भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 390

३८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


हैं; उन सर्वश्रेष्ठको मेरा नमस्कार है। जो शस्त्रोंमें सुदर्शनचक्र, व्याधियोंमें वैष्णव-ज्वर और तेजोंमें ब्रह्मतेज हैं; उन वरणीय प्रभुको मेरा प्रणाम है। जो बलवानोंमें निषेक-कर्मफलभोग, शीघ्र चलनेवालोंमें मन और गणना करनेवालोंमें काल हैं; उन विलक्षण देवको मैं अभिवादन करता हूँ। जो गुरुओंमें ज्ञानदाता, बन्धुओंमें मातृरूप और मित्रोंमें जन्मदाता-पितृरूप हैं; उन साररूप परमेश्वरको मैं मस्तक झुकाता हूँ। जो शिल्पियोंमें विश्वकर्मा, रूपवानोंमें कामदेव और पत्नियोंमें पतिव्रता हैं; उन नमनीय प्रभुको मेरा अभिवादन है। जो प्रिय प्राणियोंमें पुत्ररूप, मनुष्योंमें नरेश्वर और यन्त्रोंमें शालग्राम हैं; उन विशिष्टको मैं नमस्कार करता हूँ। जो कल्याणबीजोंमें धर्म, वेदोंमें सामवेद और धर्मोंमें सत्यरूप हैं; उन विशिष्टको मैं प्रणाम करता हूँ। जो जलमें शीतलता, पृथ्वीमें गन्ध और आकाशमें शब्दरूपसे विद्यमान हैं; उन वन्दनीयको मैं अभिवादन करता हूँ। जो यज्ञोंमें राजसूययज्ञ और छन्दोंमें गायत्री छन्द हैं तथा जो गन्धर्वोंमें चित्ररथ हैं; उन परम महनीयको मैं सिर झुकाता हूँ। जो गव्य पदार्थोंमें दूधस्वरूप, पवित्रोंमें अग्नि और पुण्य प्रदान करनेवालोंमें स्तोत्र हैं; उन शुभदायकको मैं प्रणिपात करता हूँ। जो तृणोंमें कुशरूप और शत्रुओंमें रोगरूप हैं तथा जो गुणोंमें शान्तरूप हैं; उन विचित्र रूपधारीको मैं नमन करता हूँ। जो तेजोरूप, ज्ञानरूप, सर्वरूप और महान् हैं; उन सबके द्वारा अनिर्वचनीय सर्वव्यापी स्वयं प्रभुको मेरा नमस्कार है। जो सर्वाधारस्वरूपोंमें वायु और नित्यरूपधारियोंमें आत्माके समान हैं तथा जो आकाशकी भाँति व्यास हैं; उन सर्वव्यापकको मेरा प्रणाम है। जो वेदोंद्वारा अवर्णनीय हैं, अतः विद्वान् जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा जिनका गुणगान वाक्-शक्तिके बाहर है; भला, उनका स्तवन करके कौन पार पा सकता है? जिनकी स्तुति करनेमें वेद समर्थ नहीं हैं तथा सरस्वती जड-सी हो जाती हैं, मन-वाणीसे परे उन भगवान्का कौन विद्वान् स्तवन कर सकता है? जो शुद्ध तेजःस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह और अत्यन्त सुन्दर हैं; उन श्याम-रूपधारी प्रभुको मेरा अभिवादन है। जिनके दो भुजाएँ हैं, मुखपर मुरली सुशोभित है, किशोर-अवस्था है, जो आनन्दपूर्वक मुस्करा रहे हैं, गोपाङ्गनाएँ निरन्तर जिनकी ओर निहारा करती हैं; उन्हें मेरा प्रणाम स्वीकार हो। जो रत्ननिर्मित सिंहासनपर विराजमान हैं और राधाद्वारा दिये गये पानको चबा रहे हैं; उन मनोहर रूपधारी ईश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो रत्नोंके आभूषणोंसे भलीभाँति सुसज्जित हैं तथा जिनपर पार्षदप्रवर गोपकुमार श्वेत चँवर डुला रहे हैं; उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। जो रमणीय वृन्दावनके भीतर रासमण्डलके मध्य स्थित होकर रासक्रीडाके उल्लाससे समुत्सुक हैं; उन रसिकेश्वरको मेरा प्रणाम है। जो शतशृङ्गकी चोटियोंपर, महाशैलपर, गोलोकमें रत्नपर्वतपर तथा विरजा नदीके रमणीय तटपर विहार करनेवाले हैं; उन्हें मेरा नमस्कार है। जो परिपूर्णतम, शान्त, राधाके प्रियतम, मनको हरण करनेवाले, सत्यरूप और ब्रह्मस्वरूप हैं, उन अविनाशी श्रीकृष्णको मैं अभिवादन करता हूँ।

जो मनुष्य भारतवर्षमें श्रीकृष्णके इस स्तोत्रका तीनों काल पाठ करता है, वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्षका दाता हो जाता है। इस स्तोत्रकी कृपासे श्रीहरिमें उसकी भक्ति सुदृढ़ हो जाती है। उसे श्रीहरिकी दासता मिल जाती है और वह इस लोकमें निश्चय ही विष्णु-तुल्य जगत्पूज्य हो जाता है। वह शान्तिलाभ करके समस्त सिद्धोंका ईश्वर हो जाता है और अन्तमें श्रीहरिके परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा भूतलपर अपने तेज और यशसे सूर्यकी तरह प्रकाशित होता है। वह जीवन्मुक्त,