ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकृतिखण्ड | २९१ |
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इस प्रकार ध्यान कर मस्तकपर पुष्प अर्पित करके पुनः जगदम्बा श्रीराधाका चिन्तन करे और फूल चढ़ावे। पुनः ध्यानके पश्चात् सोलह उपचार अर्पित करे। आसन, वसन, पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, अनुलेपन, धूप, दीप, सुन्दर पुष्प, स्नानीय, रत्नभूषण, विविध नैवेद्य, सुवासित ताम्बूल, जल, मधुपर्क तथा रत्नमयी शय्या—ये सोलह उपचार हैं। राजाने इनमेंसे प्रत्येकको वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक भक्तिभावसे अर्पित किया। शिवे ! इन उपचारोंके समर्पणके लिये जो सर्वसम्मत मन्त्र हैं, उन्हें सुनो।
( १ ) आसन
रत्नसारविकारं च निर्मितं विश्वकर्मणा।
वरं सिंहासनं रम्यं राधे पूजासु गृह्यताम् ॥
राधे ! पूजाके अवसरपर विश्वकर्माद्वारा रचित रमणीय श्रेष्ठ सिंहासन, जो रत्नसारका बना हुआ है, ग्रहण करो।*
( २ ) वसन
अमूल्यरत्नखचितममूल्यं सूक्ष्ममेव च।
वह्निशुद्धं निर्मलं च वसनं देवि गृह्यताम् ॥
देवि ! बहुमूल्य रत्नोंसे जटिल सूक्ष्म वस्त्र, जिसका मूल्य आँका नहीं जा सकता, आपकी सेवामें प्रस्तुत है। यह अग्निसे शुद्ध किया गया, चिन्मय एवं स्वभावतः निर्मल है। इसे स्वीकार करो।
( ३ ) पाद्य
सद्रत्नसारपात्रस्थं सर्वतीर्थोदकं शुभम्।
पादप्रक्षालनार्थं च राधे पाद्यं च गृह्यताम् ॥
राधे ! उत्तम रत्नसारद्वारा निर्मित पात्रमें सम्पूर्ण तीर्थोंका शुभ जल तुम्हारी सेवामें अर्पित किया गया है। तुम्हारे दोनों चरणोंको पखारनेके लिये यह पाद्य जल है। इसे ग्रहण करो।
( ४ ) अर्घ्य
दक्षिणावर्त्तशङ्खस्थं सद्दुर्वापुष्पचन्दनम्।
पूतं युक्तं तीर्थतोयै राधेऽर्घ्यं प्रतिगृह्यताम्॥
राधे! दक्षिणावर्त शङ्खमें रखा हुआ दूर्वा, पुष्प, चन्दन तथा तीर्थजलसे युक्त यह पवित्र अर्घ्य प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो।
( ५ ) गन्ध
पार्थिवद्रव्यसम्भूतमतीवसुरभीकृतम् ।
मङ्गलार्हं पवित्रं च राधे गन्धं गृहाण मे॥
राधे ! पार्थिव द्रव्योंसे सम्भूत अत्यन्त सुगन्धित मङ्गलोपयोगी तथा पवित्र गन्ध मुझसे ग्रहण करो।
( ६ ) अनुलेपन ( चन्दन )
श्रीखण्डचूर्णं सुस्निग्धं कस्तूरीकुङ्कुमान्वितम्।
सुगन्धयुक्तं देवेशि गृह्यतामनुलेपनम् ॥
देवेश्वरि ! कस्तूरी, कुङ्कुम और सुगन्धसे युक्त यह सुस्निग्ध चन्दनचूर्ण अनुलेपनके रूपमें तुम्हारे सामने प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो।
( ७ ) धूप
वृक्षनिर्याशसंयुक्तं पार्थिवद्रव्यसंयुतम् ।
अग्निखण्डशिखाजातं धूपं देवि गृहाण मे॥
देवि ! वृक्षकी गोंद (गुग्गुल) तथा पार्थिव द्रव्योंसे संयुक्त यह धूप प्रज्वलित अग्निशिखासे निर्गत धूमके रूपमें प्रस्तुत है। मेरी इस वस्तुको ग्रहण करो।
( ८ ) दीप
अन्धकारे भयहरममूल्यमणिशोभितम्।
रत्नप्रदीपं शोभाढ्यं गृहाण परमेश्वरि॥
परमेश्वरि ! अमूल्य रत्नोंका बना हुआ यह परम उज्ज्वल शोभाशाली रत्नप्रदीप अन्धकार-
* आसन आदिके स्थानपर साधारण लोग पुष्प आदिका आसन तथा अन्य उपचार, जो सर्वसुलभ हैं, दे सकते हैं; परंतु मानसिक भावनाद्वारा उसे रत्नसिंहासन आदि मानकर ही अर्पित करें। इस भावनाके अनुसार ये पूजासम्बन्धी मन्त्र हैं। मानसिक भावनाद्वारा उत्तम-से-उत्तम वस्तु इष्टदेवको अर्पित की जा सकती है।