भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


हैं; उन सर्वश्रेष्ठको मेरा नमस्कार है। जो शस्त्रोंमें सुदर्शनचक्र, व्याधियोंमें वैष्णव-ज्वर और तेजोंमें ब्रह्मतेज हैं; उन वरणीय प्रभुको मेरा प्रणाम है। जो बलवानोंमें निषेक-कर्मफलभोग, शीघ्र चलनेवालोंमें मन और गणना करनेवालोंमें काल हैं; उन विलक्षण देवको मैं अभिवादन करता हूँ। जो गुरुओंमें ज्ञानदाता, बन्धुओंमें मातृरूप और मित्रोंमें जन्मदाता-पितृरूप हैं; उन साररूप परमेश्वरको मैं मस्तक झुकाता हूँ। जो शिल्पियोंमें विश्वकर्मा, रूपवानोंमें कामदेव और पत्नियोंमें पतिव्रता हैं; उन नमनीय प्रभुको मेरा अभिवादन है। जो प्रिय प्राणियोंमें पुत्ररूप, मनुष्योंमें नरेश्वर और यन्त्रोंमें शालग्राम हैं; उन विशिष्टको मैं नमस्कार करता हूँ। जो कल्याणबीजोंमें धर्म, वेदोंमें सामवेद और धर्मोंमें सत्यरूप हैं; उन विशिष्टको मैं प्रणाम करता हूँ। जो जलमें शीतलता, पृथ्वीमें गन्ध और आकाशमें शब्दरूपसे विद्यमान हैं; उन वन्दनीयको मैं अभिवादन करता हूँ। जो यज्ञोंमें राजसूययज्ञ और छन्दोंमें गायत्री छन्द हैं तथा जो गन्धर्वोंमें चित्ररथ हैं; उन परम महनीयको मैं सिर झुकाता हूँ। जो गव्य पदार्थोंमें दूधस्वरूप, पवित्रोंमें अग्नि और पुण्य प्रदान करनेवालोंमें स्तोत्र हैं; उन शुभदायकको मैं प्रणिपात करता हूँ। जो तृणोंमें कुशरूप और शत्रुओंमें रोगरूप हैं तथा जो गुणोंमें शान्तरूप हैं; उन विचित्र रूपधारीको मैं नमन करता हूँ। जो तेजोरूप, ज्ञानरूप, सर्वरूप और महान् हैं; उन सबके द्वारा अनिर्वचनीय सर्वव्यापी स्वयं प्रभुको मेरा नमस्कार है। जो सर्वाधारस्वरूपोंमें वायु और नित्यरूपधारियोंमें आत्माके समान हैं तथा जो आकाशकी भाँति व्यास हैं; उन सर्वव्यापकको मेरा प्रणाम है। जो वेदोंद्वारा अवर्णनीय हैं, अतः विद्वान् जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा जिनका गुणगान वाक्-शक्तिके बाहर है; भला, उनका स्तवन करके कौन पार पा सकता है? जिनकी स्तुति करनेमें वेद समर्थ नहीं हैं तथा सरस्वती जड-सी हो जाती हैं, मन-वाणीसे परे उन भगवान्का कौन विद्वान् स्तवन कर सकता है? जो शुद्ध तेजःस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह और अत्यन्त सुन्दर हैं; उन श्याम-रूपधारी प्रभुको मेरा अभिवादन है। जिनके दो भुजाएँ हैं, मुखपर मुरली सुशोभित है, किशोर-अवस्था है, जो आनन्दपूर्वक मुस्करा रहे हैं, गोपाङ्गनाएँ निरन्तर जिनकी ओर निहारा करती हैं; उन्हें मेरा प्रणाम स्वीकार हो। जो रत्ननिर्मित सिंहासनपर विराजमान हैं और राधाद्वारा दिये गये पानको चबा रहे हैं; उन मनोहर रूपधारी ईश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो रत्नोंके आभूषणोंसे भलीभाँति सुसज्जित हैं तथा जिनपर पार्षदप्रवर गोपकुमार श्वेत चँवर डुला रहे हैं; उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। जो रमणीय वृन्दावनके भीतर रासमण्डलके मध्य स्थित होकर रासक्रीडाके उल्लाससे समुत्सुक हैं; उन रसिकेश्वरको मेरा प्रणाम है। जो शतशृङ्गकी चोटियोंपर, महाशैलपर, गोलोकमें रत्नपर्वतपर तथा विरजा नदीके रमणीय तटपर विहार करनेवाले हैं; उन्हें मेरा नमस्कार है। जो परिपूर्णतम, शान्त, राधाके प्रियतम, मनको हरण करनेवाले, सत्यरूप और ब्रह्मस्वरूप हैं, उन अविनाशी श्रीकृष्णको मैं अभिवादन करता हूँ।

जो मनुष्य भारतवर्षमें श्रीकृष्णके इस स्तोत्रका तीनों काल पाठ करता है, वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्षका दाता हो जाता है। इस स्तोत्रकी कृपासे श्रीहरिमें उसकी भक्ति सुदृढ़ हो जाती है। उसे श्रीहरिकी दासता मिल जाती है और वह इस लोकमें निश्चय ही विष्णु-तुल्य जगत्पूज्य हो जाता है। वह शान्तिलाभ करके समस्त सिद्धोंका ईश्वर हो जाता है और अन्तमें श्रीहरिके परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा भूतलपर अपने तेज और यशसे सूर्यकी तरह प्रकाशित होता है। वह जीवन्मुक्त,

५७- परशुरामका राजराजेश्वर कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतयुक्त वचन कहना

गणपतिखण्ड ३८१

श्रीकृष्णभक्त, सदा नीरोग, गुणवान्, विद्वान्, पुत्रवान् और धनी हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। वह निश्चय ही छहों विषयोंका जानकार, दसों बलोंसे सम्पन्न, मनके सदृश वेगशाली, सर्वज्ञ, सर्वस्व दान करनेवाला और सम्पूर्ण सम्पदाओंका दाता हो जाता है तथा श्रीकृष्णकी कृपासे वह निरन्तर कल्पवृक्षके समान बना रहता है। वत्स! इस प्रकार मैंने इस स्तोत्रका वर्णन कर दिया। अब तुम पुष्करमें जाओ और वहाँ मन्त्र सिद्ध करो। तत्पश्चात् तुम्हें अभीष्ट फलकी प्राप्ति होगी। मुनिश्रेष्ठ! यों श्रीकृष्णकी कृपासे तथा मेरे आशीर्वादसे तुम सुखपूर्वक पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे शून्य करो*।
(अध्याय ३२)


* महादेव उवाच—
परं ब्रह्म परं धाम परं ज्योतिः सनातनम्। निर्लिप्तं परमात्मानं नमामि सर्वकारणम्॥
स्थूलात् स्थूलतमं देवं सूक्ष्मात् सूक्ष्मतमं परम्। सर्वदृश्यमदृश्यं च स्वेच्छाचारं नमाम्यहम्॥
साकारं च निराकारं सगुणं निर्गुणं प्रभुम्। सर्वाधारं च सर्वं च स्वेच्छारूपं नमाम्यहम्॥
अतीवकमनीयं च रूपं निरुपमं विभुम्। करालरूपमत्यन्तं बिभ्रतं प्रणमाम्यहम्॥
कर्मणः कर्मरूपं तं साक्षिणं सर्वकर्मणाम्। फलं च फलदातारं सर्वरूपं नमाम्यहम्॥
स्रष्टा पाता च संहर्ता कलया मूर्तिभेदतः। नानामूर्तिः कलांशेन यः पुमांस्तं नमाम्यहम्॥
स्वयं प्रकृतिरूपश्च मायया च स्वयं पुमान्। तयोः परं स्वयं शश्वत् तं नमामि परात्परम्॥
स्त्रीपुंनपुंसकं रूपं यो बिभर्ति स्वमायया। स्वयं माया स्वयं मायी यो देवस्तं नमाम्यहम्॥
तारणं सर्वदुःखानां सर्वकारणकारणम्। धारणं सर्वविश्वानां सर्वबीजं नमाम्यहम्॥
तेजस्विनां रवियों हि सर्वजातिषु ब्राह्मणः। नक्षत्राणां च यश्चन्द्रस्तं नमामि जगत्प्रभुम्॥
रुद्राणां वैष्णवानां च ज्ञानिनां यो हि शंकरः। नागानां यो हि शेषश्च तं नमामि जगत्पतिम्॥
प्रजापतीनां यो ब्रह्मा सिद्धानां कपिलः स्वयम्। सनत्कुमारो मुनिषु तं नमामि जगद्गुरुम्॥
देवानां यो हि विष्णुश्च देवीनां प्रकृतिः स्वयम्।
स्वायम्भुवो मनूनां यो मानवेषु च वैष्णवः। नारीणां शतरूपा च बहुरूपं नमाम्यहम्॥
ऋतूनां यो वसन्तश्च मासानां मार्गशीर्षकः। एकादशी तिथीनां च नमामि सर्वरूपिणम्॥
सागरः सरितां यश्च पर्वतानां हिमालयः। वसुन्धरा सहिष्णूनां तं सर्वं प्रणमाम्यहम्॥
पत्राणां तुलसीपत्रं दारुरूपेषु चन्दनम्। वृक्षाणां कल्पवृक्षो यस्तं नमामि जगत्पतिम्॥
पुष्पाणां पारिजातश्च शस्यानां धान्यमेव च। अमृतं भक्ष्यवस्तूनां नानारूपं नमाम्यहम्॥
ऐरावतो गजेन्द्राणां वैनतेयश्च पक्षिणाम्। कामधेनुश्च धेनूनां सर्वरूपं नमाम्यहम्॥
तेजसानां सुवर्णं च धान्यानां यव एव च। यः केशरी पशूनां च वररूपं नमाम्यहम्॥
यक्षाणां च कुबेरो यो ग्रहाणां च बृहस्पतिः। दिक्पालानां महेन्द्रश्च तं नमामि परं वरम्॥
वेदसंघश्च शास्त्राणां पण्डितानां सरस्वती। अक्षराणामकारो यस्तं प्रधानं नमाम्यहम्॥
मन्त्राणां विष्णुमन्त्रश्च तीर्थानां जाह्नवी स्वयम्। इन्द्रियाणां मनो यो हि सर्वश्रेष्ठं नमाम्यहम्॥
सुदर्शनं च शस्त्राणां व्याधीनां वैष्णवो ज्वरः। तेजसां ब्रह्मतेजश्च वरेण्यं तं नमाम्यहम्॥
निषेकश्च बलवतां मनश्च शीघ्रगामिनाम्। कालः कलयतां यो हि तं नमामि विलक्षणम्॥
ज्ञानदाता गुरूणां च मातृरूपश्च बन्धुषु। मित्रेषु जन्मदाता यस्तं सारं प्रणमाम्यहम्॥
शिल्पीनां विश्वकर्मा यः कामदेवश्च रूपिणाम्। पतिव्रता च पत्नीनां नमस्यं तं नमाम्यहम्॥
प्रियेषु पुत्ररूपो यो नृपरूपो नरेषु च। शालग्रामश्च यन्त्राणां तं विशिष्टं नमाम्यहम्॥
धर्मः कल्याणबीजानां वेदानां सामवेदकः। धर्मीणां सत्यरूपो यो विशिष्टं तं नमाम्यहम्॥
जले शैत्यस्वरूपो यो गन्धरूपश्च भूमिषु। शब्दरूपश्च गगने तं प्रणम्यं नमाम्यहम्॥

३८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पुष्करमें जाकर परशुरामका तपस्या करना, श्रीकृष्णद्वारा वर-प्राप्ति, आश्रमपर मित्रोंके साथ उनका विजय-यात्रा करना और शुभ शकुनोंका प्रकट होना, नर्मदातटपर रात्रिमें परशुरामको स्वप्नमें शुभ शकुनोंका दिखलायी देना श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर भृगुवंशी परशुराम हर्षपूर्वक शिव, दुर्गा तथा भद्रकालीको प्रणाम करके पुष्करतीर्थमें गये और वहाँ मन्त्र सिद्ध करने लगे। उन्होंने एक महीनेतक अन्न-जलका परित्याग कर दिया और भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णके चरणकमलका ध्यान करते हुए वायुको अवरुद्ध कर दिया। फिर आँखें खोलकर देखा तो उनको आकाश एक अद्भुत तेजसे व्याप्त दिखायी पड़ा। उस तेजसे दसों दिशाएँ उदीप्त हो रही थीं और सूर्यका तेज प्रतिहत हो गया था। उस तेजोमण्डलके मध्य उन्हें एक रत्ननिर्मित विमान दीख पड़ा, जिसपर एक अत्यन्त सुन्दर श्रेष्ठ पुरुष दृष्टिगोचर हो रहे थे। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले थे तथा उनका मुख मन्द मुसकानसे खिल रहा था। परशुरामने उन ईश्वरको दण्डकी भाँति लेटकर सिरसे प्रणाम किया और वर माँगा—'भगवन् ! मैं इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे रहित कर दूँ, आपके चरणकमलोंमें मेरी अनपायिनी सुदृढ़ भक्ति हो और मैं निरन्तर आपके पादारविन्दका दास बना रहूँ—यह वर मुझे प्रदान कीजिये।' तब श्रीकृष्ण उन्हें वह वर देकर वहीं अन्तर्धान हो गये और परशुराम उन क्रतूनां राजसूयो यो गायत्री छन्दसां च यः। गन्धर्वाणां चित्ररथस्तं गरिष्ठं नमाम्यहम्॥ क्षीरस्वरूपो गव्यानां पवित्राणां च पावकः। पुण्यदानां च यः स्तोत्रं तं नमामि शुभप्रदम्॥ तृणानां कुशरूपो यो व्याधिरूपश्च वैरिणाम्। गुणानां शान्तरूपो यश्चित्ररूपं नमाम्यहम्॥ तेजोरूपो ज्ञानरूपः सर्वरूपश्च यो महान्। सर्वानिर्वचनीयं च तं नमामि स्वयं विभुम्॥ सर्वाधारेषु यो वायुर्यथात्मा नित्यरूपिणाम्। आकाशो व्यापकानां यो व्यापकं तं नमाम्यहम्॥ वेदानिर्वचनीयं यन्न स्तोतुं पण्डितः क्षमः। यदनिर्वचनीयं च को वा तत्स्तोतुमीश्वरः॥ वेदा न शक्ता यं स्तोतुं जडीभूता सरस्वती। तं च वाङ्मनसोः पारं को विद्वान् स्तोतुमीश्वरः॥ शुद्धतेजःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम्। अतीवकमनीयं च श्यामरूपं नमाम्यहम्॥ द्विभुजं मुरलीवक्त्रं किशोरं सस्मितं मुदा। शश्वद् गोपाङ्गनाभिश्च वीक्ष्यमाणं नमाम्यहम्॥ राधया दत्तताम्बूलं भुक्तवन्तं मनोहरम्। रत्नसिंहासनस्थं च तमीशं प्रणमाम्यहम्॥ रत्नभूषणभूषाढ्यं सेवितं श्वेतचामरैः। पार्षदप्रवरैर्गोपकुमारैस्तं नमाम्यहम्॥ वृन्दावनान्तरे रम्ये रासोल्लाससमुत्सुकम्। रासमण्डलमध्यस्थं नमामि रसिकेश्वरम्॥ शतशृङ्गे महाशैले गोलोके रत्नपर्वते। विरजापुलिने रम्ये प्रणमामि विहारिणम्॥ परिपूर्णतमं शान्तं राधाकान्तं मनोहरम्। सत्यं ब्रह्मस्वरूपं च नित्यं कृष्णं नमाम्यहम्॥ श्रीकृष्णस्य स्तोत्रमिदं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। धर्मार्थकाममोक्षाणां स दाता भारते भवेत्॥ हरिदास्यं हरौ भक्तिं लभेत् स्तोत्रप्रसादतः। इह लोके जगत्पूज्यो विष्णुतुल्यो भवेद् ध्रुवम्॥ सर्वसिद्धेश्वरः शान्तोऽप्यन्ते याति हरेः पदम्। तेजसा यशसा भाति यथा सूर्यो महीतले॥ जीवन्मुक्तः कृष्णभक्तः स भवेन्नात्र संशयः। अरोगी गुणवान् विद्वान् पुत्रवान् धनवान् सदा॥ षड्विज्ञो दशबलो मनोयायी भवेद् ध्रुवम्। सर्वज्ञः सर्वदर्शैव स दाता सर्वसम्पदाम्। कल्पवृक्षसमः शश्वद् भवेत् कृष्णप्रसादतः ॥ इत्येवं कथितं स्तोत्रं त्वं वत्स गच्छ पुष्करम्। तत्र कृत्वा मन्त्रसिद्धिं पश्चात् प्राप्स्यसि वाञ्छितम्॥ त्रिःसप्तकृत्वो निर्भूपां कुरु पृथ्वीं यथासुखम्। ममाशिषा मुनिश्रेष्ठ श्रीकृष्णस्य प्रसादतः॥ (३२। २७—७६)

गणपतिखण्ड ३८३ शब्द और विजयसूचक बादलोंकी गड़गड़ाहट सुनायी पड़ी। उसी समय आकाशवाणी भी हुई कि 'तुम्हारी विजय होगी।' इस तरह अनेक प्रकारके शुभ शब्दोंको सुनते हुए भगवान् परशुरामने यात्रा आरम्भ की। चलते ही उन्होंने अपने आगे ब्राह्मण, वन्दी, ज्योतिषी और भिक्षुकको देखा। फिर नाना प्रकारके आभूषणोंसे सजी हुई एक पति-पुत्रसम्पन्ना सती नारी हाथमें प्रज्वलित दीपक लिये हुए मुस्कराती हुई सामने आयी। चलते- चलते परशुरामने अपने दाहिनी ओर यात्राके समय मङ्गलकी सूचना देनेवाले शव, शृगाली, जलसे पूर्ण घट, नीलकण्ठ, नेवला, कृष्णसार मृग, हाथी, सिंह, घोड़ा, गैंडा, द्विप, चमरी गाय, परात्परको नमस्कार करके अपने आश्रमको राजहंस, चक्रवाक, शुक, कोयल, मोर, खंजन, लौट आये। उस समय उनका दाहिना अङ्ग सफेद चील, चकोर, कबूतर, बगुलोंकी पंक्ति, फड़कने लगा, जो शुभ मङ्गलोंका सूचक था। बत्तख, चातक, गौरैया, बिजली, इन्द्रधनुष, सूर्य, रातमें उन्हें वाञ्छासिद्धिको प्रकट करनेवाला सूर्यकी प्रभा, तुरंतका काटा हुआ मांस, जीवित उत्तम स्वप्न भी दीख पड़ा। इससे उनका मन मछली, शङ्ख, सुवर्ण, माणिक्य, चाँदी, मोती, रात-दिन प्रसन्न और संतुष्ट रहने लगा। वे हीरा, मूँगा, दही, लावा, सफेद धान, सफेद स्वजनोंसे सारा वृत्तान्त पूर्णतया बतलाकर फूल, कुंकुम, पानका पत्ता, पताका, छत्र, दर्पण, आनन्दपूर्वक आश्रममें निवास करने लगे। श्वेत चँवर, सवत्सा गौ, रथारूढ़ भूपाल, दूध, तदनन्तर महाबली परशुरामने अपने शिष्योंको, घी, राशि-राशि अमृत, खीर, शालग्राम, पका पिताके शिष्योंको, भाइयोंको तथा बन्धु-बान्धवोंको हुआ फल, स्वस्तिक, शक्कर, मधु, बिलाव, बुला-बुलाकर उनके साथ तरह-तरहकी साँड़, भेड़ा, पर्वतीय चूहा, मेघाच्छन्न सूर्यका सलाह की और उनसे अपना पूर्वापरका वृत्तान्त उदय, चन्द्रमण्डल, कस्तूरी, पंखा, जल, हल्दी, कहकर शुभ मुहूर्तमें वे उन्हींके साथ विजययात्राके तीर्थकी मिट्टी, पीली या सफेद सरसों, दूब, लिये उद्यत हुए। ब्राह्मणका बालक और कन्या, मृग, वेश्या, भौंरा, उस समय परशुरामको मङ्गल शकुन दिखायी कपूर, पीला वस्त्र, गोमूत्र, गोबर, गौके खुरकी पड़ने लगे और जयकी सूचना देनेवाले शब्द धूलि, गोपदसे चिह्नित गोष्ठ, गौओंका मार्ग सुनायी दिये। तब उन्होंने मन-ही-मन सबका (डहर), रमणीय गोशाला, सुन्दर गोगति, भूषण, विचार करके निश्चय कर लिया कि मेरी विजय देवप्रतिमा, प्रज्वलित अग्नि, महोत्सव, ताँबा, होगी और शत्रुओंका संहार होगा। यात्राके स्फटिक, वैद्य, सिंदूर, माला, चन्दन, सुगन्ध, हीरा अवसरपर सहसा मुनिको अपने सामने मयूरकी और रत्न देखा। उन्हें सुगन्धित वायुका आघ्राण बोली, सिंहकी गर्जना, घण्टा और दुन्दुभीकी और ब्राह्मणोंका शुभाशीर्वाद प्राप्त हुआ। इस ध्वनि, संगीत, कल्याणकारी नवीन सांकेतिक प्रकार माङ्गलिक अवसर जानकर वे हर्षपूर्वक आगे

३८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


बढ़े और सूर्यास्त होते-होते नर्मदाके तटपर पहुँच गये।

वहाँ उन्हें एक अत्यन्त मनोहर दिव्य अक्षयवट दिखायी दिया। वह अत्यन्त ऊँचा, विस्तारवाला और उत्तम एवं पावन आश्रम-स्थान था। वहाँ सुगन्धित वायु बह रही थी। वहीं पुलस्त्य-नन्दनने तपस्या की थी। वहीं कार्तवीर्यार्जुनके आश्रमके निकट परशुराम अपने गणोंके साथ ठहर गये। वहाँ उन्होंने रातमें पुष्प-शय्यापर शयन किया। थके तो वे थे ही, अतः किंकरोंद्वारा भलीभाँति सेवा किये जानेपर परमानन्दमें निमग्न हो निद्राके वशीभूत हो गये। रात व्यतीत होते-होते भार्गव परशुरामको एक सुन्दर स्वप्न दिखायी दिया, जो वायु, पित्त और कफके प्रकोपसे रहित था और जिसका पहले मनमें विचार भी नहीं किया गया था।

उन्होंने देखा कि मैं हाथी, घोड़ा, पर्वत, अट्टालिका, गौ और फलयुक्त वृक्षपर चढ़ा हुआ हूँ। मुझे कीड़े काट रहे हैं जिससे मैं रो रहा हूँ। मेरे शरीरमें चन्दन लगा है। मैं पीले वस्त्रसे शोभित तथा पुष्पमाला धारण किये हुए हूँ। मेरा सारा शरीर मल-मूत्रसे सराबोर है और उसमें मज्जा और पीब चुपड़ा हुआ है, ऐसी दशामें मैं नौकापर सवार हूँ और उत्तम वीणा बजा रहा हूँ। फिर देखा कि मैं नदीतटपर बड़े-बड़े कमल-पत्रोंपर रखकर दही, घी और मधु-मिश्रित खीर खा रहा हूँ। पुनः देखा कि मैं पान चबा रहा हूँ। मेरे सामने फल, पुष्प और दीपक रखे हुए हैं तथा ब्राह्मण मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। फिर अपनेको बारंबार पके हुए फल, दूध, शक्करमिश्रित गरमा-गरम अन्न, स्वस्तिकके आकारकी बनी हुई मिठाई खाते देखा। पुनः उन्होंने देखा कि मुझे जल-जन्तु, बिच्छू, मछली तथा सर्प काट रहे हैं और मैं भयभीत होकर भाग रहा हूँ। फिर देखा कि मैं चन्द्रमा और सूर्यका मण्डल, पति और पुत्रसे सम्पन्न नारी और मुस्कराते हुए ब्राह्मणको देख रहा हूँ। पुनः अपनेको सुन्दर वेषवाली परम संतुष्ट कन्या तथा संतुष्ट एवं मुस्कानयुक्त ब्राह्मणद्वारा आलिङ्गित होते हुए देखा। फिर देखा कि मैं फल-पुष्पसमन्वित वृक्ष, देवताकी मूर्ति तथा हाथीपर एवं रथपर सवार हुए राजाको देख रहा हूँ। पुनः उन्होंने देखा कि मैं एक ऐसी ब्राह्मणीको देख रहा हूँ, जो पीला वस्त्र धारण किये हुए है, रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित है और घरमें प्रवेश कर रही है। फिर अपनेको शङ्ख, स्फटिक, श्वेत माला, मोती, चन्दन, सोना, चाँदी और रत्न देखते हुए पाया। पुनः भार्गवको हाथी, बैल, श्वेत सर्प, श्वेत चँवर, नीला कमल और दर्पण दिखायी पड़ा। परशुरामने स्वप्नमें अपनेको रथारूढ़, नये रत्नोंसे संयुक्त, मालतीकी मालाओंसे शोभित और रत्नसिंहासनपर स्थित देखा। परशुरामने स्वप्नमें कमलोंकी पंक्ति, भरा हुआ घट, दही, लावा, घी, मधु, पत्तेका छत्र और नाई देखा। भृगुनन्दनने स्वप्नमें बगुलोंकी कतार, हंसोंकी पाँति और मङ्गल-कलशकी पूजा करती हुई व्रती कन्याओंकी पंक्ति देखी। परशुरामने स्वप्नमें उन ब्राह्मणोंको देखा, जो मण्डपमें स्थित होकर शिव और विष्णुकी पूजा कर रहे थे तथा 'जय हो' ऐसा उच्चारण कर रहे थे। फिर परशुरामने स्वप्नमें सुधावृष्टि, पत्तोंकी वर्षा, फलोंकी वृष्टि, लगातार होती हुई पुष्प और चन्दनकी वर्षा, तुरंतका काटा हुआ मांस, जीवित मछली, मोर, श्वेत खंजन, सरोवर, तीर्थ, कबूतर, शुक, नीलकण्ठ, सफेद चील, चातक, बाघ, सिंह, सुरभी, गोरोचन, हल्दी, सफेद धानका विशाल पर्वत, प्रज्वलित अग्नि, दूब, समूह-के-समूह देव-मन्दिर, पूजित शिवलिङ्ग और पूजा की हुई शिवकी मृण्मयी मूर्तिको देखा। परशुरामने स्वप्नमें जौ और गेहूँके आटेकी पूड़ी और लड्डू देखा और उन्हें बारंबार खाया। फिर अकस्मात्

राजा सुचन्द्र और परशुरामका युद्ध, परशुरामद्वारा कालीस्तवन, ब्रह्माका आकर परशुरामको युक्ति बताना, परशुरामका राजा सुचन्द्रसे मन्त्र और कवच माँगकर उसका वध करना

गणपतिखण्ड ३८५

अपनेको शस्त्रसे घायल और जंजीरसे बँधा हुआ देखकर उनकी नींद टूट गयी और वे प्रातःकाल श्रीहरिका स्मरण करते हुए उठ बैठे। इस स्वप्नसे उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। तत्पश्चात् उन्होंने अपना प्रातःकालिक नित्य कर्म सम्पन्न किया और मनमें ऐसा समझ लिया कि निश्चय ही सारे शत्रुओंको जीत लूँगा।

(अध्याय ३३)


परशुरामका कार्तवीर्यके पास दूत भेजना, दूतकी बात सुनकर राजाका युद्धके लिये उद्यत होना और रानी मनोरमासे स्वप्नदृष्ट अपशकुनका वर्णन करना, रानीका उन्हें परशुरामकी शरण ग्रहण करनेको कहना, परंतु राजाका मनोरमाको समझाकर युद्धयात्राके लिये उद्यत होना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर भृगुवंशी परशुरामने प्रातःकालिक नित्यकर्म समाप्त करके भाई-बन्धुओंके साथ परामर्श किया और कार्तवीर्यके आश्रमपर दूत भेजा। उस दूतने शीघ्र ही जाकर राजाधिराज कार्तवीर्यसे कहा। उस समय राजा मन्त्रियोंसे घिरे हुए राजसभामें बैठे थे।

परशुरामका दूत बोला—महाराज! नर्मदा-तटके निकट अक्षयवटके नीचे भृगुवंशी परशुराम भाइयोंसहित पधारे हुए हैं। वे इक्कीस बार पृथ्वीको राजाओंसे शून्य करेंगे। अतः आप वहाँ चलिये अथवा भाई-बन्धुओंके साथ युद्ध कीजिये। इतना कहकर परशुरामका दूत उनके पास लौट गया। इधर राजा कवच धारण करके रण-यात्राके लिये उद्यत हुआ। तब महारानी मनोरमाने अपने प्राणपतिको युद्धमें जानेके लिये उद्यत देख उसे रोक दिया और अपने पास ही बैठा लिया। मुने! मनोरमाको देखकर राजाके नेत्र और मुख प्रसन्नतासे खिल उठे। फिर तो उसने सभाके बीच रानीसे अपने मनकी बात कही।

कार्तवीर्यार्जुन कहने लगा—प्रिये! जमदग्निके महान् पराक्रमी पुत्र परशुराम भाइयोंके साथ नर्मदा-तटपर ठहरे हुए हैं। वे मुझे युद्धके लिये ललकार रहे हैं। उन्हें शंकरजीसे शस्त्र और श्रीहरिका मन्त्र तथा कवच प्राप्त हो गया है; अतः वे इक्कीस बार भूमिको भूपालोंसे हीन कर देना चाहते हैं। इस समाचारसे मेरे प्राण काँप उठे हैं, मन बारंबार क्षुब्ध हो रहा है और मेरा बायाँ अङ्ग निरन्तर फड़क रहा है। प्रिये! मैंने एक स्वप्न भी देखा है, सुनो।

मैंने देखा है—मैं तेलसे सराबोर हूँ, लाल वस्त्र धारण किये हुए हूँ, शरीरपर लाल चन्दन लगा है, लोहेके आभूषणोंसे भूषित हूँ, अड़हुलके फूलोंकी माला पहने हूँ और गधेपर चढ़कर हँस रहा हूँ तथा बुझे हुए अंगारोंकी राशिसे क्रीड़ा कर रहा हूँ। पतिव्रते! पृथ्वीपर अड़हुलके पुष्प बिखरे हुए हैं और वह राखसे आच्छादित हो गयी है। आकाश चन्द्रमा और सूर्यसे रहित होकर संध्याकालीन लालिमासे व्याप्त हो गया है। मैंने एक विधवा स्त्रीको देखा, जो लाल वस्त्र पहने थी, केश खुले थे, नाक कट गयी थी और वह अट्टहास करती हुई नाच रही थी। महारानी! मैंने एक चिता देखी, जिसपर बाण बिछे थे और वह अग्निसे रहित एवं भस्मसे संयुक्त थी। फिर राखकी वर्षा, रक्तकी वर्षा और अंगारोंकी वर्षा होते हुए देखा। पृथ्वी पके हुए ताड़के फलोंसे आच्छादित और हड्डियोंसे संयुक्त थी। फिर खोपड़ियोंकी ढेरी दीख पड़ी, जो कटे हुए बालों और नखोंसे युक्त थी। फिर रातके समय नमकका पहाड़, कौड़ियोंकी ढेरी और धूल तथा तेलकी कन्दरा दृष्टिगोचर हुई। फिर फूलोंसे लदे हुए

३२- दशाक्षरी महाविद्या तथा काली-कवचका वर्णन

३८६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अशोक और करवीरके वृक्ष दीख पड़े। वहीं ताड़के वृक्ष भी थे, जिनमें फल लगे थे और पटापट गिर रहे थे। यह भी देखा कि मेरे हाथसे भरा हुआ कलश गिर पड़ा और चकनाचूर हो गया तथा आकाशसे चन्द्रमण्डल गिर रहा है। पुनः आकाशसे भूतलपर गिरते हुए सूर्यमण्डलको तथा उल्कापात, धूमकेतु और सूर्य एवं चन्द्रमाके ग्रहणको देखा। फिर एक ऐसे भयानक पुरुषको सामनेसे आते हुए देखा, जिसका आकार बेडौल था, मुख विकराल था और जिसके शरीरपर वस्त्र नहीं था। रातमें मैंने यह भी देखा कि एक बारह वर्षकी अवस्थावाली युवती, जो वस्त्र और आभूषणोंसे सुशोभित थी, रुष्ट होकर मेरे घरसे बाहर जा रही है। (जाते समय उसने कहा—) 'राजेन्द्र! आप शोकपूर्ण चित्तसे बोलते हैं; अतः मैं आपके घरसे वनको चली जाऊँगी; इसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये।' मैंने देखा कि क्रुद्ध ब्राह्मण, संन्यासी और गुरु मुझे शाप दे रहे हैं और दीवालपर चित्रित पुत्तलिकाएँ नाच रही हैं। रातमें मैंने देखा कि चञ्चल गीधों, कौओं और भैंसोंका समूह मुझे पीड़ा पहुँचा रहा है। महारानी! मैंने तेल, तेलीद्वारा घुमाया जाता हुआ कोल्हू और पाशधारी दिगम्बरोंको देखा। मैंने रातमें देखा कि मेरे घरमें परमानन्ददायक विवाहोत्सव मनाया जा रहा है, जिसमें सभी गायक गीत गा रहे हैं और नाच रहे हैं। रातमें देखा कि लोग रमण कर रहे हैं, परस्पर खींचातानी कर रहे हैं और कौवे तथा कुत्ते लड़ रहे हैं। कामिनि! रातमें मोटक, पिण्ड, शवसंयुक्त श्मशान, लाल वस्त्र और सफेद वस्त्र भी दीखे हैं। शोभने! मैंने देखा कि एक विधवा स्त्री, जो काले रंगकी थी और काला वस्त्र पहने हुए थी तथा जिसके बाल खुले हुए थे, नंगी होकर मेरा आलिङ्गन कर रही है। प्रिये! नाई मेरे सिर तथा दाढ़ीके बाल छील रहा है और वक्षःस्थलपर नखोंकी खरोंच लगी है; रातमें मैंने ऐसा भी देखा है। सुन्दरि! पादुका, चमड़ेकी रस्सियोंकी बहुत बड़ी राशि और कुम्हारके चाकको भूमिपर घूमते हुए देखा। सुव्रते! रातमें देखा कि आँधीने एक सूखे पेड़को झकझोरकर उखाड़ दिया है और वह वृक्ष पुनः उठकर खड़ा हो गया है तथा बिना सिरका धड़ चक्कर काट रहा है। श्रेष्ठे! एक गुँथी हुई मुण्डोंकी माला, जिसमें अत्यन्त भयंकर दाँत दीख रहे थे तथा जिसे आँधीने चूर-चूर कर दिया था, मुझे दीख पड़ी। रातमें मैंने यह भी देखा कि झुंड-के-झुंड भूत-प्रेत, जिनके बाल खुले हुए थे और जो मुखसे आग उगल रहे थे— मुझे लगातार भयभीत कर रहे हैं। रातमें मैंने जला हुआ जीव, झुलसा हुआ वृक्ष, व्याधिग्रस्त मनुष्य और अङ्गहीन शूद्रको भी देखा है। रातमें मैंने यह भी देखा कि सहसा घर, पर्वत और वृक्ष गिर रहे हैं तथा बारंबार वज्रपात हो रहा है। रातमें घर-घरमें कुत्ते और सियार निश्चितरूपसे बारंबार रो रहे थे, मुझे यह भी दिखायी पड़ा है। मैंने एक पुरुषको देखा—जो दिगम्बर था, जिसके बाल बिखरे थे और जो नीचे मस्तक तथा पैर ऊपर करके पृथ्वीपर घूम रहा था। उसकी आकृति और बोली विकृत थी। फिर प्रातःकाल ग्रामके अधिदेवताका रुदन सुनकर मैं जाग पड़ा। अब बतलाओ, इसका क्या उपाय है। राजाकी बात सुनकर मनोरमाका हृदय दुःखी हो गया। वह रोती हुई राजाधिराज कार्तवीर्यसे गद्गद वाणीमें बोली।

मनोरमाने कहा— हे नाथ! आप रमण करनेवालोंमें उत्तम, समस्त महीपालोंमें श्रेष्ठ और मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। प्राणेश्वर! मेरा शुभकारक वचन सुनिये। जमदग्निनन्दन महाबली भगवान् परशुराम नारायणके अंश हैं। ये सृष्टिका संहार करनेवाले जगदीश्वर शिवके शिष्य हैं। जिनकी ऐसी प्रतिज्ञा है कि मैं इक्कीस बार

···· गणपतिखण्ड ३८७

पृथ्वीको भूपालोंसे शून्य कर दूँगा, उनके साथ आप युद्ध न छेड़िये। पापी रावणको जीतकर जो आप अपनेको शूरवीर मानते हैं, (यह आपका भ्रम है; क्योंकि) उसे आपने नहीं जीता है, बल्कि वह अपने पापसे पराजित हुआ है; क्योंकि जो धर्मकी रक्षा नहीं करता, उसका भूतलपर कौन रक्षक हो सकता है? वह मूर्ख स्वयं नष्ट हो जाता है और वह जीते हुए भी मृतकके समान है। जो धर्मके तथा शुभाशुभ कर्मके साक्षी और आत्माराम हैं, वे निरन्तर अपने अंदर वर्तमान हैं; परंतु आपकी बुद्धि मोहाच्छन्न हो गयी है; अतः आप उन्हें नहीं देखते हैं। नरेश! उत्तम धर्मात्माओंके जो-जो स्त्री-पुत्र आदि तथा समस्त ऐश्वर्यकी वस्तुएँ हैं, वे सभी जलके बुलबुलेके सदृश अनित्य और विनाशशील हैं। इसीलिये इस भारतमें संतलोग संसारको स्वप्न-सदृश मानकर निरन्तर धर्मका ध्यान करते हैं और भक्तिपूर्वक तपस्यामें रत रहते हैं। राजन्! मालूम होता है, दत्तात्रेयजीने जो ज्ञान दिया था, वह सब आप भूल गये। यदि है तो फिर आपका मन ब्राह्मणकी हत्या करनेमें कैसे प्रवृत्त हुआ? आप तो मनोविनोदके लिये शिकार खेलने गये थे। वहाँ ब्राह्मणके आश्रममें ठहरकर आपने अपूर्व मिष्टान्नका भोजन किया और व्यर्थ ही ब्राह्मणको मार डाला। जो गुरु, ब्राह्मण और देवताका अपमान करता है, उसके इष्टदेव उसपर रुष्ट हो जाते हैं और विपत्ति उसे आ घेरती है। अतः राजेन्द्र! आप दत्तात्रेयजीके चरणकमलोंका स्मरण कीजिये; क्योंकि गुरु-भक्ति सबके सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाश करनेवाली है। अब आप गुरुदेवकी भलीभाँति अर्चना करके उन भृगुनन्दनकी शरण ग्रहण कीजिये। परम बुद्धिमान् राजा कार्तवीर्यने मनोरमाकी बात सुनकर उसे समझाया और पुनः रानीको उत्तर दिया।

कार्तवीर्यार्जुनने कहा— कान्ते! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया। अब मैं जो कहता हूँ, उसे श्रवण करो। शोकपीड़ित लोगोंके वचन सभाओंमें प्रशंसनीय नहीं माने जाते। सुन्दरी! कर्मभोगके योग्य काल आनेपर सुख, दुःख, भय, शोक, कलह और प्रेम—ये सभी होते रहते हैं; क्योंकि काल राज्य देता है; काल मृत्यु और पुनर्जन्मका कारण होता है, काल संसारकी सृष्टि करता है, काल ही पुनः उसका संहार करता है और काल ही पालन करता है। काल भगवान् जनार्दनका स्वरूप है; परंतु श्रीकृष्ण उस कालके भी काल और विधाताके भी ब्रह्मा हैं। सृष्टिका आविर्भाव और तिरोधान उन्हींकी आज्ञासे होता है। मनुष्यके सारे कार्य उन्हींकी आज्ञासे होते हैं, अपनी इच्छासे कुछ भी नहीं होता। महाबली भगवान् परशुराम नारायणके अंश हैं। यदि उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं इक्कीस बार पृथ्वीको राजाओंसे शून्य कर दूँगा तो उनकी वह प्रतिज्ञा कभी विफल नहीं हो सकती। सुव्रते! साथ ही मैं यह निश्चित रूपसे जानता हूँ कि मैं उनका वध्य हूँ। तब भला, भविष्यकी सारी बातें जानकर भी मैं उनकी शरणमें कैसे जा सकता हूँ? क्योंकि प्रतिष्ठित पुरुषोंकी अपकीर्ति मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायिनी होती है। इतना कहकर सम्राट् कार्तवीर्यने समरभूमिमें जानेके लिये उद्यत हो बाजा बजवाया और माङ्गलिक कार्य सम्पन्न करवाये। वह असंख्य राजाओंको, तीन लाख राजाधिराजोंको, महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न एक सौ अक्षौहिणी सेनाओंको तथा असंख्यों घोड़े, हाथी, पैदल सिपाही और रथोंको साथ लेकर रण-यात्राके लिये तैयार हुआ। उसे कवच और बाणसहित अक्षय धनुष धारण करके यात्राके लिये समुत्सुक देख साध्वी मनोरमा स्तब्ध हो गयी।

(अध्याय ३४)

३३- सुचन्द्र-पुत्र पुष्कराक्षके साथ परशुरामका युद्ध, पाशुपतास्त्र छोड़नेके लिये उद्यत परशुरामके पास विष्णुका आना और उन्हें समझाना, विष्णुका विप्रवेषसे पुत्रसहित पुष्कराक्षसे लक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको माँग लेना, लक्ष्मीकवचका वर्णन

३८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण राजाको युद्धके लिये उद्यत देख मनोरमाका योगद्वारा शरीर-त्याग, राजाका विलाप और आकाशवाणी सुनकर उसकी अन्त्येष्टि-क्रिया करना, युद्धयात्राके समय नाना प्रकारके अपशकुन देखना, कार्तवीर्य और परशुरामका युद्ध तथा कार्तवीर्यका वध, नारायणद्वारा शिव-कवचका वर्णन नारायण कहते हैं— मुने ! मनोरमाने अपने स्वामीके मुखसे भविष्यकी जो-जो बातें सुनीं, उन्हें मनमें धारण कर लिया और यह समझ लिया कि ये बातें अवश्य सत्य होंगी; अतः उसने उसी क्षण अपने प्राणनाथको अपनी छातीसे लगा लिया और पुत्रों, बान्धवों तथा अपने भृत्योंको आगे करके वह भगवच्चरणोंका ध्यान करने लगी। फिर उसने योगद्वारा षट्चक्रका भेदन करके वायुको मूर्धामें स्थापित किया और चञ्चल मनको जलके बुलबुलेके सदृश क्षणभङ्गुर विषयोंसे खींचकर, ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित सहस्रदलसंयुक्त कमलपर स्थापित करके उसे ज्ञानद्वारा निष्कल ब्रह्ममें बाँध दिया। तत्पश्चात् निर्मूल एवं पुनर्जन्मरहित द्विविध कर्मका परित्याग करके उसने वहीं प्राण त्याग दिये; परंतु प्राणोंसे अधिक प्रिय राजाको नहीं छोड़ा। तदनन्तर राजा विविध भाँतिसे करुण विलाप करके फूट-फूटकर रोने लगे। राजाके विलापको सुनकर इस प्रकार आकाशवाणी हुई—'महाराज ! शान्त हो जाओ, क्यों रो रहे हो? तुम तो दत्तात्रेयकी कृपासे बड़े-बड़े ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो; अतः सारे संसारको, जो रमणीय दीख रहा है, जलके बुलबुलेके सदृश क्षणभङ्गुर समझो। वह साध्वी मनोरमा तो लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न हुई थी, अतः वह लक्ष्मीके वासस्थानको चली गयी। अब तुम भी रणभूमिमें युद्ध करके वैकुण्ठमें जाओ।' आकाशवाणीके इस वचनको सुनकर नरेशने शोकका परित्याग कर दिया। तत्पश्चात् चन्दनकी लकड़ीसे दिव्य चिता तैयार की और पुत्रद्वारा अग्निसंस्कार कराकर उसका दाह कराया। फिर मनोरमाके पुण्यके निमित्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, भाँति-भाँतिके वस्त्र और अनेक तरहके अन्यान्य दान दिये। मुने ! उस अवसरपर कार्तवीर्यके आश्रममें सर्वत्र निरन्तर यही शब्द होता था कि 'दान दो, दान दो और खाओ, खाओ'। उस समय राजाद्वारा अधिकृत कोषोंमें जो-जो धन मौजूद था, उसे उसने मनोरमाके पुण्यके निमित्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको दान कर दिया। तदनन्तर असंख्य बाजों तथा सैन्यसमूहोंको साथ लेकर राजा दुःखी हृदयसे समरभूमिके लिये प्रस्थित हुआ। आगे बढ़नेपर यद्यपि राजाको प्रत्येक मार्गमें अमङ्गलके ही दर्शन हुए तथापि वह रणक्षेत्रकी ओर ही बढ़ता गया; पुनः राजधानीको नहीं लौटा। राजाको मार्गमें एक नग्न स्त्री मिली, जिसके बाल बिखरे थे, नाक कटी थी और वह रो रही थी। दूसरी विधवा भी मिली, जो काला वस्त्र पहने थी। आगे मुखदुष्टा, योनिदुष्टा, रोगिणी, कुट्टनी, पति- पुत्रसे विहीन, डाकिनी, कुलटा, कुम्हार, तेली, व्याघ्र, सर्पद्वारा जीविका चलानेवाला (सँपेरा), कुत्सित वस्त्र, अत्यन्त रूखा शरीर, नंगा, काषाय- वस्त्रधारी, चरबी बेचनेवाला, कन्या-विक्रयी, चितामें जलता हुआ शव, बुझे हुए अङ्गारोंवाली राख, सर्पसे डँसा हुआ मनुष्य, साँप, गोह, खरगोश, विष, श्राद्धके लिये पकाया हुआ पाक, पिण्ड, मोटक, तिल, देवमूर्तियोंपर चढ़े हुए धनसे जीवन-निर्वाह करनेवाला ब्राह्मण, वृषवाह (बैलपर सवारी करनेवाला अथवा बैलको जोतनेवाला), शूद्रके श्राद्धान्नका भोजी, शूद्रका रसोइया, शूद्रका पुरोहित, गाँवका पुरोहित, कुशकी पुत्तलिका, मुर्दा जलानेवाला, खाली घड़ा, फूटा घड़ा, तेल, नमक,

गणपतिखण्ड

३८९

हड्डी, रुई, कछुआ, धूल, भौंकता हुआ कुत्ता, दाहिनी ओर भयंकर शब्द करता हुआ सियार, जटा, हजामत, कटा हुआ बाल, नख, मल, कलह, विलाप करता हुआ मनुष्य, अमङ्गलसूचक विलाप करनेवाला तथा शोककारक रुदन करनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, चोर मनुष्य, हत्यारा, कुलटाका पति और पुत्र, कुलटाका अन्न खानेवाला, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी वस्तुओं तथा धनका अपहरण करनेवाला, दान देकर छीन लेनेवाला, डाकू, हिंसक, चुगलखोर, दुष्ट, पिता-मातासे विरक्त, ब्राह्मण और पीपलका विघातक, सत्यका हनन करनेवाला, कृतघ्न, धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य, विप्रद्रोही, मित्रद्रोही, घायल, विश्वासघातक, गुरु, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाला, अपने अङ्गोंको काटनेवाला, जीवहिंसक, अपने अङ्गसे हीन, निर्दयी, व्रत-उपवाससे रहित, दीक्षाहीन, नपुंसक, कुष्ठरोगी, काना, बहरा, पुक्कस (जातिविशेष), कटे हुए लिङ्गवाला (नागा), मदिरासे मतवाला, मदिरा, पागल, खून उगलनेवाला, भैंसा, गदहा, मूत्र, विष्ठा, कफ, मनुष्यकी सूखी खोपड़ी, प्रचण्ड आँधी, रक्तकी वृष्टि, बाजा, वृक्षका गिराया जाना, भेड़िया, सूअर, गीध, बाज, कङ्क (एक मांसाहारी पक्षी), भालू, पाश, सूखी लकड़ी, कौआ, गन्धक, पहले-पहल दान लेनेवाला ब्राह्मण (महापात्र), तन्त्र-मन्त्रसे जीविका चलानेवाला, वैद्य, रक्त-पुष्प, औषध, भूसी, दूषित समाचार, मृतककी बातचीत, ब्राह्मणका दारुण शाप, दुर्गन्धयुक्त वायु और दुःशब्द आदि राजाके सामने आये। राजाका मन दूषित हो गया, प्राण निरन्तर क्षुब्ध रहने लगे, बायाँ अङ्ग फड़कने लगा और शरीरमें जडता आ गयी तथापि राजाको युद्धमें ही अपना मङ्गल दीख रहा था; अतः वह निःशङ्क हो सारी सेनाओंको साथ लेकर युद्धक्षेत्रमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ भृगुवंशी परशुरामको सामने देखकर वह तुरंत रथसे उतर पड़ा और भक्तिपूर्वक बड़े-बड़े राजाओंके साथ दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें प्रणाम किया। तब परशुरामने 'तुम स्वर्गमें जाओ' ऐसा राजाको उसका अभीष्ट आशीर्वाद दिया। वह उनके मनोऽनुकूल ही हुआ; क्योंकि ब्राह्मणके आशीर्वचन दुर्लङ्घ्य होते हैं। तदनन्तर राजराजेश्वर कार्तवीर्य उसी क्षण राजाओंसहित परशुरामको नमस्कार करके तुरंत ही रथपर, जो नाना प्रकारकी युद्ध-सामग्रीसे सम्पन्न था, सवार हुआ। फिर उसने सहसा दुन्दुभि, मुरज आदि तरह-तरहके बाजे बजवाये और ब्राह्मणोंको धन दान किया। तब वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परशुराम राजाओंकी उस सभामें राजाधिराज कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतियुक्त वचन बोले।

**परशुरामने कहा—**अये धर्मिष्ठ राजेन्द्र! तुम तो चन्द्रवंशमें उत्पन्न हुए हो और विष्णुके अंशभूत बुद्धिमान् दत्तात्रेयके शिष्य हो। तुम स्वयं विद्वान् हो और वेदज्ञोंके मुखसे तुमने वेदोंका श्रवण भी किया है; फिर भी तुम्हें इस समय सज्जनोंको विडम्बित करनेवाली दुर्बुद्धि कैसे उत्पन्न हो गयी? तुमने पहले लोभवश निरीह ब्राह्मणकी हत्या कैसे कर डाली? जिसके कारण सती-साध्वी ब्राह्मणी शोक-संतप्त होकर पतिके

३९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

साथ सती हो गयी। भूपाल! इन दोनोंके वधसे परलोकमें तुम्हारी क्या गति होगी? यह सारा संसार तो कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलकी बूँदकी तरह मिथ्या ही है। सुयश हो अथवा अपयश, इसकी तो कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। अहो! सत्पुरुषोंकी दुष्कीर्ति हो, इससे बढ़कर और क्या विडम्बना होगी? कपिला कहाँ गयी, तुम कहाँ गये, विवाद कहाँ गया और मुनि कहाँ चले गये; परंतु एक विद्वान् राजाने जो कर्म कर डाला, वह हलवाहा भी नहीं कर सकता। मेरे धर्मात्मा पिताने तो तुम-जैसे नरेशको उपवास करते देखकर भोजन कराया और तुमने उन्हें वैसा फल दिया! राजन्! तुमने शास्त्रोंका अध्ययन किया है, तुम प्रतिदिन ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देते हो और तुम्हारे यशसे सारा जगत् व्याप्त है। फिर बुढ़ापेमें तुम्हारी अपकीर्ति कैसे हुई? प्राचीन कालके वन्दीगण ऐसा कहते हैं कि भूतलपर कार्तवीर्यार्जुनके समान दाता, सर्वश्रेष्ठ, धर्मात्मा, यशस्वी, पुण्यशाली और उत्तम बुद्धिसम्पन्न न कोई हुआ है और न आगे होगा। जो पुराणोंमें विख्यात है, उसकी ऐसी अपकीर्ति! आश्चर्य है। राजन्! प्राणियोंके लिये दुर्वाक्य तीखे अस्त्रसे भी बढ़कर दुस्सह होता है; इसीलिये संकट-कालमें भी सत्पुरुषोंके मुखसे दुर्वचन नहीं निकलते। राजेन्द्र! मैं तुमपर दोषारोपण नहीं कर रहा हूँ, बल्कि सच्ची बात कह रहा हूँ; अतः इस राजसभामें तुम मुझे उत्तर दो। इस सभामें सूर्य, चन्द्र और मनुके वंशज विद्यमान हैं; अतः सभामें तुम ठीक-ठीक बतलाओ, जिसे तुम्हारे पितर और देवगण भी सुनें। साथ ही सत्-असत्को कहनेमें समर्थ ये सारे नरेश भी श्रवण करें; क्योंकि समदृष्टि रखनेवाले सत्पुरुष लोग पक्षपातकी बात नहीं कहते। युद्धस्थलमें इतना कहकर परशुराम चुप हो गये। तब बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् राजाने कहना आरम्भ किया।

कार्तवीर्यार्जुनने कहा— हे राम! आप श्रीहरिके अंश, हरिके भक्त और जितेन्द्रिय हैं। मैंने जिनके मुखसे धर्म श्रवण किया है, आप उनके गुरुके भी गुरु हैं। जो कर्मवश ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म-चिन्तन करता है और अपने धर्ममें तत्पर एवं शुद्ध है, इसीलिये वह ब्राह्मण कहलाता है। जो मनन करनेके कारण नित्य बाहर-भीतर कर्म करता रहता है, सदा मौन धारण किये रहता है और समय आनेपर बोलता है, वह मुनि कहलाता है। जिसकी सुवर्ण और मिट्टीके ढेलेमें, घर और जंगलमें तथा कीचड़ और अत्यन्त चिकने चन्दनमें समताकी भावना है, वह योगी कहा जाता है। जो सम्पूर्ण जीवोंमें समत्व-बुद्धिसे विष्णुकी भावना करता है और श्रीहरिकी भक्ति करता है, वह हरिभक्त कहा जाता है*। ब्राह्मणोंका धन तप है। चूँकि तपस्या कल्पतरु और कामधेनुके समान है, इसीलिये उनकी निरन्तर तपमें इच्छा लगी रहती है। रजोगुणी पुरुष कर्मोंके रागवश राजसिक कार्य करता है और रागान्ध होकर रजोगुणी कार्योंमें लगा रहता है; इसी कारण वह राजा कहा जाता है। मुने! रागवश मैंने कामधेनुकी याचना की थी; अतः मुझ अनुरागी क्षत्रियका इसमें कौन-सा अपराध हुआ? फिर भी, आपके पिताने महान्


* कर्मणा ब्राह्मणो जातः करोति ब्रह्मभावनम्। स्वधर्मनिरतः शुद्धस्तस्माद् ब्राह्मण उच्यते॥
अन्तर्बहिश्च मननात् कुरुते कर्म नित्यशः। मौनी शश्वद् वदेत् काले यो हि स मुनिरुच्यते॥
स्वर्णे लोष्टे गृहेऽरण्ये पङ्के सुस्निग्धचन्दने। समता भावना यस्य स योगी परिकीर्तितः॥
सर्वजीवेषु यो विष्णुं भावयेत् समताधिया। हरौ करोति भक्तिं च हरिभक्तः स च स्मृतः॥
(३५।७०—७३)

३४- दुर्गाकवचका वर्णन

गणपतिखण्ड ३११ बल-पराक्रमसे सम्पन्न बहुत-से भूपालोंका वध | उठाया। त्रिशूल चलाते समय आकाशवाणी हुई- कर डाला। इस समय यहाँ शिशु-अवस्थावाले | 'विप्रवरो ! शिवजीका यह त्रिशूल अमोघ है, इसे राजकुमार ही आये हैं। आपने सम्पूर्ण पृथ्वीको | मत चलाओ; क्योंकि मत्स्यराजके गलेमें सर्वाङ्गोंकी इक्कीस बार भूपालोंसे शून्य कर देनेके लिये जो | रक्षा करनेवाला शिवजीका दिव्य कवच बँधा है, प्रतिज्ञा की है, उसका पालन कीजिये। युद्ध | जिसे पूर्वकालमें दुर्वासाने दिया था। अतः पहले करना तो क्षत्रियोंका धर्म ही है। युद्धमें मृत्युको | राजासे उस प्राण-प्रदान करनेवाले कवचको माँग प्राप्त हो जाना उनके लिये निन्दित नहीं है; परंतु | लो।' मुने! तदनन्तर परशुरामने त्रिशूल चलाकर ब्राह्मणोंकी रण-स्पृहा लोक और वेद-दोनोंमें | राजापर चोट की, परंतु राजाके शरीरसे टकराकर विडम्बनाकी पात्र है। वाणी ही जिनका बल और | उस त्रिशूलके सौ टुकड़े हो गये। तब आकाशवाणी तप ही जिनका धन है, उन ब्राह्मणोंकी शान्ति ही | सुनकर महान् पराक्रमी जमदग्निनन्दन परशुरामने प्रत्येक युगमें स्वस्तिकारक कर्म है। युद्ध करना | शृङ्गधारी संन्यासीका वेष धारण करके राजासे ब्राह्मणका धर्म नहीं है। शान्तिपरायण ब्राह्मण | कवचकी याचना की। राजाने 'ब्रह्माण्ड-विजय' युद्धके लिये उद्योगशील हो, ऐसा तो न देखनेमें | नामक वह उत्तम कवच उन्हें दे दिया। उस ही आया है और न सुना ही गया है। भगवान् | कवचको लेकर परशुरामने पुनः त्रिशूलसे ही नारायणके विद्यमान रहते यह दूसरी तरहका | प्रहार किया। उसके आघातसे मत्स्यराज, जो उलट-फेर कैसे हो गया ? | चन्द्रवंशमें उत्पन्न, गुणवान् और महाबली था, रणाङ्गणमें यों कहकर राजेन्द्र कार्तवीर्य | जिसके मुखकी कान्ति सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान शान्त हो गया। उसके उस वचनको सुनकर सभी | थी, भूतलपर गिर पड़ा। लोग मौन हो गये। तदनन्तर परशुरामके सभी | नारदने कहा-महाभाग नारायण ! मत्स्यराजने भाई, जो बड़े शूरवीर तथा हाथोंमें अत्यन्त तीखे | शिवजीके जिस कवचको धारण किया था, शस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी आज्ञासे युद्ध | उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसे सुननेके लिये करनेके लिये आगे बढ़े। तब जो स्वयं मङ्गलस्वरूप | मुझे कौतूहल हो रहा है। तथा मङ्गलोंका आश्रयस्थान था, उस महाबली | नारायण बोले-विप्रवर ! महात्मा शंकरके मत्स्यराजने भी उन सबको युद्धोन्मुख देखकर | उस 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवचका, जो सर्वाङ्गकी युद्ध करना आरम्भ किया। उस राजेन्द्रने बाणोंका | रक्षा करनेवाला है, वर्णन करता हूँ; सुनो। जाल बिछाकर उन सभीको रोक दिया। तब | पूर्वकालमें दुर्वासाने बुद्धिमान् मत्स्यराजको सम्पूर्ण जमदग्निके पुत्रोंने उस बाण-समूहको छिन्न-भिन्न | पापोंका समूल नाश करनेवाला षडक्षर-मन्त्र कर दिया। मुने! राजाने सैकड़ों सूर्योंके समान | बतलाकर इसे प्रदान किया था। यदि सिद्धि प्राप्त प्रकाशमान दिव्यास्त्र चलाया; परंतु मुनियोंने | हो जाय तो इस कवचके शरीरपर स्थित रहते माहेश्वरास्त्रके द्वारा खेल-ही-खेलमें उसे काट दिया। | अस्त्र-शस्त्रके प्रहारके समय, जलमें तथा अग्निमें पुनः मुनियोंने दिव्यास्त्रद्वारा राजाके बाणसहित | प्राणियोंकी मृत्यु नहीं होती-इसमें संशय नहीं धनुष, रथ, सारथि और कवचकी धज्जियाँ उड़ा | है। जिसे पढ़कर एवं धारण करके दुर्वासा सिद्ध दीं। इस प्रकार राजाको शस्त्रहीन देखकर | होकर लोकपूजित हो गये, जिसके पढ़ने और मुनियोंको महान् हर्ष हुआ। तब उन्होंने मत्स्यराजका | धारण करनेसे जैगीषव्य महायोगी कहलाने लगे। वध करनेकी इच्छासे शिवजीका त्रिशूल हाथमें | जिसे धारण करके वामदेव, देवल, स्वयं च्यवन,

३१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अगस्त्य और पुलस्त्य विश्ववन्द्य हो गये। 'ॐ नमः शिवाय' यह सदा मेरे मस्तककी रक्षा करे। 'ॐ नमः शिवाय स्वाहा' यह सदा ललाटकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शिवाय स्वाहा' सदा नेत्रोंकी रक्षा करे। ॐ ह्रीं क्लीं हूं शिवाय नमः' मेरी नासिकाकी रक्षा करे। 'ॐ नमः शिवाय शान्ताय स्वाहा' सदा कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं हूं संहारकर्त्रे स्वाहा' सदा कानोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं पञ्चवक्त्राय स्वाहा' सदा दाँतकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं महेशाय स्वाहा' सदा मेरे ओठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं त्रिनेत्राय स्वाहा' सदा केशोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ऐं महादेवाय स्वाहा' सदा छातीकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं रुद्राय स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ऐं श्रीं ईश्वराय स्वाहा' सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा' सदा भौंहोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईशानाय स्वाहा' सदा पार्श्वभागकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ईश्वराय स्वाहा' सदा मेरे उदरकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा' सदा भुजाओंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईश्वराय स्वाहा' मेरे हाथोंकी रक्षा करे। 'ॐ महेश्वराय रुद्राय नमः' सदा मेरे नितम्बकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं भूतनाथाय स्वाहा' सदा पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ सर्वेश्वराय सर्वाय स्वाहा' सदा सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें 'भूतेश' मेरी रक्षा करें। अग्निकोणमें 'शंकर' रक्षा करें। दक्षिणमें 'रुद्र' तथा नैर्ऋत्यकोणमें स्थाणु मेरी रक्षा करें। पश्चिममें 'खण्डपरशु', वायव्यकोणमें 'चन्द्रशेखर', उत्तरमें 'गिरिश' और ईशानकोणमें स्वयं 'ईश्वर' रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'मृड' और अधोभागमें स्वयं 'मृत्युञ्जय' सदा रक्षा करें। जलमें, स्थलमें, आकाशमें, सोते समय अथवा जागते रहनेपर भक्तवत्सल 'पिनाकी' सदा मुझ भक्तकी स्नेहपूर्वक रक्षा करें।

वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे इस परम अद्भुत कवचका वर्णन कर दिया। इसके दस लाख जपसे ही सिद्धि हो जाती है, यह निश्चित है। यदि यह कवच सिद्ध हो जाय तो वह निश्चय ही रुद्र-तुल्य हो जाता है। वत्स! तुम्हारे स्नेहके कारण मैंने वर्णन कर दिया है, तुम्हें इसे किसीको नहीं बतलाना चाहिये; क्योंकि यह काण्वशाखोक्त कवच अत्यन्त गोपनीय तथा परम दुर्लभ है। सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों राजसूय—ये सभी इस कवचकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। इस कवचकी कृपासे मनुष्य निश्चय ही जीवन्मुक्त, सर्वज्ञ, सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्वामी और मनके समान वेगशाली हो जाता है। इस कवचको बिना जाने जो भगवान् शंकरका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।* (अध्याय ३५)


* नारायण उवाच—
कवचं शृणु विप्रेन्द्र शङ्करस्य महात्मनः। ब्रह्माण्डविजयं नाम सर्वावयवरक्षणम्॥
पुरा दुर्वाससा दत्तं मत्स्यराजाय धीमते। दत्त्वा षडक्षरं मन्त्रं सर्वपापप्रणाशनम्॥
स्थिते च कवचे देहे नास्ति मृत्युश्च जीविनाम्। अस्त्रे शस्त्रे जले वह्नौ सिद्धिश्चैत्रास्ति संशयः॥
यद् धृत्वा पठनात् सिद्धो दुर्वासा विश्वपूजितः॥
जैगीषव्यो महायोगी पठनाद् धारणाद् यतः। यद् धृत्वा वामदेवश्च देवलश्च्यवनः स्वयम्॥
अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च बभूव विश्वपूजितः॥
ॐ नमः शिवायति च मस्तकं मे सदाऽवतु। ॐ नमः शिवायति च स्वाहा भालं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शिवायति स्वाहा नेत्रे सदाऽवतु। ॐ ह्रीं क्लीं हूं शिवायति नमो मे पातु नासिकाम्॥
ॐ नमः शिवाय शान्ताय स्वाहा कण्ठं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं हूं संहारकर्त्रे स्वाहा कर्णौ सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं पञ्चवक्त्राय स्वाहा दन्तं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं महेशाय स्वाहा चाधरं पातु मे सदा॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं त्रिनेत्राय स्वाहा केशान् सदाऽवतु। ॐ ह्रीं ऐं महादेवाय स्वाहा वक्षः सदाऽवतु॥

३५- परशुरामद्वारा पुत्रसहित राजा सहस्राक्षका वध, कार्तवीर्य-परशुराम-युद्ध, परशुरामकी मूर्च्छा, शिवद्वारा उन्हें पुनर्जीवनदान, कार्तवीर्य-परशुराम-संवाद, आकाशवाणी सुनकर शिवका विप्रवेष धारण करके कार्तवीर्यसे कवच माँग लेना, परशुद्वारा कार्तवीर्य तथा अन्यान्य क्षत्रियोंका संहार, ब्रह्माका आगमन और परशुरामको गुरुस्वरूप शिवकी शरणमें जानेका उपदेश देकर स्वस्थानको लौट जाना

गणपतिखण्ड ३९३

मत्स्यराजके वधके पश्चात् अनेकों राजाओंका आना और परशुरामद्वारा मारा जाना, पुनः राजा सुचन्द्र और परशुरामका युद्ध, परशुरामद्वारा कालीस्तवन, ब्रह्माका आकर परशुरामको युक्ति बताना, परशुरामका राजा सुचन्द्रसे मन्त्र और कवच माँगकर उसका वध करना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! युद्धमें मत्स्यराजके गिर जानेपर महाराज कार्तवीर्यके भेजे हुए बृहद्वल, सोमदत्त, विदर्भ, मिथिलेश्वर, निषधराज, मगधाधिपति एवं कान्यकुब्ज, सौराष्ट्र, राढीय, वारेन्द्र, सौम्य वंगीय, महाराष्ट्र, गुर्जरजातीय और कलिंग आदिके सैकड़ों-सैकड़ों राजा बारह अक्षौहिणी सेनाके साथ आये; परंतु परशुरामजीने सबको रणभूमिमें सुला दिया। यह देखकर एक लाख नरपतियोंके साथ बारह अक्षौहिणी सेना लेकर राजा सुचन्द्र रणस्थलमें आये। सुचन्द्रके साथ भयानक युद्ध हुआ, पर वे परास्त न हो सके। तब परशुरामने देखा कि मुण्डमाला धारण किये हुए विकटानना भयंकरी जगज्जननी भद्रकाली उनकी रक्षा कर रही हैं। यह देखकर परशुरामने शस्त्रास्त्रका त्याग करके महामायाकी स्तुति आरम्भ की।

परशुराम बोले—आप शंकरजीकी प्रियतमा पत्नी हैं, आपको नमस्कार है। सारस्वरूपा आपको बारंबार प्रणाम है। दुर्गतिनाशिनीको मेरा अभिवादन है। मायारूपा आपको मैं बारंबार सिर झुकाता हूँ। जगद्धात्रीको नमस्कार-नमस्कार। जगत्कर्त्रीको पुनः-पुनः प्रणाम। जगज्जननीको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। कारणरूपा आपको बारंबार अभिवादन है। सृष्टिका संहार करनेवाली जगन्माता! प्रसन्न होइये। मैं आपके चरणोंकी शरण ग्रहण करता हूँ, मेरी प्रतिज्ञा सफल कीजिये। मेरे प्रति आपके विमुख हो जानेपर कौन मेरी रक्षा कर सकता है? भक्तवत्सले! शुभे! आप मुझ भक्तपर कृपा कीजिये। सुमुखि! पहले शिवलोकमें आपलोगोंने मुझे जो वरदान दिया था, उस वरको आपको सफल करना चाहिये।

परशुरामद्वारा किये गये इस स्तवनको सुनकर

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं रुद्राय स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं ऐं श्रीं ईश्वराय स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा भ्रूश्च सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईशानाय स्वाहा पार्श्वं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं ईश्वराय स्वाहा उदरं पातु मे सदा। ॐ श्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा बाहू सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईश्वराय स्वाहा पातु करौ मम। ॐ महेश्वराय रुद्राय नितम्बं पातु मे सदा॥
ॐ ह्रीं श्रीं भूतनाथाय स्वाहा पादौ सदाऽवतु। ॐ सर्वेश्वराय सर्व्वाय स्वाहा सर्वं सदाऽवतु॥
प्राच्यां मां पातु भूतेश आग्नेय्यां पातु शंकरः। दक्षिणे पातु मां रुद्रो नैर्ऋत्यां स्थाणुरेव च॥
पश्चिमे खण्डपरशुर्वायव्यां चन्द्रशेखरः। उत्तरे गिरिशः पातु ऐशान्यामीश्वरः स्वयम्॥
ऊर्ध्वे मृडः सदा पातु अधो मृत्युञ्जयः स्वयम्। जले स्थले चान्तरिक्षे स्वप्ने जागरणे सदा॥
पिनाकी पातु मां प्रीत्या भक्तं च भक्तवत्सलः॥
इति ते कथितं वत्स कवचं परमाद्भुतम्। दशलक्षजपेनैव सिद्धिर्भवति निश्चितम्॥
यदि स्यात् सिद्धकवचो रुद्रतुल्यो भवेद् ध्रुवम्। तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्॥
कवचं काण्वशाखोक्तमतिगोप्यं सुदुर्लभम्। अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च॥
सर्वाणि कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्। कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः॥
सर्वज्ञः सर्वसिद्धीशो मनोयायी भवेद् ध्रुवम्। इदं कवचमज्ञात्वा भजेद् यः शङ्करं प्रभुम्॥
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥

(३५।११४-११६, ११९-१३९)

३९४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अम्बिकाका मन प्रसन्न हो गया और 'भय मत करो' यों कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गयीं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह अनायास ही महान् भयसे छूट जाता है। वह त्रिलोकीमें पूजित, त्रैलोक्यविजयी, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और शत्रुपक्षका विमर्दन करनेवाला हो जाता है*। इसी बीच ब्रह्माजी धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भृगुवंशी परशुरामके पास आकर उनसे उस रहस्यका वर्णन करने लगे।

ब्रह्माजी बोले—महाभाग राम! अपनी प्रतिज्ञा सफल करनेके लिये पहले तुम सुचन्द्रकी विजयके हेतुभूत रहस्यका मुझसे श्रवण करो। पूर्वकालमें दुर्वासाने सुचन्द्रको दशाक्षरी महाविद्या तथा भद्रकालीका परम दुर्लभ कवच प्रदान किया था। भद्रकालीका कवच देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। वह कवच सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला, अत्यन्त पूजनीय, प्रशंसनीय और त्रिलोकीपर विजय पानेका कारण है। वह कवच जिसके गलेमें वर्तमान है, उसे जीतनेके लिये भूतलपर तुम कैसे समर्थ हो सकते हो? अतः भार्गव! तुम भिक्षाके लिये जाओ और राजासे प्रार्थना करो। सूर्यवंशमें उत्पन्न हुआ वह राजा परम धर्मात्मा एवं दानी है। माँगनेपर वह निश्चय ही प्राण, कवच, मन्त्र आदि सब कुछ दे डालेगा।

मुने! तब परशुराम संन्यासीका वेष धारण करके राजाके पास गये और उससे उन्होंने मन्त्र तथा परम अद्भुत कवचकी याचना की। तब राजाने अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें मन्त्र और कवच दे दिया। तदनन्तर परशुरामने शंकरजीके त्रिशूलसे उस राजाका काम तमाम कर दिया।

(अध्याय ३६)


दशाक्षरी महाविद्या तथा काली-कवचका वर्णन

नारदजीने कहा—सर्वज्ञ नाथ! अब मैं आपके मुखसे भद्रकाली-कवच तथा उस दशाक्षरी महाविद्याको सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायण बोले—नारद! मैं दशाक्षरी महाविद्या तथा तीनों लोकोंमें दुर्लभ उस गोपनीय कवचका वर्णन करता हूँ, सुनो। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा' यही दशाक्षरी महाविद्या है। इसे पुष्करतीर्थमें सूर्य-ग्रहणके अवसरपर दुर्वासाने राजाको दिया था। उस समय राजाने दस लाख जप करके मन्त्र सिद्ध किया और


* परशुराम उवाच—
नमः शङ्करकान्तायै सारायै ते नमो नमः। नमो दुर्गतिनाशिन्यै मायायै ते नमो नमः॥
नमो नमो जगद्धात्र्यै जगत्कर्त्र्यै नमो नमः। नमोऽस्तु ते जगन्मात्रे कारणायै नमो नमः॥
प्रसीद जगतां मातः सृष्टिसंहारकारिणि। त्वत्पादे शरणं यामि प्रतिज्ञां सार्थिकां कुरु॥
त्वयि मे विमुखायां च को मां रक्षितुमीश्वरः। त्वं प्रसन्ना भव शुभे मां भक्तं भक्तवत्सले॥
युष्माभिः शिवलोके च मह्यं दत्तो वरः पुरा। तं वरं सफलं कर्तुं त्वमर्हसि वरानने॥
जामदग्न्यस्तवं श्रुत्वा प्रसन्नाभवदम्बिका। मा भैरित्येवमुक्त्वा तु तत्रैवान्तरधीयत॥
एतद् भृगुकृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च यः पठेत्। महाभयात् समुत्तीर्णः स भवेदवलीलया॥
स पूजितश्च त्रैलोक्ये त्रैलोक्यविजयी भवेत्। ज्ञानिश्रेष्ठो भवेच्चैव वैरिपक्षविमर्दकः॥
(गणपतिखण्ड ३६। २९—३६)

गणपतिखण्ड ३९५

इस उत्तम कवचके पाँच लाख जपसे ही वे सिद्धकवच हो गये। तत्पश्चात् वे अयोध्यामें लौट आये और इसी कवचकी कृपासे उन्होंने सारी पृथ्वीको जीत लिया।

नारदजीने कहा—प्रभो! जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, उस दशाक्षरी महाविद्याको तो मैंने सुन लिया। अब मैं कवच सुनना चाहता हूँ, वह मुझसे वर्णन कीजिये।

श्रीनारायण बोले—विप्रेन्द्र! पूर्वकालमें त्रिपुर-वधके भयंकर अवसरपर शिवकी विजयके लिये नारायणने कृपा करके शिवको जो परम अद्भुत कवच प्रदान किया था, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। मुने! वह कवच अत्यन्त गोपनीयोसे भी गोपनीय, तत्त्वस्वरूप तथा सम्पूर्ण मन्त्रसमुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। उसीको पूर्वकालमें शिवजीने दुर्वासाको दिया था और दुर्वासाने महामनस्वी राजा सुचन्द्रको प्रदान किया था।

‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा’ मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘क्लीं’ कपालकी तथा ‘ह्रीं ह्रीं ह्रीं’ नेत्रोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा’ सदा मेरी नासिकाकी रक्षा करे। ‘क्रीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा’ सदा दाँतोंकी रक्षा करे। ‘ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा’ मेरे दोनों ओठोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा’ सदा कण्ठकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा दोनों कानोंकी रक्षा करें। ‘ॐ क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा’ सदा मेरे कंधोंकी रक्षा करे। ‘ॐ क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा’ सदा मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। ‘ॐ क्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा मेरी नाभिकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करे। ‘रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा’ सदा हाथोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा’ सदा पैरोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा’ सदा मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें ‘महाकाली’ और अग्निकोणमें ‘रक्तदन्तिका’ रक्षा करें। दक्षिणमें चामुण्डा रक्षा करें। नैर्ऋत्यकोणमें ‘कालिका’ रक्षा करें। पश्चिममें ‘श्यामा’ रक्षा करें। वायव्यकोणमें ‘चण्डिका’, उत्तरमें ‘विकटास्या’ और ईशानकोणमें ‘अट्टहासिनी’ रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें ‘लोलजिह्वा’ रक्षा करें। अधोभागमें सदा ‘आद्यामाया’ रक्षा करें। जल, स्थल और अन्तरिक्षमें सदा ‘विश्वप्रसू’ रक्षा करें।

वत्स! यह कवच समस्त मन्त्रसमूहका मूर्तरूप, सम्पूर्ण कवचोंका सारभूत और उत्कृष्टसे भी उत्कृष्टतर है; इसे मैंने तुम्हें बतला दिया। इसी कवचकी कृपासे राजा सुचन्द्र सातों द्वीपोंके अधिपति हो गये थे। इसी कवचके प्रभावसे पृथ्वीपति मान्धाता सप्तद्वीपवती पृथ्वीके अधिपति हुए थे। इसीके बलसे प्रचेता और लोमश सिद्ध हुए थे तथा इसीके बलसे सौभरि और पिप्पलायन योगियोंमें श्रेष्ठ कहलाये। जिसे यह कवच सिद्ध हो जाता है, वह समस्त सिद्धियोंका स्वामी बन जाता है। सभी महादान, तपस्या और व्रत इस कवचकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते, यह निश्चित है। जो इस कवचको जाने बिना जगज्जननी कालीका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी यह मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।

(अध्याय ३७)

३६- परशुरामका कैलास-गमन, वहाँ शिव-भवनमें पार्षदोंसहित गणेशको प्रणाम करके आगे बढ़नेको उद्यत होना, गणेशद्वारा रोके जानेपर उनके साथ वार्तालाप

३९६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सुचन्द्र-पुत्र पुष्कराक्षके साथ परशुरामका युद्ध, पाशुपतास्त्र छोड़नेके लिये उद्यत परशुरामके पास विष्णुका आना और उन्हें समझाना, विष्णुका विप्रवेषसे पुत्रसहित पुष्कराक्षसे लक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको माँग लेना, लक्ष्मीकवचका वर्णन

श्रीनारायण कहते हैं—ब्रह्मन्! रणक्षेत्रमें राजाधिराजोंके शिरोमणि सुचन्द्रके गिर जानेपर तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ पुष्कराक्ष आ धमका। महान् पराक्रमी राजा पुष्कराक्ष सूर्यवंशमें उत्पन्न, महालक्ष्मीका सेवक, लक्ष्मीवान् और सूर्यके समान प्रभावशाली था। वह सुचन्द्रका पुत्र था। उसके गलेमें महालक्ष्मीका मनोहर कवच बँधा था, जिसके प्रभावसे वह परमैश्वर्यसम्पन्न और त्रिलोकविजयी हो गया था। उसे देखकर बुद्धिमान् परशुरामके सभी भाई हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र धारण करके युद्ध करनेके लिये आ डटे। राजाने लीलापूर्वक बाणसमूहकी वर्षा करके उन्हें छेद डाला। तब उन वीरोंने भी हँसते-हँसते उन बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर तो पुष्कराक्षके साथ घोर युद्ध आरम्भ हुआ। परशुरामने पाशुपतास्त्रके सिवा सभी अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग किया, पर पुष्कराक्षने सबको काट गिराया। तब अपने समस्त शस्त्रास्त्रोंको विफल देखकर परशुरामने स्नान करके शिवजीको प्रणाम किया और पाशुपतास्त्रका प्रयोग करना चाहा; इतनेमें भगवान् नारायण ब्राह्मणका वेष धारण करके वहाँ प्रकट हो गये और बोले।

[ ब्राह्मणवेषधारी ] नारायणने कहा—वत्स भार्गव! यह क्या कर रहे हो? तुम तो ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो; फिर भ्रमवश क्रोधावेशमें आकर मनुष्यका वध करनेके लिये पाशुपतका प्रयोग क्यों कर रहे हो? इस पाशुपतसे तो तत्काल ही सारा विश्व भस्म हो सकता है; क्योंकि यह शस्त्र परमेश्वर श्रीकृष्णके अतिरिक्त और सबका विनाशक है। अहो! पाशुपतको जीतनेकी शक्ति तो सुदर्शनमें ही है; क्योंकि श्रीहरिका सुदर्शनचक्र समस्त अस्त्रोंका मान मर्दन करनेवाला है। शिवजीका पाशुपतास्त्र और श्रीहरिका सुदर्शनचक्र—ये ही दोनों तीनों लोकोंमें समस्त अस्त्रोंमें प्रधान हैं। इसलिये ब्रह्मन्! तुम पाशुपतास्त्रको रख दो और मेरी बात सुनो। इस समय तुम जिस प्रकार महाबली राजा पुष्कराक्षको जीत सकोगे तथा जिस प्रकार अजेय कार्तवीर्यपर विजय पा सकोगे, वह सारा उपाय तुम्हें बतलाता हूँ; सावधानतया श्रवण करो। महालक्ष्मीका कवच, जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, पुष्कराक्षने भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ अपने गलेमें धारण कर रखा है और पुष्कराक्षका पुत्र दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका परम अद्भुत एवं उत्तम कवच अपनी दाहिनी भुजापर बाँधे हुए है। इन कवचोंकी कृपासे वे दोनों विश्वपर विजय पा लेनेमें समर्थ हैं। उनके शरीरपर कवचोंके वर्तमान रहते त्रिभुवनमें उन्हें कौन जीत सकता है। मुने! मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा सफल करनेके निमित्त उन दोनोंके संनिकट माँगनेके लिये जाऊँगा और उनसे कवचकी याचना करूँगा। ब्राह्मणकी बात सुनकर परशुरामका मन भयभीत हो गया, तब वे दुःखी हृदयसे उस वृद्ध ब्राह्मणसे बोले।

परशुरामने कहा—‘महाप्राज्ञ! ब्राह्मणरूपधारी आप कौन हैं, मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ; अतः मुझ अनजानको शीघ्र ही अपना परिचय दीजिये, तत्पश्चात् राजाके पास जाइये।’ परशुरामका वचन सुनकर ब्राह्मणको हँसी आ गयी, वे ‘मैं विष्णु हूँ’ यों कहकर राजाके पास याचना करनेके लिये चले गये। उन दोनोंके संनिकट जाकर विष्णुने उनसे कवचकी याचना की। तब विष्णुकी

गणपतिखण्ड ३९७

मायासे मोहित होकर उन्होंने विष्णुको दोनों कवच दान कर दिये। भगवान् विष्णु उन कवचोंको लेकर वैकुण्ठको चले गये। नारदजीने पूछा—महामुने! भूपाल पुष्कराक्षको महालक्ष्मीका कवच किसने दिया था? तथा पुष्कराक्षके पुत्रको दुर्गाका दुर्लभ कवच किसने बताया था? आप इसे बतलानेकी कृपा करें; क्योंकि इसे सुननेकी मेरी प्रबल उत्कण्ठा है। जगद्गुरो! साथ ही मुझे यह भी बताइये कि उन दोनोंके कवच कैसे थे, उनका क्या फल है और वे दोनों मन्त्र किस तरहके थे? श्रीनारायणने कहा—नारद! बुद्धिमान् पुष्कराक्षको महालक्ष्मीका कवच और दशाक्षर- मन्त्र सनत्कुमारने दिया था। उन्होंने ही गोपनीय स्तोत्र, उसका चरित, पूजाकी विधि और सामवेदोक्त मनोहर ध्यान भी बतलाया था। दुर्गाका कवच, गुह्य स्तोत्र और दशाक्षर-मन्त्र पूर्वकालमें दुर्वासाने पुष्कराक्ष-पुत्रको प्रदान किया था। इसके पश्चात् देवीके उस परम अद्भुत सम्पूर्ण चरितको सुनोगे, जिसे उन्होंने महायुद्धके आरम्भमें प्रार्थना करनेपर बतलाया था। अब मैं तुम्हें महालक्ष्मीका मन्त्र बतलाता हूँ; उसे श्रवण करो। ‘ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा' यही वह परम अद्भुत मन्त्र है। मुने! सनत्कुमारने बुद्धिमान् पुष्कराक्षको जो पूजाविधि और सामवेदोक्त ध्यान बतलाया था, उसे सुनो। सहस्रदलकमल जिनका आसन है, जो भगवान् पद्मनाभकी सती-साध्वी प्रियतमा हैं, कमल जिनका घर है, जिनका मुख कमलके सदृश और नेत्र कमलपत्रकी-सी आभावाले हैं, कमलका फूल जिन्हें अधिक प्रिय है, जो कमल-पुष्पकी शय्यापर शयन करती हैं, जिनके हाथमें कमल शोभा पाता है, जो कमल-पुष्पोंकी मालासे विभूषित हैं, कमलोंके आभूषण जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जो स्वयं कमलोंकी शोभाकी वृद्धि करनेवाली हैं और मुस्कराती हुई जो कमल-वनकी ओर निहार रही हैं; उन पद्मिनी देवीका मैं आनन्दपूर्वक भजन करता हूँ। साधकको चाहिये कि चन्दनका अष्टदल- कमल बनाकर उसपर कमल-पुष्पोंद्वारा महालक्ष्मीकी पूजा करे। फिर 'गण'का भलीभाँति पूजन करके उन्हें षोडशोपचार समर्पित करे। तदनन्तर स्तुति करके भक्तिपूर्वक उनके सामने सिर झुकावे। ब्रह्मन् ! अब सबका साररूप कवच तुम्हें बतलाता हूँ; सुनो। श्रीनारायण आगे कहते हैं—विप्रवर! भगवान् पद्मनाभने अपने नाभिकमलपर स्थित ब्रह्माको लक्ष्मीका जो परम शुभकारक कवच प्रदान किया था, उसे सुनो। उस कवचको पाकर ब्रह्माने कमलपर बैठे-बैठे जगत्की सृष्टि की और महालक्ष्मीकी कृपासे वे लक्ष्मीवान् हो गये। फिर पद्मालयासे वरदान प्राप्त करके ब्रह्मा लोकोंके अधीश्वर हो गये। उन्हीं ब्रह्माने पद्मकल्पमें अपने प्रिय पुत्र बुद्धिमान् सनत्कुमारको यह परम अद्भुत कवच दिया था। नारद! सनत्कुमारने वह कवच पुष्कराक्षको प्रदान किया था, जिसके पढ़ने एवं धारण करनेसे ब्रह्मा समस्त सिद्धोंके स्वामी, महान् परमैश्वर्यसे सम्पन्न और सम्पूर्ण सम्पदाओंसे युक्त हो गये। सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता इस कवचके प्रजापति ऋषि हैं, बृहती छन्द है, स्वयं पद्मालया देवी हैं और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षमें इसका विनियोग किया जाता है। यह परम अद्भुत कवच महापुरुषोंके पुण्यका कारण है। ‘ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘श्रीं' मेरे कपालकी और ‘श्रीं श्रियै नमः' नेत्रोंकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं श्रियै स्वाहा' सदा दोनों कानोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मै स्वाहा' मेरी नासिकाकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा'

३७- परशुरामका शिवके अन्तःपुरमें जानेके लिये गणेशसे अनुरोध, गणेशका उन्हें समझाना, न माननेपर उन्हें स्तम्भित करके अपनी सूँड़में लपेटकर सभी लोकोंमें घुमाते हुए गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन कराकर भूतलपर छोड़ देना, होशमें आनेपर परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना, गणेशका एक दाँत टूट जाना, देवलोकमें हाहाकार, पार्वतीका रुदन और शिवसे प्रार्थना

३९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सदा दाँतोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं कृष्णप्रियायै स्वाहा' सदा दाँतोंके छिद्रोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं नारायणेशायै स्वाहा' सदा मेरे कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं केशवकान्तायै स्वाहा' सदा मेरे कंधोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं पद्मानिवासिन्यै स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रे स्वाहा' सदा मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं श्रीं कृष्णकान्तायै स्वाहा' सदा पीठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा' सदा मेरे हाथोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं निवासकान्तायै स्वाहा' सदा मेरे पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा' मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्व दिशामें 'महालक्ष्मी' और अग्निकोणमें 'कमलालया' मेरी रक्षा करें। दक्षिणमें 'पद्मा' और नैर्ऋत्यकोणमें 'श्रीहरिप्रिया' मेरी रक्षा करें। पश्चिममें 'पद्मालया' और वायव्यकोणमें स्वयं 'श्री' मेरी रक्षा करें। उत्तरमें 'कमला' और ईशानकोणमें 'सिन्धुकन्या' रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'नारायणेशी' रक्षा करें। अधोभागमें 'विष्णुप्रिया' रक्षा करें। 'विष्णुप्राणाधिका' सदा सब ओरसे मेरी रक्षा करें।

वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे इस सर्वैश्वर्यप्रद नामक परम अद्भुत कवचका वर्णन कर दिया। यह समस्त मन्त्रसमुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। धर्मात्मा पुरुष ब्राह्मणको मेरुके समान सुवर्णका पहाड़ दान करके जो फल पाता है, उससे कहीं अधिक फल इस कवचसे मिलता है। जो मनुष्य विधिवत् गुरुकी अर्चना करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह प्रत्येक जन्ममें श्रीसम्पन्न होता है और उसके घरमें लक्ष्मी सौ पीढ़ियोंतक निश्चलरूपसे निवास करती हैं। वह देवेन्द्रों तथा राक्षसराजोंद्वारा निश्चय ही अवध्य हो जाता है। जिसके गलेमें यह कवच विद्यमान रहता है, उस बुद्धिमान्‌ने सभी प्रकारके पुण्य कर लिये, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली और समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया। लोभ, मोह और भयसे भी इसे जिस-किसीको नहीं देना चाहिये; अपितु शरणागत एवं गुरुभक्त शिष्यके सामने ही प्रकट करना चाहिये। इस कवचका ज्ञान प्राप्त किये बिना जो जगज्जननी लक्ष्मीका जप करता है, उसके लिये करोड़ोंकी संख्यामें जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।*

(अध्याय ३८)


* नारायण उवाच

सर्वसम्पत्प्रदस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्च्छन्दश्च बृहती देवी पद्मालया स्वयम्॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः। पुण्यबीजं च महतां कवचं परमाद्भुतम्॥
ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम्। श्रीं मे पातु कपालं च लोचने श्रीं श्रियै नमः॥
ॐ श्रीं श्रियै स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मे पातु नासिकाम्॥
ॐ श्रीं पद्मालयायै च स्वाहा दन्तं सदाऽवतु। ॐ श्रीं कृष्णप्रियायै च दन्तरन्ध्रं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं नारायणेशायै मम कण्ठं सदाऽवतु। ॐ श्रीं केशवकान्तायै मम स्कन्धं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं पद्मानिवासिन्यै स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रे मम वक्षः सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं श्रीं कृष्णकान्तायै स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा मम हस्तौ सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं निवासकान्तायै मम पादौ सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥
प्राच्यां पातु महालक्ष्मीराग्नेय्यां कमलालया। पद्मा मां दक्षिणे पातु नैर्ऋत्यां श्रीहरिप्रिया॥
पद्मालया पश्चिमे मां वायव्यां पातु श्रीः स्वयम्। उत्तरे कमला पातु ऐशान्यां सिन्धुकन्या॥
नारायणेशी पातूर्ध्वमधो विष्णुप्रियाऽवतु। सततं सर्वतः पातु विष्णुप्राणाधिका मम॥

५८- परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना और उनका एक दाँत टूट जाना

गणपतिखण्ड३९९

दुर्गाकवचका वर्णन

नारदजीने कहा—प्रभो! महालक्ष्मीके मनोहर कवचका वर्णन तो आपने कर दिया। ब्रह्मन्! अब दुर्गतिनाशिनी दुर्गाके उस उत्तम कवचको बतलाइये, जो पद्माक्षके प्राणतुल्य, जीवनदाता, बलका हेतु, कवचोंका सार-तत्त्व और दुर्गाकी सेवाका मूल कारण है।

श्रीनारायण बोले—नारद! प्राचीन कालमें श्रीकृष्णने गोलोकमें ब्रह्माको दुर्गाका जो शुभप्रद कवच दिया था, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। पूर्वकालमें त्रिपुर-संग्रामके अवसरपर ब्रह्माजीने इसे शंकरको दिया, जिसे भक्तिपूर्वक धारण करके रुद्रने त्रिपुरका संहार किया था। फिर शंकरने इसे गौतमको और गौतमने पद्माक्षको दिया, जिसके प्रभावसे विजयी पद्माक्ष सातों द्वीपोंका अधिपति हो गया। जिसके पढ़ने एवं धारण करनेसे ब्रह्मा भूतलपर ज्ञानवान् और शक्तिसम्पन्न हो गये। जिसके प्रभावसे शिव सर्वज्ञ और योगियोंके गुरु हुए और मुनिश्रेष्ठ गौतम शिव-तुल्य माने गये। इस 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवचके प्रजापति ऋषि हैं। गायत्री छन्द है। दुर्गतिनाशिनी दुर्गा देवी हैं और ब्रह्माण्डविजयके लिये इसका विनियोग किया जाता है। यह परम अद्भुत कवच महापुरुषोंका पुण्यतीर्थ है।

'ॐ ह्रीं दुर्गतिनाशिन्यै स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं' मेरे कपालकी और 'ॐ ह्रीं श्रीं' नेत्रोंकी रक्षा करे। 'ॐ दुर्गायै नमः' सदा मेरे दोनों कानोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं' सदा सब ओरसे मेरी नासिकाकी रक्षा करे। 'ह्रीं श्रीं हूं' दाँतोंकी और 'क्लीं' दोनों ओष्ठोंकी रक्षा करे। 'क्रीं क्रीं क्रीं' कण्ठकी रक्षा करे। 'दुर्गे' कपोलोंकी रक्षा करे। 'दुर्गविनाशिन्यै स्वाहा' निरन्तर कंधोंकी रक्षा करे। 'विपद्विनाशिन्यै स्वाहा' सब ओरसे मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'दुर्गे दुर्गे रक्षणीति स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'दुर्गे दुर्गे रक्ष रक्ष' सब ओरसे मेरी पीठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा' सदा हाथ-पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा' सदा मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें 'महामाया' रक्षा करे। अग्निकोणमें 'कालिका', दक्षिणमें 'दक्षकन्या' और नैर्ऋत्यकोणमें 'शिवसुन्दरी' रक्षा करे। पश्चिममें 'पार्वती', वायव्यकोणमें 'वाराही', उत्तरमें 'कुबेरमाता' और ईशानकोणमें 'ईश्वरी' सदा-सर्वदा रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'नारायणी' रक्षा करें और अधोभागमें सदा 'अम्बिका' रक्षा करें। जाग्रत्कालमें 'ज्ञानप्रदा' रक्षा करें और सोते समय 'निद्रा' सदा रक्षा करें।


इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
सुवर्णपर्वतं दत्त्वा मेरुतुल्यं द्विजातये। यत् फलं लभते धर्मो कवचेन ततोऽधिकम्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ स श्रीमान् प्रतिजन्मनि॥
अस्ति लक्ष्मीर्गृहे तस्य निश्चला शतपूरुषम्। देवेन्द्रैश्चासुरेन्द्रैश्च सोऽवध्यो निश्चितं भवेत्॥
स सर्वपुण्यवान् धीमान् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः। स स्नातः सर्वतीर्थेषु यस्येदं कवचं गले॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं लोभमोहभयैरपि। गुरुभक्ताय शिष्याय शरणाय प्रकाशयेत्॥
इदं कवचमज्ञात्वा जपेल्लक्ष्मीं जगत्प्रसूम्। कोटिसंख्यप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥
(गणपतिखण्ड ३८।६४-८२)