भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 810 में से

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पृष्ठ 334

३२४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पार्वतीद्वारा व्रतारम्भ, व्रत-समाप्तिमें पुरोहितद्वारा शिवको दक्षिणारूपमें माँगे जानेपर पार्वतीका मूर्च्छित होना, शिवजी तथा देवताओं और मुनियोंका उन्हें समझाना, पार्वतीका विषाद, नारायणका आगमन और उनके द्वारा पतिके बदले गोमूल्य देकर पार्वतीको व्रत समाप्त करनेका आदेश, पुरोहितद्वारा उसका अस्वीकार, एक अद्भुत तेजका आविर्भाव और देवताओं, मुनियों तथा पार्वतीद्वारा उसका स्तवन श्रीनारायणजी कहते हैं—नारद ! तदनन्तर हर्षसे गद्गद हुए मनवाले शिवजीने श्रीहरिकी आज्ञा स्वीकार करके श्रीहरिके साथ किये गये माङ्गलिक वार्तालापको प्रेमपूर्वक पार्वतीसे कह सुनाया। तब पार्वतीका मन प्रसन्न हो गया। फिर तो उन्होंने शिवजीकी आज्ञा मानकर उस मङ्गलव्रतके अवसरपर माङ्गलिक बाजा बजाया। फिर सुन्दर दाँतोंवाली पार्वतीने भलीभाँति स्नान करके शरीरको शुद्ध किया और स्वच्छ साड़ी तथा चद्दर धारण किया। तत्पश्चात् जो चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे विभूषित, फल और अक्षतसे सुशोभित तथा आमके पल्लवसे संयुक्त था, ऐसे रत्नकलशको चावलकी राशिपर स्थापित किया। फिर रत्नोंके उद्भवस्थान हिमालयकी कन्या सती पार्वतीने, जो रत्नोंसे विभूषित तथा रत्नजटित आसनपर विराजमान थी, रत्नसिंहासनोंपर समासीन मुनिश्रेष्ठोंकी पूजा करके चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और रत्नाभरणोंसे भूषित तथा रत्नसिंहासनपर विराजमान पुरोहितकी समर्चना की। इसके बाद विधि-विधानके अनुसार रत्नभूषित दिक्पालों, देवताओं, मनुष्यों और नागोंको आगे स्थापित करके भक्तिपूर्वक उनका भलीभाँति पूजन किया। फिर पुण्यक-व्रतमें, जिनकी अग्निमें तपाकर शुद्ध किये गये बहुमूल्य रत्नोंके भूषणों, उत्तम-उत्तम वस्त्रों तथा पूजनोपयोगी नाना प्रकारकी सामग्रियोंसे पूजा की गयी थी और जो चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे सुशोभित थे, उन ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरकी परम भक्तिपूर्वक समर्चना की। मुने ! तत्पश्चात् पार्वतीदेवीने स्वस्तिवाचनपूर्वक व्रत आरम्भ किया। तदनन्तर उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सतीने उस मङ्गल-कलशपर अपने अभीष्ट देवता श्रीकृष्णका आवाहन करके उन्हें भक्तिपूर्वक क्रमशः षोडशोपचार समर्पित किया। फिर व्रतमें जिन अनेक प्रकारके द्रव्योंके देनेका विधान है, एक-एक करके उन सभी फलदायी पदार्थोंको प्रदान किया। पुनः व्रतके लिये कहा गया उपहार, जो त्रिलोकीमें दुर्लभ है, वह सब भी भक्तिसहित अर्पण किया। इस प्रकार उस सतीने वेदमन्त्रोच्चारणपूर्वक सभी पदार्थोंको अर्पित करके तिल और घीसे तीन लाख आहुतियोंका हवन कराया और ब्राह्मणों, देवताओं तथा पूजित अतिथियोंको भोजनसे तृप्त किया। इस प्रकार उत्तम व्रतवाली सतीने उस पालनीय पुण्यक-व्रतमें सारे कर्तव्यको वर्षपर्यन्त प्रतिदिन विधानके साथ पूर्ण किया। समाप्तिके दिन विप्रवर पुरोहितने उनसे कहा—'सुव्रते ! इस उत्तम व्रतमें तुम मुझे अपने पतिको दक्षिणारूपमें दे दो।' पुरोहितके इस कथनको सुनकर महामाया पार्वती उस देव-सभाके मध्य विलाप करके मूर्च्छित हो गयी; क्योंकि उस समय मायाने उनके चित्तको मोह लिया था। नारद ! उन्हें मूर्च्छित देखकर उन मुनिवरोंको तथा ब्रह्मा और विष्णुको हँसी आ गयी। तब उन्होंने शंकरजीको पार्वतीके पास भेजा। उस समय पार्वतीको होशमें लानेके लिये सभासदोंद्वारा प्रेरित किये जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ शिवजी कहने लगे।

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