ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७३
कुछ अधिक हैं। श्रीकृष्ण सदा राधाका ध्यान करते हैं और राधा भी अपने प्रियतमका निरन्तर स्मरण करती हैं। राधा श्रीकृष्णके प्राणोंसे निर्मित हुई हैं और ये श्रीकृष्ण राधाके प्राणोंसे मूर्तिमान् हुए हैं। श्रीराधाका अनुसरण करनेके लिये ही इनका गोकुलमें आगमन हुआ है। पूर्वकालमें गोलोकमें श्रीहरिने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे सार्थक बनानेके लिये कंसके भयका बहाना लेकर इनका गोकुलमें आगमन हुआ है। केवल प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये ही ये व्रजमें आये हैं। भय तो छलनामात्र है। जो भयके भी स्वामी हैं, उन्हें किससे भय हो सकता है? सामवेदमें 'राधा' शब्दकी व्युत्पत्ति बतायी गयी है। पहले नारायणदेवने अपने नाभि-कमलपर बैठे हुए ब्रह्माजीको वह व्युत्पत्ति बतायी थी। फिर ब्रह्माजीने ब्रह्मलोकमें भगवान् शंकरको उसका उपदेश दिया। नन्द ! तत्पश्चात् पूर्वकालमें कैलास-शिखरपर विराजमान महेश्वरने मुझको वह व्युत्पत्ति बतायी, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ।
'राधा' शब्दकी व्युत्पत्ति देवताओं, असुरों और मुनीन्द्रोंको भी अभीष्ट है तथा वह सबसे उत्कृष्ट एवं मोक्षदायिनी है। राधाका 'रेफ' करोड़ों जन्मोंके पाप तथा शुभाशुभ कर्मभोगसे छुटकारा दिलाता है। 'आकार' गर्भवास, मृत्यु तथा रोगको दूर करता है। 'धकार' आयुकी हानिका और 'आकार' भवबन्धनका निवारण करता है। राधा नामके श्रवण, स्मरण और कीर्तनसे उक्त सारे दोषोंका नाश हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। राधा नामका 'रेफ' श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें निश्चल भक्ति तथा दास्य प्रदान करता है। 'आकार' सर्ववाञ्छित, सदानन्दस्वरूप, सम्पूर्ण सिद्धसमुदायरूप एवं ईश्वरकी प्राप्ति कराता है। 'धकार' श्रीहरिके साथ उन्हींकी भाँति अनन्त कालतक सहवासका सुख, समान ऐश्वर्य, सारूप्य तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करता है। 'आकार' श्रीहरिकी भाँति तेजोराशि, दानशक्ति, योगशक्ति, योगमति तथा सर्वदा श्रीहरिकी स्मृतिका अवसर देता है। श्रीराधा नामके श्रवण, स्मरण और कीर्तनका सुयोग मिलनेसे मोहजाल, पाप, रोग, शोक, मृत्यु और यमराज सभी काँप उठते हैं; इसमें संशय नहीं है*।
श्रीराधा-माधवके नामकी यत्किञ्चित् व्याख्या जो गुरु-मुखसे सुनी थी, वह मैंने यथाज्ञान यहाँ बतायी है। इन नामोंकी सम्पूर्णरूपसे व्याख्या करनेमें मैं असमर्थ हूँ। नन्द ! यहाँ पास ही वृन्दावनमें श्रीराधा और माधवका विवाह होगा। साक्षात् जगत्स्रष्टा ब्रह्मा पुरोहित हो अग्निदेवको साक्षी बनाकर प्रसन्नतापूर्वक यह वैवाहिक कार्य सम्पन्न करेंगे। श्रीकृष्णके द्वारा जो बाललीलाएँ होनेवाली हैं, उसमेंसे मुख्यतः ये हैं—कुबेरपुत्रका उद्धार, गोपियोंके घरोंसे माखन चुराकर उसका भक्षण, तालवनमें तालफलका भोजन और धेनुकासुरका वध, बकासुर, केशी और प्रलम्बासुरका खेल-खेलमें ही विनाश, द्विजपत्नियोंका उद्धार, उनके दिये हुए मिष्टान्न और पानका भोजन,
* रेफो हि कोटिजन्माघं कर्मभोगं शुभाशुभम् ॥
आकारो गर्भवासं च मृत्युं च रोगमुत्सृजेत् । धकार आयुषो हानिमाकारो भवबन्धनम् ॥
श्रवणस्मरणोक्तिभ्यः प्रणश्यति न संशयः । रेफो हि निश्चलां भक्तिं दास्यं कृष्णपदाम्बुजे ॥
सर्वेप्सितं सदानन्दं सर्वसिद्धौघमीश्वरम् । धकारः सहवासं च तत्तुल्यकालमेव च ॥
ददाति सार्टिसारूप्यं तत्त्वज्ञानं हरेः समम् । आकारस्तेजसां राशिं दानशक्तिं हरौ यथा ॥
योगशक्तिं योगमतिं सर्वकालं हरिस्मृतिम् । श्रुत्युक्तिस्मरणाद्योगान्मोहजालं च किल्बिषम् ॥
रोगशोकमृत्युयमा वेपन्ते नात्र संशयः। (१३। १०५—१११)