भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वैकुण्ठवासी भगवान् उस विमानसे उतरकर हर्षपूर्वक उस सभामें आये। फिर तो सुरेश्वरोंने उनकी स्तुति करना आरम्भ किया। तदनन्तर जिनके चार भुजाएँ थीं; जो शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे; जो लक्ष्मी और सरस्वतीके स्वामी, शान्तस्वरूप, परम मनोहर और सुखपूर्वक दर्शन करने योग्य थे, परंतु भक्तिहीनोंके लिये जिनका दर्शन करोड़ों जन्मोंमें भी नहीं हो सकता; जिनके नील रंगकी आभा करोड़ों कामदेवोंको मात कर रही थी; जिनका प्रकाश करोड़ों चन्द्रमाओंके समान था; जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित सुन्दर भूषणोंसे विभूषित थे, जो ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा सेवनीय हैं, भक्तगण सदा जिनका स्तवन करते हैं; जो अपने प्रकाशसे आच्छादित देवर्षियोंद्वारा घिरे हुए थे—उन परमेश्वरको ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने एक श्रेष्ठ रत्नसिंहासनपर बैठाया और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय उन सबकी अञ्जलियाँ बँधी हुई थीं, शरीर रोमाञ्चित थे और आँखोंमें आँसू छलक आये थे। तब परम बुद्धिमान् भगवान्‌ने मुस्कराते हुए मधुर वाणीद्वारा उनसे सारा वृत्तान्त पूछा और उनके द्वारा सब जान लेनेपर कहना आरम्भ किया।

**श्रीनारायण बोले—**सुरगणो! मेरे सिवा ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त यह सारा जगत् प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ है—यह सर्वथा सत्य है। विश्वमें सारे प्राणी जिस शक्तिसे शक्तिमान् हुए हैं, उस शक्तिको मैंने ही प्रकाशित किया है। सृष्टिके आदिमें मेरी इच्छासे वह प्रकृतिदेवी मुझसे ही प्रकट हुई हैं और मेरे सृष्टिका संहार कर लेनेपर वह अन्तर्हित होकर शयन करती हैं। प्रकृति ही सृष्टिकी विधायिका और समस्त प्राणियोंकी परा जननी है। वह मेरी माया मेरे समान है, इसी कारण नारायणी कहलाती है। शम्भुने चिरकालतक मेरा ध्यान करते हुए तपस्या की है, इसलिये तपकी फलस्वरूप मायाको मैंने उन्हें प्रदान किया है। मायारूपा पार्वतीका यह व्रत लोकशिक्षाके लिये ही है, अपने लिये नहीं है; क्योंकि त्रिलोकीमें व्रतों और तपस्याओंका फल देनेवाली तो ये स्वयं ही हैं। इनकी मायासे सभी प्राणी मोहित हैं। फिर प्रत्येक कल्पमें पुन-पुनः इनके स्तवन, व्रत और व्रत-फलकी साधनासे क्या लाभ? देवताओंमें श्रेष्ठ जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं, वे मेरे ही अंश हैं तथा जीवधारी प्राणी और देवता आदि मेरी ही कलाएँ तथा कलांशरूप हैं। जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घटका निर्माण नहीं कर सकता तथा सोनार स्वर्णके बिना कुण्डल बनानेमें असमर्थ है, उसी तरह मैं भी शक्तिके बिना अपनी सृष्टिकी रचना करनेमें असमर्थ हूँ। अतः सृष्टिके सृजनमें शक्तिकी ही प्रधानता है—यह सभी दर्शनशास्त्रोंको मान्य है। मैं समस्त देहधारियोंका आत्मा, निर्लेप, अदृश्य और साक्षी हूँ। प्रकृतिसे उत्पन्न सभी पाञ्चभौतिक शरीर नश्वर हैं, परंतु सूर्यके समान प्रकाशमान शरीरवाला मैं नित्य हूँ। जगत्में प्रकृति सबकी आधारस्वरूपा है और मैं सबका आत्मा हूँ। वेदमें ऐसा निरूपण किया गया है कि मैं आत्मा हूँ, ब्रह्मा मन हैं, महेश्वर ज्ञानरूप हैं, स्वयं विष्णु पञ्चप्राण हैं, ऐश्वर्यशालिनी प्रकृति बुद्धि है, मेधा, निद्रा आदि ये सभी प्रकृतिकी कलाएँ हैं और वह प्रकृति ही ये शैलराजकन्या पार्वती हैं। मैं सनातनदेव ही वैकुण्ठका अधिपति हूँ और मैं ही गोलोकका भी स्वामी हूँ। वहाँ गोलोकमें मैं दो भुजाधारी होकर गोप और गोपियोंसे घिरा रहता हूँ तथा यहाँ वैकुण्ठमें मैं देवेश्वर और लक्ष्मीपतिके रूपमें चार भुजाएँ धारण करता हूँ और मेरे पार्षद मुझे घेरे रहते हैं। वैकुण्ठसे ऊपर पचास करोड़ योजनकी दूरीपर स्थित गोलोकमें मेरा निवास-स्थान है, वहाँ मैं 'गोपीनाथ' रूपसे रहता हूँ। उन्हीं द्विभुजधारी गोपीनाथकी व्रतद्वारा आराधना की