भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

करके जयन्त नामक पुत्रको जन्म दिया। इस व्रतके करनेसे उत्तानपादकी पत्नीने ध्रुवको और कुबेरकी भार्याने नलकूबरको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। इस उत्तम व्रतके पालनसे सूर्यपत्नीको मनु तथा अत्रिपत्नीको चन्द्रमा पुत्ररूपमें मिले। अङ्गिराकी पत्नीने भी इस उत्तम व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके प्रभावसे उनके पुत्र बृहस्पति हुए, जो देवताओंके आचार्य कहलाते हैं। भृगुपत्नीने इस व्रतका पालन करके शुक्रको पुत्ररूपमें प्राप्त किया, जो नारायणके अंश और समस्त तेजस्वियोंमें परमोत्कृष्ट हैं। ये ही दैत्योंके गुरु हुए। देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे व्रतोंमें उत्तम पुण्यक-व्रतका वर्णन कर दिया। कल्याणमयी गिरिराजनन्दिनि! तुम भी इस व्रतको करो। शुभे! यह व्रत राजेन्द्रपत्नियोंके लिये सुखसाध्य है, देवियोंके लिये सुखप्रद है और साध्वी नारियोंके लिये तो यह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है। महासाध्वि! इस व्रतके प्रभावसे सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर स्वयं गोपाङ्गनेश्वर श्रीकृष्ण तुम्हारे पुत्र होंगे।

नारद! यों कहकर शंकरजी चुप हो गये। तत्पश्चात् परम प्रसन्न हुई पार्वतीदेवीने शंकरजीकी आज्ञासे उस व्रतका अनुष्ठान किया। इस प्रकार मैंने तुमसे गणेशजीके जन्मका कारण, जो सुखदायक, मोक्षप्रद और साररूप है, वर्णन कर दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ५)


पार्वतीजीका व्रतारम्भके लिये उद्योग, ब्रह्मादि देवों तथा ऋषि आदिका आगमन, शिवजीद्वारा उनका सत्कार तथा श्रीविष्णुसे पुण्यक-व्रतके विषयमें प्रश्न, श्रीविष्णुका व्रतके माहात्म्य तथा गणेशकी उत्पत्तिका वर्णन करना

**नारदजीने पूछा—**मुनिश्रेष्ठ! पार्वतीजीने पतिकी आज्ञासे किस प्रकार उस शुभदायक व्रतका पालन किया था, वह मुझे बतलाइये। ब्रह्मन्! तत्पश्चात् उत्तम व्रतवाली पार्वतीके द्वारा उस व्रतके पूर्ण किये जानेपर गोपीश श्रीकृष्णने किस प्रकार जन्म धारण किया, वह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।

**श्रीनारायणने कहा—**नारद! शिवजी यद्यपि स्वयं ही तपके विधाता हैं तथापि वे पार्वतीसे व्रतकी विधि तथा उसकी दिव्य कथाका वर्णन करके तप करनेके लिये चले गये। यद्यपि शिवजी श्रीहरिके ही पृथक् स्वरूप हैं तथापि वे वहाँ श्रीहरिकी आराधनामें संलग्न होकर उन्हींके ध्यानमें तत्पर हो श्रीहरिकी भावना करने लगे। वे सनातनदेव ज्ञानानन्दमें निमग्न तथा परमानन्दसे परिपूर्ण थे और प्रकटरूपसे विष्णुमन्त्रके स्मरणमें इस प्रकार तल्लीन थे कि उन्हें रात-दिनका आना-जाना ज्ञात नहीं होता था। इधर शुभदायिनी पार्वतीदेवीने पतिके आज्ञानुसार हर्षपूर्ण मनसे व्रतकार्यके लिये ब्राह्मणों तथा भृत्योंको प्रेरित किया और व्रतोपयोगी सभी वस्तुओंको मँगवाकर शुभ मुहूर्तमें व्रत करना आरम्भ किया। उसी समय ब्रह्माके पुत्र भगवान् सनत्कुमार वहाँ आ पहुँचे। वे तेजके मूर्तिमान् राशि थे और ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। तदनन्तर पत्नीसहित ब्रह्मा भी प्रसन्नतापूर्वक ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। अत्यन्त भयभीत हुए भगवान् महेश्वर भी वहाँ आये। नारद! जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं तथा जगत्के शासक और पालन-पोषण करनेवाले हैं, जिनके गलेमें वनमाला लटकती रहती है, जो रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित हैं तथा जिनके शरीरका वर्ण श्याम है, वे चार भुजाधारी भगवान् विष्णु लक्ष्मी तथा पार्षदोंके साथ बहुत-सी सामग्री लिये हुए रत्नजटित