ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४२५
हैं। कहीं रत्नोंके, कहीं कौस्तुभमणिके और कहीं अनिर्वचनीय मणियोंके उत्तम आकर हैं। विरजाके उस तट-प्रान्तमें कहीं-कहीं उत्तम रमणीय विहारस्थल उपलब्ध होते हैं।
उस परम आश्चर्यजनक तटको देखकर वे देवेश्वर नदीके उस पार गये। वहाँ जानेपर उन्हें पर्वतोंमें श्रेष्ठ शतशृंग दिखायी दिया, जो अपनी शोभासे मनको मोहे लेता था। दिव्य पारिजात-वृक्षोंकी वनमालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। वह पर्वत कल्पवृक्षों तथा कामधेनुओंद्धारा सब ओरसे घिरा था। उसकी ऊँचाई एक करोड़ योजन थी और लंबाई दस करोड़ योजन। उसके ऊपरकी चौरस भूमि पचास करोड़ योजन विस्तृत थी। वह पर्वत चहारदीवारीकी भाँति गोलोकके चारों ओर फैला हुआ था। उसीके शिखरपर उत्तम गोलाकार रासमण्डल है, जिसका विस्तार दस योजन है। वह रासमण्डल सुगन्धित पुष्पोंसे भरे हुए सहस्रों उद्यानोंसे सुशोभित है और उन उद्यानोंमें भ्रमर-समूह छाये रहते हैं। सुन्दर रत्नों और द्रव्योंसे सम्पन्न अगणित क्रीडाभवन तथा कोटि सहस्र रत्नमण्डप उसकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्नमयी सीढ़ियों, श्रेष्ठ रत्ननिर्मित कलशों तथा इन्द्रनीलमणिके शोभाशाली खम्भोंसे उस मण्डलकी शोभा और बढ़ गयी है। उन खम्भोंमें सिन्दूरके समान रंगवाली मणियाँ सब ओर जड़ी गयी हैं तथा बीच-बीचमें लगे हुए मनोहर इन्द्रनील नामक रत्नोंसे वे मण्डित हैं। रत्नमय परकोटोंमें जटित भाँति-भाँतिके मणिरत्न उस रासमण्डलकी श्रीवृद्धि करते हैं। उसमें चारों दिशाओंकी ओर चार दरवाजे हैं, जिनमें सुन्दर किंवाड़ लगे हुए हैं। उन दरवाजोंपर रस्सियोंमें गुँथे हुए आम्रपल्लव बन्दनवारके रूपमें शोभा दे रहे हैं। वहाँ दोनों ओर झुंड-के-झुंड केलेके खम्भे आरोपित हुए हैं। श्वेतधान्य, पल्लवसमूह, फल तथा दूर्वादल आदि मङ्गलद्रव्य उस मण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमयुक्त जलका वहाँ सब ओर छिड़काव हुआ है।
मुने! रत्नमय अलंकारों तथा रत्नोंकी मालाओंसे अलंकृत करोड़ों गोपकिशोरियोंके समूहसे रासमण्डल घिरा हुआ है। वे गोपकुमारियाँ रत्नोंके बने हुए कंगन, बाजूबंद और नूपुरोंसे विभूषित हैं। रत्ननिर्मित युगल कुण्डल उनके गण्डस्थलकी शोभा बढ़ाते हैं। उनके हाथोंकी अंगुलियाँ रत्नोंकी बनी हुई अँगूठियोंसे विभूषित हो बड़ी सुन्दर दिखायी देती हैं। रत्नमय पाशकसमूहों (बिछुओं)-से उनके पैरोंकी अंगुलियाँ उद्भासित होती हैं। वे गोपकिशोरियाँ रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके मस्तक उत्तम रत्नमय मुकुटोंसे जगमगा रहे हैं। नासिकाके मध्यभागमें गजमुक्ताकी बुलाकें बड़ी शोभा दे रही हैं। उनके भालदेशमें सिन्दूरकी बेंदी लगी हुई है। साथ ही आभूषण पहननेके स्थानोंमें दिव्य आभूषण धारण करनेके कारण उनकी दिव्य प्रभा और भी उद्दीप्त हो उठी है। उनकी अङ्गकान्ति मनोहर चम्पाके समान जान पड़ती है। वे सब-की-सब चन्दन-द्रवसे चर्चित हैं। उनके अङ्गोंपर पीले रंगकी रेशमी साड़ी शोभा देती है। बिम्बफलके समान अरुण अधर उनकी मनोहरता बढ़ा रहे हैं। शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाओंकी चटकीली चाँदनी-जैसी प्रभासे सेवित मुख उनके उद्दीप्त सौन्दर्यको और भी उज्ज्वल बना रहे हैं। उनके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनमें कस्तूरी-पत्रिकासे युक्त काजलकी रेखा शोभा-वृद्धि कर रही है। उनके केशपाश प्रफुल्ल मालती-पुष्पकी मालाओंसे सुशोभित हैं, जिनपर मधुलोलुप भ्रमरोंके समूह मँडरा रहे हैं। उनकी मनोहर मन्दगति गजराजके गर्वका गंजन करनेवाली है। बाँकी भौंहोंके साथ मन्द मुसकानकी शोभासे वे मनको मोह लेती हैं। पके हुए अनारके दानोंकी भाँति चमकीली दन्तपंक्ति उनके मुखकी शोभाको