ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २९३ कृष्णवक्षसि या राधा सर्वसौभाग्यसंयुता। रासे रासेश्वरीरूपा वृन्दा वृन्दावने वने॥ कृष्णप्रिया च गोलोके तुलसी कानने तु या। चम्पावती कृष्णसङ्गे क्रीडा चम्पककानने॥ चन्द्रावली चन्द्रवने शतशृङ्गे सतीति च। विरजादर्पहन्त्री च विरजातटकानने॥ पद्मावती पद्मवने कृष्णा कृष्णसरोवरे। भद्रा कुञ्जकुटीरे च काम्या वै काम्यके वने॥ वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्वाणी नारायणोरसि। क्षीरोदे सिन्धुकन्या च मर्त्ये लक्ष्मीर्हरिप्रिया॥ सर्वस्वर्गे स्वर्गलक्ष्मीर्देवदुःखविनाशिनी। सनातनी विष्णुमाया दुर्गा शङ्करवक्षसि॥ सावित्री वेदमाता च कलया ब्रह्मवक्षसि। कलया धर्मपत्नी त्वं नरनारायणप्रसूः॥ कलया तुलसी त्वं च गङ्गा भुवनपावनी। लोमकूपोद्भवा गोप्यः कलांशा रोहिणी रतिः॥ कलाकलांशरूपा च शतरूपा शची दितिः। अदितिर्देवमाता च त्वत्कलांशा हरिप्रिया॥ देव्यश्च मुनिपत्न्यश्च त्वत्कलाकलया शुभे। कृष्णभक्तिं कृष्णदास्यं देहि मे कृष्णपूजिते॥ एवं कृत्वा परीहारं स्तुत्वा च कवचं पठेत्। पुराकृतं स्तोत्रमेतद्भक्तिदास्यप्रदं शुभम्॥ ( प्रकृतिखण्ड ५५। ४४-५७ ) तुलसी, कृष्णसंगमें चम्पावती, चम्पक-काननमें क्रीडा, चन्द्रवनमें चन्द्रावली, शतशृङ्ग पर्वतपर सती, विरजातटवर्ती काननमें विरजादर्पहन्त्री, पद्मवनमें पद्मावती, कृष्णसरोवरमें कृष्णा, कुञ्जकुटीरमें भद्रा, काम्यकवनमें काम्या, वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, नारायणके हृदयमें वाणी, क्षीरसागरमें सिन्धुकन्या, मर्त्यलोकमें हरिप्रिया लक्ष्मी, सम्पूर्ण स्वर्गमें देवदुःखविनाशिनी स्वर्गलक्ष्मी तथा शंकरके वक्षःस्थलपर सनातनी विष्णुमाया दुर्गा हैं। वही अपनी कलाद्वारा वेदमाता सावित्री होकर ब्रह्मवक्षमें विलास करती हैं। देवि राधे ! तुम्हीं अपनी कलासे धर्मकी पत्नी एवं मुनि नर-नारायणकी जननी हो। तुम्हीं अपनी कलाद्वारा तुलसी तथा भुवनपावनी गङ्गा हो। गोपियाँ तुम्हारे रोमकूपोंसे प्रकट हुई हैं। रोहिणी तथा रति तुम्हारी कलाकी अंशस्वरूपा हैं। शतरूपा, शची और दिति तुम्हारी कलाकी कलांशरूपिणी हैं। देवमाता हरिप्रिया अदिति तुम्हारी कलांशरूपा हैं। शुभे ! देवाङ्गनाएँ और मुनिपत्नियां तुम्हारी कलाकी कलासे प्रकट हुई हैं। कृष्णपूजिते ! तुम मुझे श्रीकृष्णकी भक्ति और श्रीकृष्णका दास्य प्रदान करो। इस प्रकार परिहार एवं स्तुति करके कवचका पाठ करे। यह प्राचीन शुभ स्तोत्र श्रीहरिकी भक्ति एवं दास्य प्रदान करनेवाला है। श्रीराधे ! तुम देवी हो। जगज्जननी सनातनी विष्णुमाया हो। श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी तथा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। शुभस्वरूपा हो। कृष्णप्रेममयी शक्ति तथा श्रीकृष्णसौभाग्यरूपिणी हो। श्रीकृष्णकी भक्ति प्रदान करनेवाली मङ्गलदायिनी राधे ! तुम्हें नमस्कार है। आज मेरा जन्म सफल है। आज मेरा जीवन सार्थक हुआ; क्योंकि श्रीकृष्णने जिसकी पूजा की है, वही देवी आज मेरे द्वारा पूजित हुई। श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें जो सर्वसौभाग्यशालिनी राधा हैं, वे ही रासमण्डलमें रासेश्वरी, वृन्दावनमें वृन्दा, गोलोकमें कृष्णप्रिया, तुलसी-काननमें इस प्रकार जो प्रतिदिन श्रीराधाकी पूजा करता है, वह भारतवर्षमें साक्षात् विष्णुके समान है। जीवन्मुक्त एवं पवित्र है। उसे निश्चय ही गोलोकधामकी प्राप्ति होती है। शिवे ! जो प्रतिवर्ष कार्तिककी पूर्णिमाको इसी क्रमसे राधाकी पूजा करता है, वह राजसूय-यज्ञके फलका भागी होता है। इहलोकमें उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न एवं पुण्यवान् होता है और अन्तमें सब पापोंसे मुक्त हो श्रीकृष्णधाममें जाता है। पार्वति ! आदिकालमें पहले श्रीकृष्णने इसी क्रमसे वृन्दावनके रासमण्डलमें श्रीराधाकी स्तुति एवं पूजा की थी। दूसरी बार