भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४००संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वत्स! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवच बतला दिया। यह परम अद्भुत तथा सम्पूर्ण मन्त्र-समुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। समस्त तीर्थोंमें भलीभाँति गोता लगानेसे, सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे तथा सभी प्रकारके व्रतोपवास करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल मनुष्य इस कवचके धारण करनेसे पा लेता है। जो विधिपूर्वक वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे गुरुकी पूजा करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह सम्पूर्ण शत्रुओंका मर्दन करनेवाला तथा त्रिलोकविजयी होता है। जो इस कवचको न जानकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता। नारद! यह काण्वशाखोक्त सुन्दर कवच, जिसका मैंने वर्णन किया है, परम गोपनीय तथा अत्यन्त दुर्लभ है। इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये।* (अध्याय ३९)


* नारायण उवाच —

श्रृणु नारद वक्ष्यामि दुर्गायाः कवचं शुभम्। श्रीकृष्णैनैव यद्दत्तं गोलोके ब्रह्मणे पुरा॥
ब्रह्मा त्रिपुरसंग्रामे शङ्कराय ददौ पुरा। जघान त्रिपुरं रुद्रो यद् धृत्वा भक्तिपूर्वकम्॥
हरो ददौ गौतमाय पद्माक्षाय च गौतमः। यतो बभूव पद्माक्षः सप्तद्वीपेश्वरो जयी॥
यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मा ज्ञानवान् शक्तिमान् भुवि। शिवो बभूव सर्वज्ञो योगिनां च गुरुर्यतः।
शिवतुल्यो गौतमश्च बभूव मुनिसत्तमः॥
ब्रह्माण्डविजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्चन्दश्च गायत्री देवी दुर्गतिनाशिनी॥
ब्रह्माण्डविजये चैव विनियोगः प्रकीर्तितः। पुण्यतीर्थं च महतां कवचं परमाद्भुतम्॥
ॐ ह्रीं दुर्गतिनाशिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम्। ॐ ह्रीं मे पातु कपालं च ॐ ह्रीं श्रीमिति लोचने॥
पातु मे कर्णयुग्मं च ॐ दुर्गायै नमः सदा। ॐ ह्रीं श्रीमिति नासां मे सदा पातु च सर्वतः॥
ह्रीं श्रीं ह्रीमिति दन्तानि पातु क्लीमोष्ठयुग्मकम्। क्रीं क्रीं क्रीं पातु कण्ठं च दुर्गे रक्षतु गण्डकम्॥
स्कन्धं दुर्गविनाशिन्यै स्वाहा पातु निरन्तरम्। वक्षो विपद्विनाशिन्यै स्वाहा मे पातु सर्वतः॥
दुर्गे दुर्गे रक्षणीति स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। दुर्गे दुर्गे रक्ष रक्ष पृष्ठं मे पातु सर्वतः॥
ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा च हस्तौ पादौ सदाऽवतु। ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा च सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥
प्राच्यां पातु महामाया आग्नेय्यां पातु कालिका। दक्षिणे दक्षकन्या च नैर्ऋत्यां शिवसुन्दरी॥
पश्चिमे पार्वती पातु वाराही वारुणे सदा। कुबेरमाता कौबेर्यामैशान्यामीश्वरी सदा॥
ऊर्ध्वे नारायणी पातु अम्बिकाधः सदाऽवतु। ज्ञाने ज्ञानप्रदा पातु स्वप्ने निद्रा सदाऽवतु॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। ब्रह्माण्डविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
सुस्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत् फलम्। सर्वव्रतोपवासे च तत् फलं लभते नरः॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद् वस्त्रालंकारचन्दनैः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ कवचं धारयेत्तु यः॥
स च त्रैलोक्यविजयी सर्वशत्रुप्रमर्दकः। इदं कवचमज्ञात्वा भजेद् दुर्गतिनाशिनीम्॥
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥
कवचं काण्वशाखोक्तमुक्तं नारद सुन्दरम्। यस्मै कस्मै न दातव्यं गोपनीयं सुदुर्लभम्॥
(गणपतिखण्ड ३९। ३—२३)