भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 300
२९०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ध्यान—

श्रीराधाकी अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके समान गौर है। वे अपने अङ्गोंमें करोड़ों चन्द्रमाओंके समान मनोहर कान्ति धारण करती हैं। उनका मुख शरद-ऋतुकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित करता है। दोनों नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनके श्रोणिदेश एवं नितम्बभाग बहुत ही सुन्दर हैं। अधर पके हुए बिम्बफलकी लाली धारण करते हैं। वे श्रेष्ठ सुन्दरी हैं। मुक्ताकी पंक्तियोंको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपङ्क्ति उनके मुखकी मनोहरताको बढ़ाती है। उनके वदनपर मन्द मुस्कानजनित प्रसन्नता खेलती रहती है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल रहती हैं। अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंको आच्छादित करते हैं। वे रत्नोंके हारसे विभूषित हैं। रत्नमय केयूर और कंगन धारण करती हैं। रत्नोंके ही बने हुए मंजीर उनके पैरोंकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्ननिर्मित विचित्र कुण्डल उनके दोनों कानोंकी श्रीवृद्धि करते हैं। सूर्यप्रभाकी प्रतिमारूप कपोल-युगलसे वे सुशोभित होती हैं। अमूल्य रत्नोंके बने हुए कण्ठहार उनके ग्रीवा-प्रदेशको विभूषित करते हैं। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित किरीट-मुकुट उनकी उज्ज्वलताको जाग्रत् किये रहते हैं। रत्नोंकी मुद्रिका और पाशक (चेन या पासा आदि) उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे मालतीके पुष्पों और हारोंसे अलंकृत केशपाश धारण करती हैं। वे रूपकी अधिष्ठात्री देवी हैं और गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चलती हैं। जो उन्हें अत्यन्त प्यारी हैं, ऐसी गोप-किशोरियाँ श्वेत चँवर लेकर उनकी सेवा करती हैं। कस्तूरीकी बेंदी, चन्दनके बिन्दु और सिन्दूरकी टीकीसे उनके मनोहर सीमन्तका निम्नभाग अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देता है। रासमें रासेश्वरके सहित विराजित रासेश्वरी राधाका मैं भजन करता हूँ।*


* श्वेतचम्पकवर्णाभां कोटिचन्द्रसमप्रभाम्।
शरत्पार्वणचन्द्रास्यां शरत्पङ्कजलोचनाम्। सुश्रोणीं सुनितम्बां च पक्वबिम्बाधरां वराम्॥
मुक्तापङ्क्तिविनिन्दैकदन्तपङ्क्तिमनोहराम् ।
ईषद्व्हासप्रसन्नास्यां भक्तानुग्रहकातराम्। वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नमालाविभूषिताम्॥
रत्नकेयूरवलयां रत्नमञ्जीररञ्जिताम्।
रत्नकुण्डलयुग्मेन विचित्रेण विराजिताम्। सूर्यप्रभाप्रतिकृतिगण्डस्थलविराजिताम् ॥
अमूल्यरत्ननिर्माणग्रैवेयकविभूषित ।
सद्रत्नसारनिर्माणकिरीटमुकुटोज्ज्वलाम् । रत्नाङ्गुलीयसंयुक्तां रत्नपाशकशोभिताम्॥
बिभ्रतीं कबरीभारं मालतीमाल्यभूषिताम् ।
रूपाधिष्ठातृदेवीं च गजेन्द्रमन्दगामिनीम्। गोपीभिः सुप्रियाभिश्च सेवितां श्वेतचामरैः॥
कस्तूरीविन्दुभिः सार्द्धमधश्चन्दनबिन्दुना । सिन्दूरबिन्दुना चारुसीमन्ताधःस्थ्लोज्ज्वलाम् ॥
रासे रासेश्वरयुतां राधां रासेश्वरीं भजे॥
(प्रकृतिखण्ड ५५। १०—१५, १९)