भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सुनिये। ब्रह्मन्! पुत्रशोकसे पीड़ित हुई पार्वतीका हृदय दुःखी हो गया है, अतः वह पुत्रकी कामनासे परमोत्तम पुण्यक-व्रत करना चाहती है। वह सुव्रता व्रतके फलस्वरूपमें उत्तम पुत्र और पति-सौभाग्यकी याचना कर रही है। इनके बिना उसे संतोष नहीं है। प्राचीन कालमें इस मानिनीने अपने पिताके यज्ञमें मेरी निन्दा होनेके कारण अपने शरीरका त्याग कर दिया था और अब पुनः हिमालयके घरमें जन्म धारण किया है। यह सारा वृत्तान्त तो आप जानते ही हैं, आप सर्वज्ञको मैं क्या बतलाऊँ। तत्त्वज्ञ! इस विषयमें आपकी क्या आज्ञा है? आप परिणाममें शुभप्रदायिनी अपनी वह आज्ञा बतलाइये। नाथ! मैंने सब कुछ निवेदन कर दिया है, अब जो कर्तव्य हो, उसे बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि परामर्शपूर्वक किया हुआ सारा कार्य परिणाममें सुखदायक होता है।

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! उस सभामें यों कहकर भगवान् शंकरने कमलापति विष्णुकी स्तुति की और फिर ब्रह्माके मुखकी ओर देखकर वे चुप हो गये। शंकरजीका वचन सुनकर जगदीश्वर विष्णु ठठाकर हँस पड़े और हितकारक तथा नीतिपूर्ण वचन कहने लगे।

श्रीविष्णुने कहा— पार्वतीश्वर! आपकी पत्नी सती संतान-प्राप्तिके लिये जिस उत्तम पुण्यक-व्रतको करना चाहती है, वह व्रतोंका सारतत्त्व, स्वामि-सौभाग्यका बीज, सबके द्वारा असाध्य, दुराराध्य, सम्पूर्ण अभीष्ट फलका दाता, सुखदायक, सुखका सार तथा मोक्षप्रद है। जो सबके आत्मा, साक्षीस्वरूप, ज्योतिरूप, सनातन, आश्रयरहित, निर्लिप्त, उपाधिहीन, निरामय, भक्तोंके प्राणस्वरूप, भक्तोंके ईश्वर, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, दूसरोंके लिये दुराराध्य, परंतु भक्तोंके लिये सुसाध्य, भक्तिके वशीभूत, सर्वसिद्ध और कलारहित हैं, ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिन पुरुषकी कलाएँ हैं, महान् विराट् जिनका एक अंश है, जो निर्लिप्त, प्रकृतिसे परे, अविनाशी, निग्रहकर्ता, उग्रस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप, ग्रहोंमें उग्र ग्रह और ग्रहोंका निग्रह करनेवाले हैं, वे भगवान् आपके बिना करोड़ों जन्मोंमें भी साध्य नहीं हो सकते।

सूर्य, शिव, नारायणी माया, कला आदिकी दीर्घकालतक उपासना करनेके बाद मनुष्य भक्त-संसर्गकी हेतुस्वरूपा कृष्णभक्तिको पाता है। शिवजी! उस निष्पक्व भक्तिको पाकर भारतवर्षमें बारंबार भ्रमण करते हुए जब भक्तोंकी सेवा करनेसे उसकी भक्ति परिपक्व हो जाती है, तब भक्तोंकी कृपासे तथा देवताओंके आशीर्वादसे उसे श्रीकृष्णमन्त्र प्राप्त होता है, जो परमोत्कृष्ट निर्वाणरूप फल प्रदान करनेवाला है। कृष्णव्रत और कृष्णमन्त्र सम्पूर्ण कामनाओंके फलके प्रदाता हैं। चिरकालतक श्रीकृष्णकी सेवा करनेसे भक्त श्रीकृष्ण-तुल्य हो जाता है। महाप्रलयके अवसरपर समस्त प्राणियोंका विनाश हो जाता है—यह सर्वथा निश्चित है; परंतु जो कृष्णभक्त हैं, वे अविनाशी हैं। उन साधुओंका नाश नहीं होता। शिवजी! श्रीकृष्णभक्त अत्यन्त निश्चिन्त होकर अविनाशी गोलोकमें आनन्द मनाते हैं। महेश्वर! आप सबका संहार करनेवाले हैं, परंतु कृष्णभक्तोंपर आपका वश नहीं चलता। उसी प्रकार माया सबको मोहग्रस्त कर लेती है, परंतु मेरी कृपासे वह भक्तोंको नहीं मोह पाती। नारायणी माया समस्त प्राणियोंकी माता है। वह कृष्णभक्तिका दान करनेवाली है, वह नारायणी माया मूलप्रकृति, अधीश्वरी, कृष्णप्रिया, कृष्णभक्ता, कृष्णतुल्या, अविनाशिनी, तेजःस्वरूपा और स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनेवाली है। (दैत्योंद्वारा) सुरनिग्रहके अवसरपर वह देवताओंके तेजसे प्रकट हुई थी। उसने दैत्यसमूहोंका संहार करके दक्षके अनेक जन्मोंकी तपस्याके फलस्वरूप भारतवर्षमें दक्षपत्नीके