भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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.. प्रकृतिखण्ड२७१

श्रीराधा और श्रीकृष्णके चरित्र तथा श्रीराधाकी पूजा-परम्पराका अत्यन्त संक्षिप्त परिचय

**श्रीमहादेवजी कहते हैं—**पार्वति! एक समयकी बात है, श्रीकृष्ण विरजा नामवाली सखीके यहाँ उसके पास थे। इससे श्रीराधाजीको क्षोभ हुआ। इस कारण विरजा वहाँ नदीरूप होकर प्रवाहित हो गयी। विरजाकी सखियाँ भी छोटी-छोटी नदियाँ बनीं। पृथ्वीकी बहुत-सी नदियाँ और सातों समुद्र विरजासे ही उत्पन्न हैं। राधाने प्रणयकोपसे श्रीकृष्णके पास जाकर उनसे कुछ कठोर शब्द कहे। सुदामाने इसका विरोध किया। इसपर लीलामयी श्रीराधाने उसे असुर होनेका शाप दे दिया। सुदामाने भी लीलाक्रमसे ही श्रीराधाको मानवीरूपमें प्रकट होनेकी बात कह दी। सुदामा माता राधा तथा पिता श्रीहरिको प्रणाम करके जब जानेको उद्यत हुआ तब श्रीराधा पुत्रविरहसे कातर हो आँसू बहाने लगीं। श्रीकृष्णने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और शीघ्र उसके लौट आनेका विश्वास दिलाया। सुदामा ही तुलसीका स्वामी शङ्खचूड़ नामक असुर हुआ था, जो मेरे शूलसे विदीर्ण एवं शापमुक्त हो पुनः गोलोक चला गया। सती राधा इसी वाराहकल्पमें गोकुलमें अवतीर्ण हुई थीं। वे व्रजमें वृषभानु वैश्यकी कन्या हुईं। वे देवी अयोनिजा थीं, माताके पेटसे नहीं पैदा हुई थीं। उनकी माता कलावतीने अपने गर्भमें ‘वायु’ को धारण कर रखा था। उसने योगमायाकी प्रेरणासे वायुको ही जन्म दिया; परंतु वहाँ स्वेच्छासे श्रीराधा प्रकट हो गयीं। बारह वर्ष बीतनेपर उन्हें नूतन यौवनमें प्रवेश करती देख माता-पिताने ‘रायाण’ वैश्यके साथ उसका सम्बन्ध निश्चित कर दिया। उस समय श्रीराधा घरमें अपनी छायाको स्थापित करके स्वयं अन्तर्धान हो गयीं। उस छायाके साथ ही उक्त रायाणका विवाह हुआ।

‘जगत्पति श्रीकृष्ण कंसके भयसे रक्षाके बहाने शैशवावस्थामें ही गोकुल पहुँचा दिये गये थे। वहाँ श्रीकृष्णकी माता जो यशोदा थीं, उनका सहोदर भाई ‘रायाण’ था। गोलोकमें तो वह श्रीकृष्णका अंशभूत गोप था, पर इस अवतारके समय भूतलपर वह श्रीकृष्णका मामा लगता था। जगत्स्रष्टा विधाताने पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णके साथ साक्षात् श्रीराधाका विधिपूर्वक विवाहकर्म सम्पन्न कराया था। गोपगण स्वप्नमें भी श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन नहीं कर पाते थे। साक्षात् राधा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें वास करती थीं और छायाराधा रायाणके घरमें। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन पानेके लिये पुष्करमें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी; उसी तपस्याके फलस्वरूप इस समय उन्हें श्रीराधा-चरणोंका दर्शन प्राप्त हुआ था। गोकुलनाथ श्रीकृष्ण कुछ कालतक वृन्दावनमें श्रीराधाके साथ आमोद-प्रमोद करते रहे। तदनन्तर सुदामाके शापसे उनका श्रीराधाके साथ वियोग हो गया। इसी बीचमें श्रीकृष्णने पृथ्वीका भार उतारा। सौ वर्ष पूर्ण हो जानेपर तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे श्रीराधाने श्रीकृष्णका और श्रीकृष्णने श्रीराधाका दर्शन प्राप्त किया। तदनन्तर तत्त्वज्ञ श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ गोलोकधाम पधारे। कलावती (कीर्तिदा) और यशोदा भी श्रीराधाके साथ ही गोलोक चली गयीं।

प्रजापति द्रोण नन्द हुए। उनकी पत्नी धरा यशोदा हुईं। उन दोनोंने पहले की हुई तपस्याके प्रभावसे परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था। महर्षि कश्यप वसुदेव हुए थे। उनकी पत्नी सती साध्वी अदिति अंशतः देवकीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं। प्रत्येक कल्पमें जब भगवान् अवतार लेते हैं, देवमाता अदिति तथा देवपिता कश्यप उनके माता-पिताका स्थान ग्रहण करते हैं। श्रीराधाकी माता कलावती (कीर्तिदा)