भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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प्रकृतिखण्ड १७१


पुष्पदन्तका दूत बनकर शङ्खचूड़के पास जाना और शङ्खचूड़के द्वारा तुलसीके प्रति ज्ञानोपदेश

**भगवान् नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर ब्रह्मा दानवके संहार-कार्यमें शंकरको नियुक्त करके स्वयं उसी क्षण अपने स्थानपर चले गये। देवता भी अपने-अपने स्थानोंको चले गये। तब चन्द्रभागा नदीके तटपर एक मनोहर वट-वृक्षके नीचे जाकर देवताओंका अभ्युदय करनेके विचारसे महादेवजीने आसन जमा लिया। गन्धर्वराज पुष्पदन्त शंकरका बड़ा प्रेमी था। उन्होंने उसे दूत बनाकर तुरंत हर्षपूर्वक शङ्खचूड़के पास भेजा। उनकी आज्ञा पाकर पुष्पदन्त उसी क्षण शङ्खचूड़के नगरकी ओर चल दिया। दानवराजकी पुरी अमरावतीसे भी श्रेष्ठ थी। कुबेरका भवन उसके सामने तुच्छ था। उस नगरकी लम्बाई दस योजन थी और चौड़ाई पाँच योजन। स्फटिक-मणिके समान रत्नोंसे बने हुए परकोटोंद्वारा वह घिरा था। सात दुर्गम खाइयोंसे वह सुरक्षित था। प्रज्वलित अग्निके समान निरन्तर चमकनेवाले करोड़ों रत्नोंद्वारा उसका निर्माण किया गया था। उसमें सैकड़ों सुन्दर सड़कें और मणिमय विचित्र वेदियाँ थीं। व्यापारकुशल पुरुषोंके द्वारा बनवाये हुए भवन और ऊँचे-ऊँचे महल चारों ओर सुशोभित थे, जिनमें नाना प्रकारकी बहुमूल्य वस्तुएँ भरी थीं। सिन्दूरके समान लाल मणियोंद्वारा बने हुए असंख्य, विचित्र, दिव्य एवं सुन्दर आश्रम उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे।

मुने! इस प्रकारके सुन्दर नगरमें जाकर पुष्पदन्तने शङ्खचूड़का भवन देखा। वह नगरके बिलकुल मध्यभागमें था। नगरकी आकृति वलयके समान गोल थी। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो पूर्ण चन्द्रमण्डल हो। प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान चार परिखाएँ उसे सुरक्षित किये हुए थीं। शत्रुओंके लिये उस भवनमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था, परंतु हितैषी व्यक्ति बड़ी सुगमतासे उसमें जा सकते थे। अत्यन्त उच्च, गगनस्पर्शी मणिमय प्राचीरोंसे वह भवन घिरा हुआ था। बारह द्वारोंसे भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी। प्रत्येक द्वारपर द्वारपाल थे। सर्वोत्तम मणियोंद्वारा निर्मित लाखों मन्दिर, बहुत-से सोपान तथा रत्नमय खंभे थे। एक द्वारको देखनेके बाद पुष्पदन्तने दूसरे प्रधान द्वारको भी देखा। उस द्वारपर हाथमें त्रिशूल लिये एक पुरुष विराजमान था। उसके मुखपर हँसी छायी थी। उसकी पीली आँखें थीं। उसके शरीरका रंग ताँबेके सदृश लाल था। भय उत्पन्न करनेवाले उस द्वारपालसे आज्ञा पाकर पुष्पदन्त आगे बढ़ा और दूसरे द्वारको लाँघकर भीतर चला गया। यह दूत युद्धकी सूचना पहुँचानेवाला है—यह सुनकर कोई भी उसे रोकता नहीं था। इस तरह नौ द्वारोंको लाँघकर पुष्पदन्त सबसे भीतरके द्वारपर पहुँच गया। वहाँ द्वारपालसे अनुमति लेकर वह भीतर गया। वहाँ जाकर देखा, परम मनोहर शङ्खचूड़ राजाओंके मध्यमें सुवर्णके सिंहासनपर बैठा था। उसके मस्तकपर सोनेका सुन्दर छत्र तना था, जिसे एक भृत्यने ले रखा था। उस छत्रमें मणियाँ जड़ी गयी थीं। वह विचित्र छत्र रत्नमय दण्डसे सुशोभित था। रत्ननिर्मित कृत्रिम पुष्प उसकी शोभाको और भी प्रशस्त कर रहे थे। सफेद एवं चमकीले चँवर हाथमें लेकर अनेक पार्षद शङ्खचूड़की सेवामें संलग्न थे। उत्तम वेष एवं रत्नमय भूषणोंसे विभूषित होनेके कारण वह बड़ा सुन्दर जान पड़ता था। मुने! उसके गलेमें माला थी। शरीरपर चन्दनका अनुलेपन था। वह दो महीन उत्तम वस्त्र पहिने हुए था। वह दानव उस समय सुन्दर वेषवाले असंख्य प्रसिद्ध दानवोंसे घिरा था और