ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १८४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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कुन्द और मल्लिकाके वनमें तथा सभी पुण्य स्थानोंमें तुम्हारे पुण्यप्रद वृक्ष उत्पन्न हों और रहें। तुलसी-वृक्षके नीचेके स्थान परम पवित्र एवं पुण्यदायक होंगे; अतएव वहाँ सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त देवताओंका भी अधिष्ठान होगा। वरानने ! ऊपर तुलसीके पत्ते पडें, इसी उद्देश्यसे वे सब लोग वहाँ रहेंगे। तुलसीपत्रके जलसे जिसका अभिषेक हो गया, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करने तथा समस्त यज्ञोंमें दीक्षित होनेका फल मिल गया। साध्वी ! हजारों घड़े अमृतसे नहलानेपर भी भगवान् श्रीहरिको उतनी तृप्ति नहीं होती है, जितनी वे मनुष्योंके तुलसीका एक पत्ता चढ़ानेसे प्राप्त करते हैं। पतिव्रते ! दस हजार गोदानसे मानव जो फल प्राप्त करता है, वही फल तुलसी-पत्रके दानसे पा लेता है। जो मृत्युके समय मुखमें तुलसी-पत्रका जल पा जाता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें चला जाता है। जो मनुष्य नित्यप्रति भक्तिपूर्वक तुलसीका जल ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त है और उसे गङ्गा-स्नानका फल मिलता है। जो मानव प्रतिदिन तुलसीका पत्ता चढ़ाकर मेरी पूजा करता है, वह लाख अश्वमेध-यज्ञोंका फल पा लेता है। जो मानव तुलसीको अपने हाथमें लेकर और शरीरपर रखकर तीर्थोंमें प्राण त्यागता है, वह विष्णुलोकमें चला जाता है। तुलसी-काष्ठकी मालाको गलेमें धारण करनेवाला पुरुष पद-पदपर अश्वमेध-यज्ञके फलका भागी होता है, इसमें संदेह नहीं।
जो मनुष्य तुलसीको अपने हाथपर रखकर प्रतिज्ञा करता है और फिर उस प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, उसे सूर्य और चन्द्रमाकी अवधिपर्यन्त 'कालसूत्र' नामक नरकमें यातना भोगनी पड़ती है। जो मनुष्य तुलसीको हाथमें लेकर या उसके निकट झूठी प्रतिज्ञा करता है, वह 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें जाता है और वहाँ दीर्घकालतक वास करता है। मृत्युके समय जिसके मुखमें तुलसीके जलका एक कण भी चला जाता है वह अवश्य ही विष्णुलोकको जाता है। पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी और सूर्य-संक्रान्तिके दिन, मध्याह्नकाल, रात्रि, दोनों संध्याओं और अशौचके समय, तेल लगाकर, बिना नहाये-धोये अथवा रातके कपड़े पहने हुए जो मनुष्य तुलसीके पत्रोंको तोड़ते हैं, वे मानो भगवान् श्रीहरिका मस्तक छेदन करते हैं। साध्वि ! श्राद्ध, व्रत, दान, प्रतिष्ठा तथा देवार्चनके लिये तुलसीपत्र बासी होनेपर भी तीन राततक पवित्र ही रहता है। पृथ्वीपर अथवा जलमें गिरा हुआ तथा श्रीविष्णुको अर्पित तुलसी-पत्र धो देनेपर दूसरे कार्यके लिये शुद्ध माना जाता है।*
* तव केशसमूहाश्च पुण्यवृक्षा भवन्त्विति। तुलसीकेशसम्भूतास्तुलसीति च विश्रुताः॥
त्रिषु लोकेषु पुष्पाणां पत्राणां देवपूजने। प्रधानरूपा तुलसी भविष्यति वरानने॥
स्वर्गे मर्त्ये च पाताले वैकुण्ठे मम संनिधौ। भवन्तु तुलसीवृक्षा वराः पुष्पेषु सुन्दरि॥
गोलोके विरजातीरे रासे वृन्दावने भुवि। भाण्डीरे चम्पकवने रम्ये चन्दनकानने॥
माधवीकेतकीकुन्दमल्लिकामालतीवने । भवन्तु तरवस्तत्र पुण्यस्थानेषु पुण्यदाः॥
तुलसीतरुमूले च पुण्यदेशे सुपुण्यदे। अधिष्ठानं तु तीर्थानां सर्वेषां च भविष्यति॥
तत्रैव सर्वदेवानां समधिष्ठानमेव च। तुलसीपत्रपतनप्राप्तये च वरानने॥
स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः। तुलसीपत्रतोयेन योऽभिषेकं समाचरेत्॥
सुधाघटसहस्रेण सा तृप्तिर्न भवेद्धरेः। या च तृप्तिर्भवेन्नॄणां तुलसीपत्रदानतः॥
गवामयुतदानेन यत्फलं लभते नरः। तुलसीपत्रदानेन तत्फलं लभते सति॥
तुलसीपत्रतोयं च मृत्युकाले च यो लभेत्। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥