ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण तुम्हारे वरसे वेदमाता सावित्रीको पाकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने इसी क्रमसे राधाका पूजन किया था। नारायणने भी श्रीराधाकी आराधना करके महालक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा भुवनपावनी पराशक्ति तुलसीको प्राप्त किया था। क्षीरसागरशायी श्रीविष्णुने राधाकी आराधना करके ही सिन्धुसुताको प्राप्त किया था। पहले दक्षकन्याकी मृत्यु हो जानेपर मैंने भी श्रीकृष्णकी आज्ञासे पुष्करमें श्रीराधाकी पूजा की और उसके प्रभावसे तुम्हें प्राप्त किया। पतिव्रता श्रीराधाकी पूजा करके उनके दिये हुए वरसे कामदेवने रतिको, धर्मदेवने सती साध्वी मूर्तिको तथा देवताओं और मुनियोंने धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षको प्राप्त किया था। इस प्रकार मैंने श्रीराधाकी पूजाका विधान बताया है। अब स्तोत्र सुनो। एक बार श्रीराधाजी मान करके श्रीकृष्णके समीपसे अन्तर्धान हो गयीं। तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता ऐश्वर्यभ्रष्ट, श्रीहीन, भार्यारहित तथा उपद्रवग्रस्त हो गये। इस परिस्थितिपर विचार करके उन सबने भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली। उनके स्तोत्रसे संतुष्ट हुए सबके परमात्मा श्रीकृष्णने स्नान करके शुद्ध हो सती राधिकाकी पूजा करके उनका इस प्रकार स्तवन किया। श्रीकृष्ण बोले- सुमुखि श्रीराधे! क्या मैं इसी प्रकार तुम्हारा प्रिय हूँ और मुझमें तुम्हारी प्रीति है? तुम्हारी वाणीमें जो छलना थी, वह आज अच्छी तरह प्रकट हो गयी। 'हे कृष्ण ! तुम मेरे प्राण हो, जीवात्मा हो' इस तरहकी बातें जो तुम नित्य-निरन्तर प्रेमपूर्वक कहा करती थीं, वे अब तत्काल कहाँ चली गयीं? मैं पहले तुम्हारे सामने जो कुछ कहता था, मेरा वचन आज भी ध्रुव सत्य है। 'तुम मेरे पाँचों प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हो', 'राधा मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है' - मेरी ये बातें जैसे पहले सत्य थीं, उसी तरह आज भी हैं। मैं तुम्हें अपने पास रखनेमें समर्थ न हो सका, अतः तुम्हारे बिना मेरे प्राण चले जा रहे हैं। अधिष्ठात्री देवीके बिना कौन कहाँ जीवित रह सकता है ? तुम महाविष्णुकी माता, मूलप्रकृति ईश्वरी हो। अपनी कलासे तुम सगुणरूपमें प्रकट होती हो। स्वयं तो निर्गुणा (प्राकृत गुणोंसे रहित) ही हो। ज्योतिःपुञ्ज ही तुम्हारा स्वरूप है। तुम वास्तवमें निराकार हो। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही तुम रूप धारण करती हो। भक्तोंकी विभिन्न रुचिके कारण नाना प्रकारकी मूर्तियाँ ग्रहण करती हो। वैकुण्ठमें महालक्ष्मी और सरस्वतीके रूपमें तुम्हारा ही निवास है। पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें सत्पुरुषोंकी जननी भी तुम्हीं हो। सती और पार्वतीके रूपमें तुम्हारा ही प्राकट्य हुआ है। तुम्हीं पुण्यरूप तुलसी और भुवनपावनी गङ्गा हो। ब्रह्मलोकमें सावित्रीके रूपमें तुम्हीं रहती हो। तुम्हीं अपनी कलासे वसुन्धरा हुई हो, गोलोकमें तुम्हीं समस्त गोपालोंकी अधीश्वरी राधा हो। तुम्हारे बिना मैं निर्जीव हूँ। किसी भी कर्मको करनेमें असमर्थ हूँ। तुम्हें शक्तिके रूपमें पाकर ही शिव शक्तिमान् हैं। तुम्हारे बिना वे शिव नहीं, शव हैं। तुम्हें ही वेदमाता सावित्रीके रूपमें अपने साथ पाकर साक्षात् ब्रह्माजी वेदोंके प्राकट्यकर्ता माने गये हैं। तुम लक्ष्मीका सहयोग मिलनेसे ही जगत्पालक नारायण जगत्का पालन करते हैं। तुम्हीं दक्षिणारूपसे साथ रहती हो, इसलिये यज्ञ फल देता है। पृथ्वीके रूपमें तुम्हें मस्तकपर धारण करके ही शेषनाग सृष्टिका संरक्षण करते हैं। गङ्गाधर शिव तुम्हें ही गङ्गारूपमें अपने मस्तकपर धारण करते हैं। तुमसे ही सारा जगत् शक्तिमान् है। तुम्हारे बिना सब कुछ शव (मृतक)-के तुल्य है। तुम वाणी हो। तुम्हें पाकर ही सब लोग वक्ता बनते हैं। तुम्हारे बिना पौराणिक सूत भी मूक हो जाता है। जैसे कुम्हार सदा मिट्टीके सहयोगसे ही घड़ा बनानेमें समर्थ होता है, उसी प्रकार