भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण राजाको युद्धके लिये उद्यत देख मनोरमाका योगद्वारा शरीर-त्याग, राजाका विलाप और आकाशवाणी सुनकर उसकी अन्त्येष्टि-क्रिया करना, युद्धयात्राके समय नाना प्रकारके अपशकुन देखना, कार्तवीर्य और परशुरामका युद्ध तथा कार्तवीर्यका वध, नारायणद्वारा शिव-कवचका वर्णन नारायण कहते हैं— मुने ! मनोरमाने अपने स्वामीके मुखसे भविष्यकी जो-जो बातें सुनीं, उन्हें मनमें धारण कर लिया और यह समझ लिया कि ये बातें अवश्य सत्य होंगी; अतः उसने उसी क्षण अपने प्राणनाथको अपनी छातीसे लगा लिया और पुत्रों, बान्धवों तथा अपने भृत्योंको आगे करके वह भगवच्चरणोंका ध्यान करने लगी। फिर उसने योगद्वारा षट्चक्रका भेदन करके वायुको मूर्धामें स्थापित किया और चञ्चल मनको जलके बुलबुलेके सदृश क्षणभङ्गुर विषयोंसे खींचकर, ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित सहस्रदलसंयुक्त कमलपर स्थापित करके उसे ज्ञानद्वारा निष्कल ब्रह्ममें बाँध दिया। तत्पश्चात् निर्मूल एवं पुनर्जन्मरहित द्विविध कर्मका परित्याग करके उसने वहीं प्राण त्याग दिये; परंतु प्राणोंसे अधिक प्रिय राजाको नहीं छोड़ा। तदनन्तर राजा विविध भाँतिसे करुण विलाप करके फूट-फूटकर रोने लगे। राजाके विलापको सुनकर इस प्रकार आकाशवाणी हुई—'महाराज ! शान्त हो जाओ, क्यों रो रहे हो? तुम तो दत्तात्रेयकी कृपासे बड़े-बड़े ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो; अतः सारे संसारको, जो रमणीय दीख रहा है, जलके बुलबुलेके सदृश क्षणभङ्गुर समझो। वह साध्वी मनोरमा तो लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न हुई थी, अतः वह लक्ष्मीके वासस्थानको चली गयी। अब तुम भी रणभूमिमें युद्ध करके वैकुण्ठमें जाओ।' आकाशवाणीके इस वचनको सुनकर नरेशने शोकका परित्याग कर दिया। तत्पश्चात् चन्दनकी लकड़ीसे दिव्य चिता तैयार की और पुत्रद्वारा अग्निसंस्कार कराकर उसका दाह कराया। फिर मनोरमाके पुण्यके निमित्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, भाँति-भाँतिके वस्त्र और अनेक तरहके अन्यान्य दान दिये। मुने ! उस अवसरपर कार्तवीर्यके आश्रममें सर्वत्र निरन्तर यही शब्द होता था कि 'दान दो, दान दो और खाओ, खाओ'। उस समय राजाद्वारा अधिकृत कोषोंमें जो-जो धन मौजूद था, उसे उसने मनोरमाके पुण्यके निमित्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको दान कर दिया। तदनन्तर असंख्य बाजों तथा सैन्यसमूहोंको साथ लेकर राजा दुःखी हृदयसे समरभूमिके लिये प्रस्थित हुआ। आगे बढ़नेपर यद्यपि राजाको प्रत्येक मार्गमें अमङ्गलके ही दर्शन हुए तथापि वह रणक्षेत्रकी ओर ही बढ़ता गया; पुनः राजधानीको नहीं लौटा। राजाको मार्गमें एक नग्न स्त्री मिली, जिसके बाल बिखरे थे, नाक कटी थी और वह रो रही थी। दूसरी विधवा भी मिली, जो काला वस्त्र पहने थी। आगे मुखदुष्टा, योनिदुष्टा, रोगिणी, कुट्टनी, पति- पुत्रसे विहीन, डाकिनी, कुलटा, कुम्हार, तेली, व्याघ्र, सर्पद्वारा जीविका चलानेवाला (सँपेरा), कुत्सित वस्त्र, अत्यन्त रूखा शरीर, नंगा, काषाय- वस्त्रधारी, चरबी बेचनेवाला, कन्या-विक्रयी, चितामें जलता हुआ शव, बुझे हुए अङ्गारोंवाली राख, सर्पसे डँसा हुआ मनुष्य, साँप, गोह, खरगोश, विष, श्राद्धके लिये पकाया हुआ पाक, पिण्ड, मोटक, तिल, देवमूर्तियोंपर चढ़े हुए धनसे जीवन-निर्वाह करनेवाला ब्राह्मण, वृषवाह (बैलपर सवारी करनेवाला अथवा बैलको जोतनेवाला), शूद्रके श्राद्धान्नका भोजी, शूद्रका रसोइया, शूद्रका पुरोहित, गाँवका पुरोहित, कुशकी पुत्तलिका, मुर्दा जलानेवाला, खाली घड़ा, फूटा घड़ा, तेल, नमक,