ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें·· गणपतिखण्ड ·· ३२५
श्रीमहादेवजीने कहा— भद्रे! उठो, निस्संदेह तुम्हारा कल्याण होगा। तुम होशमें आकर मेरी बात सुनो। फिर जिनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे, उन पार्वतीसे यों कहकर शिवजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया और चेतनायुक्त कर दिया। तत्पश्चात् हितकर, सत्य, परिमित, परिणाममें सुखप्रद, यशस्कर और फलदायक वचन कहना आरम्भ किया। देवि! जिसका वेदने निरूपण किया है, जो सर्वसम्मत और इष्ट है, उस धर्मार्थका इस धर्मसभामें मैं वर्णन करता हूँ, सुनो। देवि! दक्षिणा समस्त कर्मोंकी सारभूता है। धर्मिष्ठे! वह धर्म-कर्ममें नित्य ही यश और फल प्रदान करनेवाली है। प्रिये! देवकार्य, पितृकार्य अथवा नित्य-नैमित्तिक जो भी कर्म दक्षिणासे रहित होता है, वह सब निष्फल हो जाता है और उस कर्मसे निश्चय ही दाता कालसूत्र नामक नरकमें जाता है। तत्पश्चात् वह शत्रुओंसे पीड़ित होकर दीनताको प्राप्त होता है। ब्राह्मणके उद्देश्यसे संकल्प की हुई दक्षिणा यदि उसी समय नहीं दे दी जाती है तो वह बढ़ते-बढ़ते अनेक गुनी हो जाती है।
श्रीविष्णुने कहा— धर्मिष्ठे! धर्मकर्मके विषयमें तुम अपने धर्मकी रक्षा करो; क्योंकि धर्मज्ञे! अपने धर्मका पूर्णतया पालन करनेपर सबकी रक्षा हो जाती है।
ब्रह्माने कहा— धर्मज्ञे! जो किसी कारणवश धर्मकी रक्षा नहीं करता है तो धर्मके नष्ट हो जानेपर उसके कर्त्ताका विनाश हो जाता है।
धर्मने कहा— साध्वि! पतिको दक्षिणारूपमें देकर यत्नपूर्वक मेरी रक्षा करो। महासाध्वि! मेरे सुरक्षित रहनेपर सब कुछ कल्याण ही होगा।
देवताओंने कहा— महासाध्वि! तुम धर्मकी रक्षा करके अपने व्रतको पूर्ण करो। सती! तुम्हारे व्रतके पूरा हो जानेपर हमलोग तुम्हारे मनोरथको पूर्ण कर देंगे।
मुनियोंने कहा— पतिव्रते! हवनको पूरा करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा प्रदान करो। धर्मज्ञे! हमलोगोंके उपस्थित रहते अमङ्गल कैसे होगा?
सनत्कुमारने कहा— शिवे! या तो तुम मुझे शिवको दक्षिणारूपमें दे दो, अन्यथा इस व्रतके फलको तथा चिरकालसे संचित अपनी तपस्याके फलको भी छोड़ दो। साध्वि! इस प्रकार कर्मके दक्षिणारहित हो जानेपर मैं इस व्रतके फलको तथा यजमानके सारे कर्मोंके फलको पा जाऊँगा।
तब पार्वतीजी बोलीं— देवेश्वरो! जिस कर्ममें पतिकी ही दक्षिणा दी जाती है, उस कर्मसे मुझे क्या लाभ? मुने! दक्षिणा देनेसे तथा धर्म और पुत्रकी प्राप्तिसे भी मेरा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा? भला, यदि भूमिकी पूजा न की जाय तो वृक्षके पूजनसे क्या फल मिलेगा? क्योंकि कारणके नष्ट हो जानेपर कार्यकी स्थिति कहाँ और फिर अन्न तथा फल कहाँसे प्राप्त हो सकते हैं? यदि स्वेच्छानुसार प्राणोंका ही त्याग कर दिया जाय तो फिर शरीरसे क्या प्रयोजन है? जिसकी दृष्टिशक्ति ही नष्ट हो गयी है, उस आँखसे क्या लाभ? सुरेश्वरो! पतिव्रताओंके लिये पति सौ पुत्रोंके समान होता है। ऐसी दशामें यदि व्रतमें पतिको ही दे देना है तो उस व्रतसे अथवा (व्रतके फलस्वरूप) पुत्रसे क्या सिद्ध होगा? माना कि पुत्र पतिका वंश होता है, किंतु उसका एकमात्र मूल तो पति ही है। भला, जहाँ मूलधन ही नष्ट हो जाय वहाँ उसका सारा व्यापार तो निष्फल हो ही जायगा।
इस प्रकार वाद-विवाद चल ही रहा था, इसी बीच उस सभामें स्थित देवताओं और मुनियोंने आकाशमें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए एक रथको देखा, जो पार्षदोंद्वारा घिरा हुआ था। वे सभी पार्षद श्याम रंगवाले तथा चार भुजाधारी थे। उनके गलेमें वनमाला शोभा पा रही थी और वे रत्नाभरणोंसे विभूषित थे। तत्पश्चात्