ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २९५ तुम प्रकृतिदेवीके साथ ही मैं सृष्टि-रचनामें सफल होता हूँ। तुम्हारे बिना मैं सर्वत्र जड हूँ। कहीं भी शक्तिमान् नहीं हूँ। तुम्हीं सर्वशक्तिस्वरूपा हो। अतः मेरे निकट आओ। अग्निमें तुम्हीं दाहिकाशक्ति हो। तुम्हारे बिना अग्नि दाहकर्ममें समर्थ नहीं हैं। चन्द्रमामें तुम्हीं शोभा बनकर रहती हो। तुम्हारे बिना चन्द्रमा सुन्दर नहीं लगेगा। सूर्यमें तुम्हीं प्रभा हो। तुम्हारे बिना सूर्यदेव प्रभापूर्ण नहीं रह सकते। प्रिये! तुम्हीं रति हो। तुम्हारे बिना कामदेव कामिनियोंके प्राणवल्लभ नहीं हो सकते। इस प्रकार श्रीराधाकी स्तुति करके जगत्प्रभु श्रीकृष्णने उन्हें प्राप्त किया। फिर तो सब देवता सश्रीक, सस्त्रीक और शक्तिसम्पन्न हो गये। गिरिराजनन्दिनि ! तदनन्तर सारा जगत् सस्त्रीक हो गया। श्रीराधाकी कृपासे गोलोक गोपाङ्गनाओंसे परिपूर्ण हो गया। इसी प्रकार हरिप्रिया श्रीराधाकी स्तुति करके राजा सुयज्ञ गोलोकधाममें चले गये। जो मनुष्य श्रीकृष्णद्वारा किये गये इस राधास्तोत्रका पाठ करता है, वह श्रीकृष्णकी भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। स्त्रीसे वियोग होनेपर जो पवित्रभावसे एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह शीघ्र ही सती, सुन्दरी और सुशीला स्त्रीको प्राप्त कर लेता है। जो भार्या और सौभाग्यसे हीन है, वह यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो उसे भी शीघ्र ही सुन्दरी, सुशीला एवं सती भार्याकी प्राप्ति हो जाती है। पार्वति ! पूर्वकालमें जब दक्ष-कन्या सतीकी मृत्यु हो गयी थी, तब परमात्मा श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर मैंने इसी स्तोत्रसे श्रीराधाकी स्तुति की और तुम्हें पा लिया। पूर्वकालमें ब्रह्माजीको भी इसी स्तोत्रके प्रभावसे सावित्रीकी प्राप्ति हुई थी। पूर्वकालमें दुर्वासाके शापसे जब देवतालोग श्रीहीन हो गये, तब इसी स्तोत्रसे श्रीराधाकी स्तुति करके उन्होंने परम दुर्लभ लक्ष्मी प्राप्त की थी। पुत्रकी इच्छावाला पुरुष यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो उसे पुत्र प्राप्त हो जाता है। इस स्तोत्रके प्रसादसे मनुष्य बहुत बड़ी व्याधि एवं रोगोंसे मुक्त हो जाता है। जो कार्तिककी पूर्णिमाको श्रीराधाका पूजन करके इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह अविचल लक्ष्मीको पाता है तथा राजसूय- यज्ञके फलका भागी होता है। यदि नारी इस स्तोत्रका श्रवण करे तो वह पतिके सौभाग्यसे सम्पन्न होती है। जो भक्तिपूर्वक इस स्तोत्रको सुनता है, वह निश्चय ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो प्रतिदिन भक्तिभावसे श्रीराधाकी पूजा करके प्रेमपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह भवबन्धनसे मुक्त हो गोलोकधाममें जाता है। (अध्याय ५५) श्रीजगन्मङ्गल-राधाकवच तथा उसकी महिमा श्रीपार्वती बोलीं- श्रीराधाकी पूजाका विधान और स्तोत्र अत्यन्त अद्भुत है, उसे मैंने सुन लिया। अब राधाकवचका वर्णन कीजिये। आपकी कृपासे उसे भी सुनूँगी। श्रीमहेश्वरने कहा- दुर्गे ! सुनो। मैं परम अद्भुत राधाकवचका वर्णन आरम्भ करता हूँ। पूर्वकालमें साक्षात् परमात्मा श्रीकृष्णने गोलोकमें इस अति गोपनीय परम तत्त्वरूप तथा सर्वमन्त्रसमूहमय कवचका मुझसे वर्णन किया था। यह वही कवच है, जिसे धारण करके पाठ करनेसे ब्रह्माने वेदमाता सावित्रीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। सुरेश्वरि ! तुम सर्वलोकजननी हो। मुझे तुम्हारा स्वामी होनेका जो सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वह इस कवचको धारण करनेका ही प्रभाव