भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 810 में से

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पृष्ठ 337

गणपतिखण्ड

जाती है और वे ही उसका फल प्रदान करते हैं। जो जिस रूपसे उनका ध्यान करता है, उसे उसी रूपसे उसका फल देते हैं। अतः शिवे! तुम शिवको दक्षिणारूपमें देकर अपना व्रत पूर्ण करो। फिर समुचित मूल्य देकर अपने स्वामीको वापस कर लेना। शुभे! जैसे गौएँ विष्णुकी देहस्वरूपा हैं, उसी प्रकार शिव भी विष्णुके शरीर हैं; अतः तुम ब्राह्मणको गोमूल्य प्रदान करके अपने स्वामीको लौटा लेना। यह बात श्रुतिसम्मत है; क्योंकि जैसे स्वामी यज्ञपत्नीका दान करनेके लिये सदैव समर्थ है, उसी तरह यज्ञपत्नी भी स्वामीको दे डालनेकी अधिकारिणी है।

सभाके बीच यों कहकर नारायण वहीं अन्तर्धान हो गये। इसे सुनकर सभी सभासद् हर्षविभोर हो गये तथा हर्ष-गद्गद हुई पार्वती दक्षिणा देनेको उद्यत हुईं। तदनन्तर शिवाने हवनकी पूर्णाहुति करके शिवको दक्षिणारूपमें दे दिया और उधर सनत्कुमारजीने उस देवसभामें 'स्वस्ति' ऐसा कहकर दक्षिणा ग्रहण कर ली। उस समय भयभीत होनेके कारण दुर्गाका कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गया था, वे हाथ जोड़कर दुःखी हृदयसे ब्राह्मणसे बोलीं।

**पार्वतीजीने कहा—**विप्रवर! 'गौका मूल्य मेरे पतिके बराबर है'—ऐसा वेदमें कहा गया है, अतः मैं आपको एक लाख गौएँ प्रदान करूँगी। आप मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। पतिके मिल जानेपर मैं ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ बाँटूँगी। (अभी तो मैं आत्महीन हूँ, ऐसी दशामें) भला, आत्मासे रहित शरीर कौन-सा कर्म करनेमें समर्थ हो सकता है?

**सनत्कुमारजी बोले—**देवि! मैं ब्राह्मण हूँ। मुझे एक लाख गौओंसे क्या प्रयोजन है और इस अमूल्य रत्नको गौओंके बदले देनेसे भी क्या लाभ होगा? त्रिलोकीमें सभी लोग स्वयं अपने-अपने कर्मके कर्ता हैं। क्या कर्ताका अभीष्ट कर्म कहीं दूसरेकी इच्छासे होता है? मैं इन दिगम्बरको आगे करके तीनों लोकोंमें भ्रमण करूँगा। उस समय ये बालक-बालिकाओंके समुदायके लिये हँसीके कारण होंगे।

मुने! उस देवसभामें यों कहकर ब्रह्माके पुत्र तेजस्वी सनत्कुमारने शंकरजीको अपने संनिकट बैठा लिया। इस प्रकार कुमारद्वारा शंकरजीको ग्रहण किये जाते देखकर पार्वतीके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये। वे शरीर छोड़ देनेके लिये उद्यत हो गयीं। उस समय वे मन-ही-मन सोचने लगीं कि यह कैसी कठिन बात हुई कि न तो अभीष्टदेवका दर्शन मिला और न व्रतका फल ही प्राप्त हुआ। इसी बीच पार्वतीसहित देवताओंने आकाशमें एक परमोत्कृष्ट तेजसमूह देखा। उसकी प्रभा करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे उत्कृष्ट थी, वह दसों दिशाओंको प्रज्वलित कर रहा था और सम्पूर्ण देवताओंसे युक्त कैलास पर्वतको तथा सबको आच्छादित कर रहा था। उसकी मण्डलाकृति बड़ी विस्तृत थी। भगवान्‌के उस तेजको देखकर देवता लोग क्रमशः उनकी स्तुति करने लगे।

**विष्णुने कहा—**भगवन्! यह जो महाविराट् है, जिसके रोमछिद्रोंमें सभी ब्रह्माण्ड वर्तमान हैं, वह जब आपका सोलहवाँ अंश है, तब हम लोगोंकी क्या गणना है?

**ब्रह्माने कहा—**परमेश्वर! जो वेदोंके उपयुक्त दृश्य है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन करने, स्तवन करने तथा वर्णन करनेमें मैं समर्थ हूँ; परंतु जो वेदोंसे परे है, उसकी मैं क्या स्तुति करूँ?

**श्रीमहादेवजीने कहा—**भगवन्! जो सबके लिये अनिर्वचनीय, स्वेच्छामय, व्यापक और ज्ञानसे परे हैं, उन आपका मैं ज्ञानका अधिष्ठातृदेवता होकर किस प्रकार स्तवन करूँ?

**धर्मने कहा—**जो अदृश्य होते हुए भी अवतारके समय सभी प्राणियोंके लिये दृश्य हो

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