भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गणपतिखण्ड ३७९

सम्यक्-रूपसे पूजा करे। तत्पश्चात् इसी क्रमसे श्रीकृष्णका पूजन करे। फिर गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती—इन छः देवोंकी भलीभाँति अर्चना करके इष्टदेवकी पूजा करे। विघ्ननाशके लिये गणेशका, व्याधिनाशके लिये सूर्यका, आत्मशुद्धिके लिये अग्निका, मुक्तिके लिये विष्णुका, ज्ञानके लिये शंकरका और परमैश्वर्यकी प्राप्तिके लिये दुर्गाका पूजन करनेपर यह फल मिलता है। यदि इनका पूजन न किया जाय तो विपरीत फल प्राप्त होता है। तदनन्तर भक्तिभावसहित इष्टदेवका परिहार करके भक्तिपूर्वक सामवेदोक्त स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। (वह स्तोत्र बतलाता हूँ) उसे श्रवण करो।

**महादेवजीने कहा—**जो परब्रह्म, परम धाम, परम ज्योति, सनातन, निर्लिप्त और सबके कारण हैं, उन परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो स्थूलसे स्थूलतम, सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम, सबके देखनेयोग्य, अदृश्य और स्वेच्छाचारी हैं, उन उत्कृष्ट देवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो साकार, निराकार, सगुण, निर्गुण, सबके आधार, सर्वस्वरूप और स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं; उन प्रभुको मेरा अभिवादन है। जिनका रूप अत्यन्त सुन्दर है, जो उपमारहित हैं और अत्यन्त कराल रूप धारण करते हैं; उन सर्वव्यापी भगवान्‌को मैं सिर झुकाता हूँ। जो कर्मके कर्मरूप, समस्त कर्मोंके साक्षी, फल और फलदाता हैं; उन सर्वस्वरूपको मेरा नमस्कार है। जो पुरुष अपनी कलासे विभिन्न मूर्ति धारण करके सृष्टिका रचयिता, पालक और संहारक हैं तथा जो कलांशसे नाना प्रकारकी मूर्ति धारण करते हैं; उनके चरणोंमें मैं प्रणिपात करता हूँ। जो मायाके वशीभूत होकर स्वयं प्रकृतिरूप हैं और स्वयं पुरुष हैं तथा स्वयं इन दोनोंसे परे हैं; उन परात्परको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। जो अपनी मायासे स्त्री, पुरुष और नपुंसकका रूप धारण करते हैं तथा जो देव स्वयं माया और स्वयं मायेश्वर हैं; उन्हें मेरा प्रणाम है। जो सम्पूर्ण दुःखोंसे उबारनेवाले, सभी कारणोंके कारण और समस्त विश्वोंको धारण करनेवाले हैं, सबके कारणस्वरूप हैं; उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तेजस्वियोंमें सूर्य, सम्पूर्ण जातियोंमें ब्राह्मण और नक्षत्रोंमें चन्द्रमा हैं; उन जगदीश्वरको मेरा अभिवादन है। जो रुद्रों, वैष्णवों और ज्ञानियोंमें शंकर हैं तथा जो नागोंमें शेषनाग हैं; उन जगत्पतिको मैं मस्तक झुकाता हूँ। जो प्रजापतियोंमें ब्रह्मा, सिद्धोंमें स्वयं कपिल और मुनियोंमें सनत्कुमार हैं; उन जगद्गुरुको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। जो देवताओंमें विष्णु, देवियोंमें स्वयं प्रकृति, मनुओंमें स्वायम्भुव मनु, मनुष्योंमें वैष्णव और नारियोंमें शतरूपा हैं; उन बहुरूपियेको मैं नमस्कार करता हूँ। जो ऋतुओंमें वसन्त, महीनोंमें मार्गशीर्ष और तिथियोंमें एकादशी हैं; उन सर्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सरिताओंमें सागर, पर्वतोंमें हिमालय और सहनशीलोंमें पृथ्वीरूप हैं; उन सर्वरूपको मेरा प्रणाम है। जो पत्रोंमें तुलसीपत्र, लकड़ियोंमें चन्दन और वृक्षोंमें कल्पवृक्ष हैं; उन जगत्पतिको मेरा अभिवादन है। जो पुष्पोंमें पारिजात, अन्नोंमें धान और भक्ष्य पदार्थोंमें अमृत हैं; उन अनेक रूपधारीको मैं सिर झुकाता हूँ। जो गजराजोंमें ऐरावत, पक्षियोंमें गरुड और गौओंमें कामधेनु हैं; उन सर्वरूपको मैं नमन करता हूँ। जो तैजस पदार्थोंमें सुवर्ण, धान्योंमें यव और पशुओंमें सिंह हैं; उन श्रेष्ठ रूपधारीके समक्ष मैं नत होता हूँ। जो यक्षोंमें कुबेर, ग्रहोंमें बृहस्पति और दिक्पालोंमें महेन्द्र हैं; उन श्रेष्ठ परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो शास्त्रोंमें वेदसमुदाय, सद्सद्विवेकशील बुद्धिमानोंमें सरस्वती और अक्षरोंमें अकार हैं; उन प्रधान देवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मन्त्रोंमें विष्णुमन्त्र, तीर्थोंमें स्वयं गङ्गा और इन्द्रियोंमें मन