ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मेरे मुँहसे सुनो। ये जब गर्भमें थे, उस समय उस गर्भका संकर्षण किया गया था; इसलिये इनका नाम 'संकर्षण' हुआ। वेदोंमें यह कहा गया है कि इनका कभी अन्त नहीं होता; इसलिये ये 'अनन्त' कहे गये हैं। इनमें बलकी अधिकता है; इसलिये इनको 'बलदेव' कहते हैं। हल धारण करनेसे इनका नाम 'हली' हुआ है। नील रंगका वस्त्र धारण करनेसे इन्हें 'शितिवासा' (नीलाम्बर) कहा गया है। ये मूसलको आयुध बनाकर रखते हैं; इसलिये 'मुसली' कहे गये हैं। रेवतीके साथ इनका विवाह होगा; इसलिये ये साक्षात् 'रेवतीरमण' हैं। रोहिणीके गर्भमें वास करनेसे इन महाबुद्धिमान् संकर्षणको 'रौहिणेय' कहा गया है। इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्रका नाम जैसा मैंने सुना था, वैसा बताया है। नन्द! अब मैं अपने घरको जाऊँगा। तुम अपने भवनमें सुखपूर्वक रहो।
ब्राह्मणकी यह बात सुनकर नन्दजी स्तब्ध रह गये। नन्दपत्नी भी निश्चेष्ट हो गयीं और वह बालक स्वयं हँसने लगा। तब नन्दने गर्गजीको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ लिये और भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक कहा।
नन्द बोले- ब्रह्मन्! यदि आप चले गये तो कौन महात्मा इस कर्मको करायेंगे; अतः आप स्वयं ही शुभ-दृष्टि करके इन बालकोंका नामकरण एवं अन्नप्राशन-संस्कार कराइये। राधा-बन्धुसे लेकर राधाप्राणाधिकतक जो नाम-समूह बताये गये हैं, उनमें जो राधा नाम आया है, वह राधा कौन है और किसकी पुत्री है?
नन्दकी यह बात सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे और बोले-'यह परम निगूढ़ तत्त्व एवं रहस्यकी बात है, जिसे तुम्हें बताऊँगा।'
श्रीगर्गजी बोले-नन्द! सुनो। मैं पुरातन इतिहास बता रहा हूँ। यह वृत्तान्त पहले गोलोकमें घटित हुआ था। उसे मैंने भगवान् शंकरके मुखसे सुना है। किसी समय गोलोकमें श्रीदामाका राधाके साथ लीलाप्रेरित कलह हो गया। उस कलहके कारण श्रीदामाके शापसे लीलावश गोपी राधाको गोकुलमें आना पड़ा है। इस समय वे वृषभानु गोपकी बेटी हैं और कलावती उनकी माता हैं। राधा श्रीकृष्णके अर्द्धाङ्गसे प्रकट हुई हैं और वे अपने स्वामीके अनुरूप ही परम सुन्दरी सती हैं। ये राधा गोलोकवासिनी हैं; परंतु इस समय श्रीकृष्णकी आज्ञासे यहाँ अयोनिसम्भवा होकर प्रकट हुई हैं। ये ही देवी मूल-प्रकृति ईश्वरी हैं। इन सती-साध्वी राधाने मायासे माताके गर्भको वायुपूर्ण करके वायुके निकलनेके समय स्वयं शिशु-विग्रह धारण कर लिया। ये साक्षात् कृष्ण-माया हैं और श्रीकृष्णके आदेशसे पृथ्वीपर प्रकट हुई हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला बढ़ती है, उसी प्रकार व्रजमें राधा बढ़ रही हैं। श्रीकृष्णके तेजके आधे भागसे वे मूर्तिमती हुई हैं। एक ही मूर्ति दो रूपोंमें विभक्त हो गयी है। इस भेदका निरूपण वेदमें किया गया है। ये स्त्री हैं, वे पुरुष हैं, किंवा वे ही स्त्री हैं और ये पुरुष हैं। इसका स्पष्टीकरण नहीं हो पाता। दो रूप हैं और दोनों ही स्वरूप, गुण एवं तेजकी दृष्टिसे समान हैं। पराक्रम, बुद्धि, ज्ञान और सम्पत्तिकी दृष्टिसे भी उनमें न्यूनता अथवा अधिकता नहीं है। किंतु वे गोलोकसे यहाँ पहले आयी हैं; इसलिये अवस्थामें श्रीकृष्णसे
राधाबन्धू राधिकात्मा राधिकाजीवनः स्वयं। राधिकासहचारी च राधामानसपूरकः॥
राधाधनो राधिकाङ्गो राधिकासक्तमानसः। राधाप्राणो राधिकेशो राधिकारमणः स्वयम्॥
राधिकाचित्तचौरश्च राधाप्राणाधिकः प्रभुः। परिपूर्णतमं ब्रह्म गोविन्दो गरुडध्वजः॥
नामान्येतानि कृष्णस्य श्रुतानि साम्प्रतं व्रज। जन्ममृत्युहराण्येव रक्ष नन्द शुभक्षणे॥
(१३।७५–८०)