ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १८५
तुम निरामय गोलोक-धाममें तुलसीकी अधिष्ठात्री देवी बनकर मेरे स्वरूपभूत श्रीकृष्णके साथ निरन्तर क्रीड़ा करोगी। तुम्हारी देहसे उत्पन्न नदीकी जो अधिष्ठात्री देवी है, वह भारतवर्षमें परम पुण्यदा नदी बनकर मेरे अंशभूत क्षार-समुद्रकी पत्नी होगी। स्वयं तुम महासाध्वी तुलसीरूपसे वैकुण्ठमें मेरे संनिकट निवास करोगी। वहाँ तुम लक्ष्मीके समान सम्मानित होओगी। गोलोकके रासमें भी तुम्हारी उपस्थिति होगी, इसमें संशय नहीं है।
मैं तुम्हारे शापको सत्य करनेके लिये भारतवर्षमें 'पाषाण' (शालग्राम) बनकर रहूँगा। गण्डकी नदीके तटपर मेरा वास होगा। वहाँ रहनेवाले करोड़ों कीड़े अपने तीखे दाँतरूपी आयुधोंसे काट-काटकर उस पाषाणमें मेरे चक्रका चिह्न करेंगे। जिसमें एक द्वारका चिह्न होगा, चार चक्र होंगे और जो वनमालासे विभूषित होगा, वह नवीन मेघके समान श्यामवर्णका पाषाण 'लक्ष्मी-नारायण' का बोधक होगा। जिसमें एक द्वार और चार चक्रके चिह्न होंगे तथा वनमालाकी रेखा नहीं प्रतीत होती होगी, ऐसे नवीन मेघकी तुलना करनेवाले श्यामरंगके पाषाणको 'लक्ष्मीजनार्दन' की संज्ञा दी जानी चाहिये। दो द्वार, चार चक्र और गायके खुरके चिह्नसे सुशोभित एवं वनमालाके चिह्नसे रहित श्याम पाषाणको भगवान् 'राघवेन्द्र' का विग्रह मानना चाहिये। जिसमें बहुत छोटे दो चक्रके चिह्न हों, उस नवीन मेघके समान कृष्णवर्णके पाषाणको भगवान् 'दधिवामन' मानना चाहिये, वह गृहस्थोंके लिये सुखदायक है। अत्यन्त छोटे आकारमें दो चक्र एवं वनमालासे सुशोभित पाषाण स्वयं भगवान् 'श्रीधर' का रूप है—ऐसा समझना चाहिये। ऐसी मूर्ति भी गृहस्थोंको सदा श्रीसम्पन्न बनाती है। जो पूरा स्थूल हो, जिसकी आकृति गोल हो, जिसके ऊपर वनमालाका चिह्न अङ्कित न हो तथा जिसमें दो अत्यन्त स्पष्ट चक्रके चिह्न दिखायी पड़ते हों, उस शालग्राम शिलाकी 'दामोदर' संज्ञा है। जो मध्यम श्रेणीका वर्तुलाकार हो, जिसमें दो चक्र तथा तरकस और बाणके चिह्न शोभा पाते हों, एवं जिसके ऊपर बाणसे कट जानेका चिह्न हो, उस पाषाणको रणमें शोभा पानेवाले भगवान् 'रणराम' की संज्ञा देनी चाहिये। जो मध्यम श्रेणीका पाषाण सात चक्रोंसे तथा छत्र एवं तरकससे अलंकृत हो, उसे भगवान् 'राजराजेश्वर' की प्रतिमा समझे। उसकी उपासनासे मनुष्योंको राजाकी सम्पत्ति सुलभ हो सकती है। चौदह चक्रोंसे सुशोभित तथा नवीन मेघके समान रंगवाले स्थूल पाषाणको भगवान् 'अनन्त' का विग्रह मानना चाहिये। उसके पूजनसे धर्म, अर्थ,
नित्यं यस्तुलसीतोयं भुङ्क्ते भक्त्या च मानवः। स एव जीवन्मुक्तश्च गङ्गास्नानफलं लभेत्॥
नित्यं यस्तुलसीं दत्त्वा पूजयेन्मां च मानवः। लक्षाश्वमेधजं पुण्यं लभते नात्र संशयः॥
तुलसीं स्वकरे कृत्वा देहे धृत्वा च मानवः। प्राणांस्त्यजति तीर्थेषु विष्णुलोकं स गच्छति॥
तुलसीकाष्ठनिर्माणमालां गृह्णाति यो नरः। पदे पदेऽश्वमेधस्य लभते निश्चितं फलम्॥
तुलसीं स्वकरे धृत्वा स्वीकारं यो न रक्षति। स याति कालसूत्रं च यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
करोति मिथ्या शपथं तुलस्या यो हि मानवः। स याति कुम्भीपाकं च यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥
तुलसीतोयकणिकां मृत्युकाले च यो लभेत्। रत्नयानं समारुह्य वैकुण्ठं स प्रयाति च॥
पूर्णिमायाममायां च द्वादश्यां रविसंक्रमे। तैलाभ्यङ्गे चास्नाते च मध्याह्ने निशि संध्ययोः॥
अशौचेऽशुचिकाले वा रात्रिवासोऽन्विता नराः। तुलसीं ये विचिन्वन्ति ते छिन्दन्ति हरेः शिरः॥
त्रिरात्रं तुलसीपत्रं शुद्धं पर्युषितं सति। श्राद्धे व्रते च दाने च प्रतिष्ठायां सुरार्चने॥
भूतं तोयपतितं यद्दत्तं विष्णवे सति। शुद्धं च तुलसीपत्रं क्षालनादन्यकर्मणि॥
(प्रकृतिखण्ड २१। ३२—५३)