ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सुशीलाको काम-शास्त्रका सम्यक् ज्ञान था। वह सम्पूर्ण भावसे भगवान् श्रीकृष्णमें अनुरक्त थी। उनके भावको जानती और उनका प्रिय किया करती थी।
एक समय परमेश्वरी श्रीराधाने सुशीलाको कह दिया—‘आजसे तुम गोलोकमें नहीं आ सकोगी।’
तदनन्तर श्रीकृष्ण वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब देवदेवेश्वरी भगवती श्रीराधा रासमण्डलके मध्य रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको जोर-जोरसे पुकारने लगीं; परंतु भगवान्ने उन्हें दर्शन नहीं दिये। तब तो श्रीराधा अत्यन्त विरहकातर हो उठीं। उन साध्वी देवीको विरहका एक-एक क्षण करोड़ों युगोंके समान प्रतीत होने लगा। उन्होंने करुण प्रार्थना की—‘श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! आप मेरे प्राणनाथ हैं। मैं आपके प्रति प्राणोंसे भी बढ़कर प्रेम करती हूँ। आप शीघ्र यहाँ पधारनेकी कृपा कीजिये। भगवन्! आप मेरे प्राणोंके अधिष्ठाता देव हैं। आपके बिना अब ये प्राण नहीं रह सकते। स्त्री पतिके सौभाग्यपर गर्व करती है। पतिके साथ प्रतिदिन उसका सुख बढ़ता रहता है। अतएव साध्वी स्त्रीको धर्मपूर्वक पतिकी सेवामें ही सदा तत्पर रहना चाहिये। पति ही कुलीन स्त्रियोंके लिये बन्धु, अधिदेवता, नित्य-आश्रय, परम सम्पत्तिस्वरूप तथा मूर्तिमान् सुख है। पति ही धर्म, सुख, निरन्तर प्रीति, सदा शान्ति, सम्मान एवं मान देनेवाला है। वही उसके लिये माननीय है, वही उसके मान (प्रणयकोप)-को शान्त करनेवाला है। स्वामी ही स्त्रीके लिये सारसे भी सारतम वस्तु है। वही बन्धुओंमें बन्धुभावको बढ़ानेवाला है। सम्पूर्ण बान्धवजनोंमें पतिके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं दिखायी देता। वह स्त्रीका भरण करनेसे ‘भर्ता’, पालन करनेसे ‘पति’, शरीरका मालिक होनेसे ‘स्वामी’ तथा कामनाकी पूर्ति करनेसे ‘कान्त’ कहलाता है।
सुखकी वृद्धि करनेसे ‘बन्धु’, प्रीति प्रदान करनेसे ‘प्रिय’, ऐश्वर्यका दाता होनेसे ‘ईश’, प्राणका स्वामी होनेसे ‘प्राणनाथ’ तथा रति-सुख प्रदान करनेसे ‘रमण’ कहलाता है। अतः स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। पतिके शुक्रसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है, इससे वह प्रिय माना जाता है। कुलाङ्गनाओंकी दृष्टिमें पति सदा सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर प्रिय है। जो असत् कुलमें उत्पन्न है, वह स्त्री पतिके इस महत्त्वको समझनेमें असमर्थ है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, अखिल यज्ञोंमें दक्षिणादान, पृथ्वीकी प्रदक्षिणा, अनेक प्रकारके तप, सभी व्रत, अमूल्य वस्तुदान, पवित्र उपासनाएँ तथा गुरु, देवता एवं ब्राह्मणोंकी सेवा—इन श्रेष्ठ कार्योंकी बड़ी प्रशंसा सुनी है; किंतु ये सब-के-सब स्वामीके चरण-सेवनकी सोलहवीं कलाकी भी तुलना नहीं कर सकते। गुरु, ब्राह्मण और देवता—इन सबकी अपेक्षा स्त्रीके लिये पति ही श्रेष्ठ गुरु है। जिस प्रकार पुरुषोंके लिये विद्या प्रदान करनेवाले गुरु आदरणीय माने जाते हैं, वैसे ही कुलीन स्त्रियोंके लिये पति ही गुरुतुल्य माननीय है।
‘हाय! मैं जिनके कृपा-प्रसादसे असंख्य गोपों, गोपियों, ब्रह्माण्डों तथा वहाँके निवासी प्राणियोंकी एवं रमा आदि देवियोंसे लेकर अखिल ब्रह्माण्ड गोलोकतककी अधीश्वरी हुई हूँ, उन्हीं प्राणवल्लभके तत्त्वको नहीं जान सकी; वास्तवमें स्त्रीस्वभावको लाँघ पाना बड़ा कठिन है।’
इस प्रकार कहकर श्रीराधा भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करने लगीं। फिर तो उन्होंने प्राणनाथको अपने समीप ही पाया और उनके साथ सानन्द विहार किया।
मुने! गोलोकसे भ्रष्ट हुई वह सुशीला नामवाली गोपी ही आगे चलकर दक्षिणा नामसे प्रसिद्ध हुई। उसने दीर्घकालतक तपस्या करके भगवती लक्ष्मीके शरीरमें प्रवेश किया। तदनन्तर अत्यन्त कठिन यज्ञ