके हाथमें मुरली शोभा पा रही थी और रत्नमय आभूषण उसके शरीरको विभूषित कर रहे थे। इतनेमें अकस्मात् सर्वोत्तम दिव्य मणियोंद्वारा निर्मित एक दिव्य विमान गोलोकसे उतर आया। उसमें चारों ओर असंख्य गोपियाँ बैठी थीं। शङ्खचूड़ उसीपर सवार होकर गोलोकके लिये प्रस्थित हो गया।

मुने! उस समय वृन्दावनमें रासमण्डलके मध्य भगवान् श्रीकृष्ण और भगवती श्रीराधिका विराजमान थीं। वहाँ पहुँचते ही शङ्खचूड़ने भक्तिके साथ मस्तक झुकाकर उनके चरणकमलोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम किया। अपने चिरसेवक सुदामाको देखकर उन दोनोंके श्रीमुख प्रसन्नतासे खिल उठे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे अपनी गोदमें उठा लिया। तदनन्तर वह त्रिशूल बड़े वेगसे आदरपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णके पास लौट आया। शङ्खचूड़की हड्डियोंसे शङ्खकी उत्पत्ति हुई। वही शङ्ख अनेक प्रकारके रूपोंमें विराजमान होकर देवताओंकी पूजामें निरन्तर पवित्र माना जाता है। उसके जलको श्रेष्ठ मानते हैं; क्योंकि देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये वह अचूक साधन है। उस पवित्र जलको तीर्थमय माना जाता है। उसके प्रति केवल शंकरकी आदरबुद्धि नहीं है। जहाँ-कहीं भी शङ्खध्वनि होती है, वहीं लक्ष्मीजी सम्यक् प्रकारसे विराजमान रहती हैं। जो शङ्खके जलसे स्नान कर लेता है, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त हो जाता है। शङ्ख साक्षात् भगवान् श्रीहरिका अधिष्ठान है। जहाँपर शङ्ख रहता है, वहाँ भगवान् श्रीहरि भगवती लक्ष्मीसहित सदा निवास करते हैं। अमङ्गल दूरसे ही भाग जाता है।

उधर शिव भी शङ्खचूड़को मारकर अपने लोकको पधार गये। उनके मनमें अपार हर्ष था। वे वृषभपर आरूढ़ होकर अपने गणोंसहित चले गये। अपना राज्य पा जानेके कारण देवताओंके हर्षकी सीमा नहीं रही। स्वर्गमें देव-दुन्दुभियाँ बज उठीं और गन्धर्व तथा किन्नर यशोगान करने लगे। भगवान् शंकरके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा आरम्भ हो गयी। देवताओं और मुनिगणोंने भगवान् शंकरकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। (अध्याय २०)


शङ्खचूड़-वेषधारी श्रीहरिद्वारा तुलसीका पातिव्रत्यभङ्ग, शङ्खचूड़का पुनः गोलोक जाना, तुलसी और श्रीहरिका वृक्ष एवं शालग्राम-पाषाणके रूपमें भारतवर्षमें रहना तथा तुलसीमहिमा, शालग्रामके विभिन्न लक्षण तथा महत्त्वका वर्णन

**नारदजीने कहा—**प्रभो! भगवान् नारायणने कौन-सा रूप धारण करके तुलसीसे हास-विलास किया था? यह प्रसङ्ग मुझे बतानेकी कृपा करें।

**भगवान् नारायण ऋषि कहते हैं—**नारद! भगवान् श्रीहरिने वैष्णवी माया फैलाकर शङ्खचूड़से कवच ले लिया। फिर शङ्खचूड़का ही रूप धारण करके वे साध्वी तुलसीके घर पहुँचे, वहाँ उन्होंने तुलसीके महलके दरवाजेपर दुन्दुभि बजवायी और जय-जयकारके घोषसे उस सुन्दरीको अपने आगमनकी सूचना दी।

तुलसीने पतिको युद्धसे आया देख उत्सव मनाया और महान् हर्षभरे हृदयसे स्वागत किया। फिर दोनोंमें युद्धसम्बन्धी चर्चा हुई; तदनन्तर शङ्खचूड़के वेषमें जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरि सो गये। नारद! उस समय तुलसीके साथ उन्होंने सुचारूरूपसे