भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 302

२९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भयको दूर करनेवाला है। इसे स्वीकार करो।

(९) पुष्प

पारिजातप्रसूनं च गन्धचन्दनचर्चितम्।
अतीव शोभनं रम्यं गृह्यतां परमेश्वरि॥

परमेश्वरि! गन्ध और चन्दनसे चर्चित, अत्यन्त शोभायमान यह रमणीय पारिजात-पुष्प ग्रहण करो।

(१०) स्नानीय

सुगन्धामलकीचूर्णं सुस्निग्धं सुमनोहरम्।
विष्णुतैलसमायुक्तं स्नानीयं देवि गृह्यताम्॥

देवि! विष्णुतैलसे युक्त यह अत्यन्त मनोहर एवं सुस्निग्ध सुगन्धित आँवलेका चूर्ण सेवामें प्रस्तुत है। इस स्नानोपयोगी वस्तुको तुम स्वीकार करो।

(११) भूषण

अमूल्यरत्ननिर्माणं केयूरवलयादिकम्।
शङ्खं सुशोभनं राधे गृह्यतां भूषणं मम॥

राधे! अमूल्य रत्नोंके बने हुए केयूर, कङ्कण आदि आभूषणोंको तथा परम शोभाशाली शङ्खकी चूड़ियोंको मेरी ओरसे ग्रहण करो।

(१२) नैवेद्य

कालदेशोद्भवं पक्वफलं च लड्डुकादिकम्।
परमान्नं च मिष्टान्नं नैवेद्यं देवि गृह्यताम्॥

देवि! देश-कालके अनुसार उपलब्ध हुए पके फल तथा लड्डू आदि उत्तम मिष्टान्न नैवेद्यके रूपमें प्रस्तुत किया गया है। इसे स्वीकार करो।

(१३) ताम्बूल और (१४) जल

ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्।
सर्वभोगाधिकं स्वादु सलिलं देवि गृह्यताम्॥

देवि! कर्पूर आदिसे सुवासित, सब भोगोंसे उत्कृष्ट, रमणीय एवं सुन्दर ताम्बूल तथा स्वादिष्ट जल ग्रहण करो।


(१५) मधुपर्क

अशनं रत्नपात्रस्थं सुस्वादु सुमनोहरम्।
मया निवेदितं भक्त्या गृह्यतां परमेश्वरि॥

परमेश्वरि! रत्नमय पात्रमें रखा हुआ यह अशन (मधुपर्क) अत्यन्त स्वादिष्ट तथा परम मनोहर है। मैंने भक्तिभावसे इसे सेवामें समर्पित किया है। कृपया स्वीकार करो।

(१६) शय्या

रत्नेन्द्रसारनिर्माणं वह्निशुद्धांशुकान्वितम्।
पुष्पचन्दनचर्चाढ्यं पर्यङ्कं देवि गृह्यताम्॥

देवि! श्रेष्ठ रत्नोंके सारभागसे निर्मित, अग्निशुद्ध निर्मल वस्त्रसे आच्छादित तथा पुष्प और चन्दनसे चर्चित यह शय्या प्रस्तुत है। इसे ग्रहण करो।

इस प्रकार देवी श्रीराधाका सम्यक् पूजन करके उनके लिये तीन बार पुष्पाञ्जलि दे तथा देवीकी आठ नायिकाओंका, जो उनकी परम प्रिया परिचारिकाएँ हैं, यत्नपूर्वक भक्तिभावसे पञ्चोपचार पूजन करे। प्रिये! उनके पूजनका क्रम पूर्व आदिसे आरम्भ करके दक्षिणावर्त बताया गया है। पूर्वदिशामें मालावती, अग्निकोणमें माधवी, दक्षिणमें रत्नमाला, नैर्ऋत्यकोणमें सुशीला, पश्चिममें शशिकला, वायव्यकोणमें पारिजाता, उत्तरमें पद्मावती तथा ईशानकोणमें सुन्दरीकी पूजा करे।

व्रती पुरुष व्रतकालमें यूथिका (जूही), मालती और कमलोंकी माला चढ़ावे। तत्पश्चात् सामवेदोक्त रीतिसे परिहार नामक स्तुति करे—

परिहारके मन्त्र इस प्रकार हैं—

त्वं देवी जगतां माता विष्णुमाया सनातनी।
कृष्णप्राणाधिदेवी च कृष्णप्राणाधिका शुभा॥
कृष्णप्रेममयी शक्तिः कृष्णसौभाग्यरूपिणी।
कृष्णभक्तिप्रदे राधे नमस्ते मङ्गलप्रदे॥
अद्य मे सफलं जन्म जीवनं सार्थकं मम।
पूजितासि मया सा च या श्रीकृष्णेन पूजिता॥