ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४६६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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और भी बालक-बालिकाएँ थीं। उस दिन नन्दजीके यहाँ आभ्युदयिक कर्मका सम्पादन हुआ था। उस अवसरपर गोपियोंको आती देख सती यशोदाने अतृप्त बालक श्रीकृष्णको शीघ्र ही शय्यापर सुला दिया और स्वयं उठकर प्रसन्नतापूर्वक उनको प्रणाम किया। इतना ही नहीं, आनन्दित हुई गोपी यशोदाने उन सबको तेल, सिन्दूर, पान, मिष्ठान्न, वस्त्र और आभूषण भी दिये। इस बीचमें मायाके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण मायासे भूखे बनकर दोनों चरण ऊपर फेंक-फेंककर रोने लगे। मुने ! उनके पास ही गोरसके मटकोंसे भरा हुआ छकड़ा खड़ा था। श्रीकृष्णका एक पैर उससे जा लगा। विश्वम्भरके पैरका आघात लगनेसे वह छकड़ा चूर-चूर हो गया। उस छकड़ेके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उसके टूटे काठ वहीं बिखर गये। उसपर लदा हुआ दही, दूध, माखन, घी और मधु धरतीपर गिरकर बह चला। यह आश्चर्य देख भयसे व्याकुल हुई गोपियाँ बालकके पास दौड़ी हुई आयीं। उन्होंने देखा छकड़ा टूट चुका है और बालक उसकी बिखरी हुई लकड़ियोंके भीतर दबा है। टूटे-फूटे मटकोंका समूह तथा बहुत-सा गोरस भी वहाँ गिरा दिखायी दिया। लकड़ियोंको दूर फेंककर भयसे व्याकुल हुई यशोदाने बालकको गोदमें उठा लिया। योगमायाकी कृपासे उसके सारे अङ्ग सुरक्षित थे। वह भूखसे व्याकुल हो रो रहा था। यशोदाजीने उसके मुखमें स्तन दे दिया और स्वयं शोकसे व्याकुल हो फूट-फूटकर रोती रहीं। गोपोंने वहाँ खेलते हुए बालकोंसे पूछा—‘छकड़ा कैसे टूटा है? इसके टूटनेका कोई कारण तो नहीं दिखायी देता है। सहसा यह अद्भुत काण्ड कैसे घटित हुआ?’ उनकी बात सुनकर सब बालक बोले—‘गोपगण! सुनो। अवश्य ही श्रीकृष्णके चरणोंका धक्का लगनेसे यह छकड़ा टूटा है।’ बालकोंकी यह बात सुनकर गोप और गोपियाँ हँसने लगीं। उन्हें उनकी बातपर विश्वास नहीं हुआ। वे बोलीं—‘बच्चोंकी बातें सत्य नहीं हैं।’ तुरंत ही श्रेष्ठ ब्राह्मण आये और उन्होंने शिशुकी रक्षाके लिये स्वस्तिवाचन किया। एक ब्राह्मणने शिशुके शरीरपर हाथ रखकर कवच पढ़ा। विप्रवर! वह समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त कवच मैं तुम्हें बता रहा हूँ। यह वही कवच है, जिसे पूर्वकालमें श्रीविष्णुके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माजीको भगवती योगमायाने दिया था। उस समय जलमें शयन करनेवाले त्रिलोकीनाथ विष्णु जलके भीतर नींद ले रहे थे और ब्रह्माजी मधु-कैटभके भयसे डरकर योगनिद्राकी स्तुति कर रहे थे। उसी अवसरपर योगनिद्राने उन्हें कवचका उपदेश दिया था।
योगनिद्रा बोली— ब्रह्मन्! तुम अपना भय दूर करो। जगत्पते! जहाँ श्रीहरि विराजमान हैं और मैं मौजूद हूँ, वहाँ तुम्हें भय किस बातका है? तुम यहाँ सुखपूर्वक रहो। श्रीहरि तुम्हारे मुखकी रक्षा करें। मधुसूदन मस्तककी, श्रीकृष्ण दोनों नेत्रोंकी तथा राधिकापति नासिकाकी रक्षा करें। माधव दोनों कानोंकी, कण्ठकी और कपालकी रक्षा करें। कपोलकी गोविन्द और केशोंकी स्वयं