भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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गणपतिखण्ड ३२३

गर्भसे जन्म लिया। फिर वह सतीदेवी, जो सनातनी कृष्णशक्ति हैं पिताके यज्ञमें आपकी निन्दा होनेके कारण शरीरका त्याग करके गोलोकको चली गयीं। शंकर! तब पूर्वकालमें आप उनके रूप तथा गुणके आश्रयभूत परम सुन्दर शरीरको लेकर भारतवर्षमें भ्रमण करते हुए दुःखी हो गये थे। उस समय श्रीशैलपर नदीके किनारे मैंने आपको समझाया था। फिर उसी देवीने शीघ्र ही शैलराजकी पत्नीके गर्भसे जन्म लिया।

शंकर! उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली साध्वी शिवा पुण्यक नामक उत्तम व्रतका अनुष्ठान करें। इस व्रतके पालनसे सहस्रों राजसूय-यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है। त्रिलोचन ! इस व्रतमें सहस्रों राजसूय-यज्ञोंके समान धनका व्यय होता है, अतः यह व्रत सभी साध्वी महिलाओंद्वारा साध्य नहीं है। इस पुण्यक-व्रतके प्रभावसे स्वयं गोलोकनाथ श्रीकृष्ण पार्वतीके गर्भसे उत्पन्न होकर आपके पुत्र होंगे। वे कृपानिधि स्वयं समस्त देवगणोंके ईश्वर हैं, इसलिये त्रिलोकीमें 'गणेश' नामसे विख्यात होंगे। जिनके स्मरणमात्रसे निश्चय ही जगत्‌के विघ्नोंका नाश हो जाता है, इस कारण उन विभुका नाम 'विघ्ननिघ्न' हो गया। चूँकि पुण्यक-व्रतमें उन्हें नाना प्रकारके द्रव्य समर्पित किये जाते हैं, जिन्हें खाकर उनका उदर लंबा हो जाता है; अतः वे 'लम्बोदर' कहलायेंगे। शनिकी दृष्टि पड़नेसे सिरके कट जानेपर पुनः हाथीका सिर जोड़ा जायगा, इस कारण उन्हें 'गजानन' कहा जायगा। परशुरामजीके फरसेसे जब इनका एक दाँत टूट जायगा, तब ये अवश्य ही 'एकदन्त' नामवाले होंगे। वे ऐश्वर्यशाली शिशु सम्पूर्ण देवगणोंके, हमलोगोंके तथा जगत्‌के पूज्य होंगे। मेरे वरदानसे उनकी सबसे पहले पूजा होगी। सम्पूर्ण देवोंकी पूजाके समय सबसे पहले उनकी पूजा करके मनुष्य निर्विघ्नतापूर्वक पूजाके फलको पा लेता है, अन्यथा उसकी पूजा व्यर्थ हो जाती है।

मनुष्योंको चाहिये कि गणेश, सूर्य, विष्णु, शम्भु, अग्नि और दुर्गा—इन सबकी पहले पूजा करके तब अन्य देवताका पूजन करे। गणेशका पूजन करनेपर जगत्‌के विघ्न निर्मूल हो जाते हैं। सूर्यकी पूजासे नीरोगता आती है। श्रीविष्णुके पूजनसे पवित्रता, मोक्ष, पापनाश, यश और ऐश्वर्यकी वृद्धि होती है। शंकरका पूजन तत्त्वज्ञानके विषयमें परम तृप्तिका बीज है। अग्निका पूजन अपनी बुद्धिकी शुद्धिका उत्पादक कहा गया है। ब्रह्माद्वारा संस्कृत अग्निकी पूजासे मनुष्य अन्तसमयमें ज्ञान-मृत्युको प्राप्त करता है तथा शंकराग्निके सेवनसे दाता और भोक्ता होता है। दुर्गाकी अर्चना हरिभक्ति प्रदान करनेवाली तथा परम मङ्गलदायिनी होती है। इनकी पूजाके बिना अन्यकी पूजा करनेसे वह पूजन विपरीत हो जाता है। महादेव ! त्रिलोकीके लिये यही क्रम प्रत्येक कल्पमें निश्चित है। ये देव निरन्तर विद्यमान रहनेवाले, नित्य तथा सृष्टिपरयण हैं। इनका आविर्भाव और तिरोभाव ईश्वरकी इच्छापर ही निर्भर है। उस सभाके बीच यों कहकर श्रीहरि मौन हो गये। उस समय देवता, ब्राह्मण तथा पार्वतीसहित शंकर परम प्रसन्न हुए।

(अध्याय ६)