ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण है। इसीको धारण करके भगवान् नारायणने महालक्ष्मीको प्राप्त किया। इसीको धारण करनेसे प्रकृतिसे परवर्ती निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्ण पूर्वकालमें सृष्टिरचना करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हुए। जगत्पालक विष्णुने इसीको धारण करके सिन्धुकन्याको प्राप्त किया। इसी कवचके प्रभावसे शेषनाग समस्त ब्रह्माण्डको अपने मस्तकपर सरसोंके दानेकी भाँति धारण करते हैं। इसीका आश्रय ले महाविराट् प्रत्येक रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्डोंको धारण करते हैं और सबके आधार बने हैं। इस कवचका धारण और पाठ करनेसे धर्म सबके साक्षी और कुबेर धनाध्यक्ष हुए हैं। इसके पाठ और धारणका ही यह प्रभाव है कि इन्द्र देवताओंके स्वामी तथा मनु नरेशोंके भी सम्राट् हुए हैं। इसके पाठ और धारणसे ही श्रीमान् चन्द्रदेव राजसूय-यज्ञ करनेमें सफल हुए और सूर्यदेव तीनों लोकोंके ईश्वर-पदपर प्रतिष्ठित हो सके। इसका मनके द्वारा धारण और वाणीद्वारा पाठ करनेसे अग्निदेव जगत्को पवित्र करते हैं तथा पवनदेव मन्दगतिसे प्रवाहित हो तीनों भुवनोंको पावन बनाते हैं। इस कवचको ही धारण करनेका यह प्रभाव है कि मृत्युदेव समस्त प्राणियोंमें स्वच्छन्दगतिसे विचरते हैं। इसके पाठ और धारणसे ही सशक्त हो जमदग्निनन्दन परशुरामने पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे सूनी कर दिया और कुम्भज ऋषिने समुद्रको पी लिया। इसे धारण करके ही भगवान् सनत्कुमार ज्ञानियोंके गुरु हुए हैं और नर-नारायण ऋषि जीवन्मुक्त एवं सिद्ध हो गये हैं। इसीके धारण और पठनसे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ सिद्ध हो गये हैं। कपिल सिद्धोंके स्वामी हुए हैं। इसीके प्रभावसे प्रजापति दक्ष और भृगु मुझसे निर्भय होकर द्वेष करते हैं, कूर्म शेषको भी धारण करते हैं, वायुदेव सबके आधार हुए हैं और वरुण सबको पवित्र करनेवाले हो सके हैं। शिवे ! इसीके प्रभावसे ईशान दिक्पाल और यम शासक हुए हैं। इसीका आश्रय लेनेसे काल एवं कालाग्निरुद्र तीनों लोकोंका संहार करनेमें समर्थ हो सके हैं। इसीको धारण करके गौतम सिद्ध हुए, कश्यप प्रजापतिके पदपर प्रतिष्ठित हो सके और मुनिवर दुर्वासाने अपनी पत्नीका वियोग होनेपर पूर्वकालमें देवीकी कलास्वरूपा वसुदेवकुमारी एकानंशाको प्राप्त किया। पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रजीने रावणद्वारा हरी हुई सीताको इसी कवचके प्रतापसे प्राप्त किया। राजा नलने इसीके पाठसे सती दमयन्तीको पाया। महावीर शङ्खचूड़ इसीके प्रभावसे दैत्योंका स्वामी हुआ। दुर्गे ! इसीका आश्रय लेनेसे वृषभ नन्दिकेश्वर मुझको वहन करते हैं और गरुड़ श्रीहरिके वाहन हो सके हैं। पूर्वकालके सिद्धों और मुनियोंने इसीके प्रभावसे सिद्धि प्राप्त की। इसीको धारण करके महालक्ष्मी सम्पूर्ण सम्पदाओंको देनेमें समर्थ हुईं। सरस्वतीको सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ तथा कामपत्नी रति क्रीड़ामें कुशल हो सकी। वेदमाता सावित्रीने इस कवचके प्रभावसे ही सिद्धि प्राप्त की। सिन्धुकन्या इसीके बलसे मर्त्यलक्ष्मी और विष्णुकी पत्नी हुईं। इसीको धारण करके तुलसी पवित्र और गङ्गा भुवनपावनी हुईं। इसका आश्रय लेकर ही वसुन्धरा सबकी आधारभूमि तथा सम्पूर्ण शस्योंसे सम्पन्न हुईं। इसको धारण करनेसे मनसादेवी विश्वपूजित सिद्धा हुईं और देवमाता अदितिने भगवान् विष्णुको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। लोपामुद्रा और अरुन्धतीने इस कवचको धारण करके ही पतिव्रताओंमें ऊँचा स्थान प्राप्त किया तथा सती देवहूतिने इसीके प्रभावसे कपिल-जैसा पुत्र पाया। शतरूपाने जो प्रियव्रत और उत्तानपाद- जैसे पुत्र प्राप्त किये तथा तुम्हारी माता मेनाने भी जो तुम-जैसी देवी गिरिजाको पुत्रीके रूपमें पाया, वह इस कवचका ही माहात्म्य है। इस प्रकार समस्त सिद्धगणोंने राधाकवचके प्रभावसे सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त किये हैं।