भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गणपतिखण्ड ३२१

विमानपर आरूढ हो वहाँ उपस्थित हुए। तत्पश्चात् सनक, सनन्दन, कपिल, सनातन, आसुरि, क्रतु, हंस, वोढु, पञ्चशिख, आरुणि, यति, सुमति, अनुयायियोंसहित वसिष्ठ, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, भृगु, अङ्गिरा, अगस्त्य, प्रचेता, दुर्वासा, च्यवन, मरीचि, कश्यप, कण्व, जरत्कारु, गौतम, बृहस्पति, उतथ्य, संवर्त, सौभरि, जाबालि, जमदग्नि, जैगीषव्य, देवल, गोकामुख, वक्ररथ, पारिभद्र, पराशर, विश्वामित्र, वामदेव, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, मार्कण्डेय, मृकण्डु, पुष्कर, लोमश, कौत्स, वत्स, दक्ष, बालाग्रि, अघमर्षण, कात्यायन, कणाद, पाणिनि, शाकटायन, शङ्कु, आपिशालि, शाकल्य, शङ्ख—ये तथा और भी बहुत-से मुनि शिष्योंसहित वहाँ पधारे। मुने! धर्मपुत्र नर-नारायण भी आये। पार्वतीके उस व्रतमें दिक्पाल, देवता, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और गणोंसहित सभी पर्वत भी उपस्थित हुए। शैलराज हिमालय, जो अनन्त रत्नोंके उद्भवस्थान हैं, कौतुकवश अपनी कन्याके व्रतमें रत्नाभरणोंसे अलंकृत हो पत्नी, पुत्र, गण और अनुयायियोंसहित पधारे। उनके साथ नाना प्रकारके द्रव्योंसे संयुक्त बहुत बड़ी सामग्री थी। उसमें व्रतोपयोगी मणि-माणिक्य और रत्न थे। अनेक प्रकारकी ऐसी वस्तुएँ थीं, जो संसारमें दुर्लभ हैं। एक लाख गज-रत्न, तीन लाख अश्व-रत्न, दस लाख गो-रत्न, एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ, चार लाख मुक्ता, एक सहस्र कौस्तुभमणि और अत्यन्त स्वादिष्ट तथा मीठे पदार्थोंके एक लाख भार थे। इसके अतिरिक्त पार्वतीके व्रतमें ब्राह्मण, मनु, सिद्ध, नाग और विद्याधरोंके समुदाय तथा संन्यासी, भिक्षुक और बंदीगण भी आये। उस समय कैलासपर्वतके राजमार्गोंपर चन्दनका छिड़काव किया गया था। पद्मरागमणिके बने हुए शिवमन्दिरमें आमके पल्लवोंकी बंदनवारें बँधी थीं। कदलीके खंभे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह दूब, धान्य, पत्ते, खील, फल और पुष्पोंसे सुसज्जित था। उपस्थित सारा जन-समुदाय आनन्दपूर्वक उसे निहार रहा था। सारे कैलासवासी परमानन्दमें निमग्न थे।

तदनन्तर शंकरजीने समागत अतिथियोंको ऊँचे-ऊँचे सिंहासनोंपर बैठाकर उनका आदर-सत्कार किया। पार्वतीके इस व्रतमें इन्द्र दानाध्यक्ष, कुबेर कोषाध्यक्ष, स्वयं सूर्य आदेश देनेवाले और वरुण परोसनेके कामपर नियुक्त थे। उस समय दही, दूध, घृत, गुण, चीनी, तेल और मधु आदिकी लाखों नदियाँ बहने लगी थीं। इसी प्रकार गेहूँ, चावल, जौ और चिउरे आदिके पहाड़ों-के-पहाड़ लग गये थे। महामुने ! पार्वतीके व्रतमें कैलास पर्वतपर सोना, चाँदी, मूँगा और मणियोंके पर्वत-सरीखे ढेर लगे हुए थे। लक्ष्मीने भोजन तैयार किया था, जिसमें परम मनोहर खीर, पूड़ी, अगहनीका चावल और घृतसे बने हुए अनेकविध व्यञ्जन थे। देवर्षिगणोंके साथ स्वयं नारायणने भोजन किया। उस समय एक लाख ब्राह्मण परोसनेका काम कर रहे थे। (भोजन कर लेनेके पश्चात्) जब वे रत्नसिंहासनोंपर विराजमान हुए, तब परम चतुर लाखों ब्राह्मणोंने उन्हें कर्पूर आदिसे सुवासित पानके बीड़े समर्पित किये। ब्रह्मन्! देवर्षियोंसे भरी हुई उस सभामें जब क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णु रत्नसिंहासनपर आसीन थे, प्रसन्न मुखवाले पार्षद उनपर श्वेत चँवर डुला रहे थे, ऋषि, सिद्ध तथा देवगण उनकी स्तुति कर रहे थे, वे गन्धर्वोंके मनोहर गीत सुन रहे थे, उसी समय ब्रह्माकी प्रेरणासे शंकरजीने हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक उन ब्रह्मेशसे अपने अभीष्ट कर्तव्य व्रतके विषयमें प्रश्न किया।

**श्रीमहादेवजीने पूछा—**प्रभो! आप श्रीनिवास, तपःस्वरूप, तपस्याओं और कर्मोंके फलदाता, सबके द्वारा पूजित, सम्पूर्ण व्रतों, जप-यज्ञों और पूजनोंके बीजरूपसे वाञ्छाकल्पतरु और पापोंका हरण करनेवाले हैं। नाथ! मेरी एक प्रार्थना