ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें···· गणपतिखण्ड ३८७
पृथ्वीको भूपालोंसे शून्य कर दूँगा, उनके साथ आप युद्ध न छेड़िये। पापी रावणको जीतकर जो आप अपनेको शूरवीर मानते हैं, (यह आपका भ्रम है; क्योंकि) उसे आपने नहीं जीता है, बल्कि वह अपने पापसे पराजित हुआ है; क्योंकि जो धर्मकी रक्षा नहीं करता, उसका भूतलपर कौन रक्षक हो सकता है? वह मूर्ख स्वयं नष्ट हो जाता है और वह जीते हुए भी मृतकके समान है। जो धर्मके तथा शुभाशुभ कर्मके साक्षी और आत्माराम हैं, वे निरन्तर अपने अंदर वर्तमान हैं; परंतु आपकी बुद्धि मोहाच्छन्न हो गयी है; अतः आप उन्हें नहीं देखते हैं। नरेश! उत्तम धर्मात्माओंके जो-जो स्त्री-पुत्र आदि तथा समस्त ऐश्वर्यकी वस्तुएँ हैं, वे सभी जलके बुलबुलेके सदृश अनित्य और विनाशशील हैं। इसीलिये इस भारतमें संतलोग संसारको स्वप्न-सदृश मानकर निरन्तर धर्मका ध्यान करते हैं और भक्तिपूर्वक तपस्यामें रत रहते हैं। राजन्! मालूम होता है, दत्तात्रेयजीने जो ज्ञान दिया था, वह सब आप भूल गये। यदि है तो फिर आपका मन ब्राह्मणकी हत्या करनेमें कैसे प्रवृत्त हुआ? आप तो मनोविनोदके लिये शिकार खेलने गये थे। वहाँ ब्राह्मणके आश्रममें ठहरकर आपने अपूर्व मिष्टान्नका भोजन किया और व्यर्थ ही ब्राह्मणको मार डाला। जो गुरु, ब्राह्मण और देवताका अपमान करता है, उसके इष्टदेव उसपर रुष्ट हो जाते हैं और विपत्ति उसे आ घेरती है। अतः राजेन्द्र! आप दत्तात्रेयजीके चरणकमलोंका स्मरण कीजिये; क्योंकि गुरु-भक्ति सबके सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाश करनेवाली है। अब आप गुरुदेवकी भलीभाँति अर्चना करके उन भृगुनन्दनकी शरण ग्रहण कीजिये। परम बुद्धिमान् राजा कार्तवीर्यने मनोरमाकी बात सुनकर उसे समझाया और पुनः रानीको उत्तर दिया।
कार्तवीर्यार्जुनने कहा— कान्ते! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया। अब मैं जो कहता हूँ, उसे श्रवण करो। शोकपीड़ित लोगोंके वचन सभाओंमें प्रशंसनीय नहीं माने जाते। सुन्दरी! कर्मभोगके योग्य काल आनेपर सुख, दुःख, भय, शोक, कलह और प्रेम—ये सभी होते रहते हैं; क्योंकि काल राज्य देता है; काल मृत्यु और पुनर्जन्मका कारण होता है, काल संसारकी सृष्टि करता है, काल ही पुनः उसका संहार करता है और काल ही पालन करता है। काल भगवान् जनार्दनका स्वरूप है; परंतु श्रीकृष्ण उस कालके भी काल और विधाताके भी ब्रह्मा हैं। सृष्टिका आविर्भाव और तिरोधान उन्हींकी आज्ञासे होता है। मनुष्यके सारे कार्य उन्हींकी आज्ञासे होते हैं, अपनी इच्छासे कुछ भी नहीं होता। महाबली भगवान् परशुराम नारायणके अंश हैं। यदि उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं इक्कीस बार पृथ्वीको राजाओंसे शून्य कर दूँगा तो उनकी वह प्रतिज्ञा कभी विफल नहीं हो सकती। सुव्रते! साथ ही मैं यह निश्चित रूपसे जानता हूँ कि मैं उनका वध्य हूँ। तब भला, भविष्यकी सारी बातें जानकर भी मैं उनकी शरणमें कैसे जा सकता हूँ? क्योंकि प्रतिष्ठित पुरुषोंकी अपकीर्ति मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायिनी होती है। इतना कहकर सम्राट् कार्तवीर्यने समरभूमिमें जानेके लिये उद्यत हो बाजा बजवाया और माङ्गलिक कार्य सम्पन्न करवाये। वह असंख्य राजाओंको, तीन लाख राजाधिराजोंको, महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न एक सौ अक्षौहिणी सेनाओंको तथा असंख्यों घोड़े, हाथी, पैदल सिपाही और रथोंको साथ लेकर रण-यात्राके लिये तैयार हुआ। उसे कवच और बाणसहित अक्षय धनुष धारण करके यात्राके लिये समुत्सुक देख साध्वी मनोरमा स्तब्ध हो गयी।
(अध्याय ३४)