ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड | ४७१
अर्थ है कर्मोंका निर्मूलन, 'ण' का अर्थ है दास्यभाव और 'अकार' प्राप्तिका बोधक है। वे कर्मोंका समूल नाश करके भक्तिकी प्राप्ति कराते हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। नन्द! भगवान्के अन्य करोड़ों नामोंका स्मरण करनेपर जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह सब केवल 'कृष्ण' नामका स्मरण करनेसे मनुष्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। 'कृष्ण' नामके स्मरणका जैसा पुण्य है, उसके कीर्तन और श्रवणसे भी वैसा ही पुण्य होता है। श्रीकृष्णके कीर्तन, श्रवण और स्मरण आदिसे मनुष्यके करोड़ों जन्मोंके पापका नाश हो जाता है। भगवान् विष्णुके सब नामोंमें 'कृष्ण' नाम ही सबकी अपेक्षा सारतम वस्तु और परात्पर तत्त्व है। 'कृष्ण' नाम अत्यन्त मङ्गलमय, सुन्दर तथा भक्तिदायक है$^१$।
'ककार' के उच्चारणसे भक्त पुरुष जन्म-मृत्युका नाश करनेवाले कैवल्य मोक्षको प्राप्त कर लेता है। 'ऋकार' के उच्चारणसे भगवान्का अनुपम दास्यभाव प्राप्त होता है। 'षकार' के उच्चारणसे उनकी मनोवाञ्छित भक्ति सुलभ होती है। 'णकार' के उच्चारणसे तत्काल ही उनके साथ निवासका सौभाग्य प्राप्त होता है और विसर्गके उच्चारणसे उनके सारूप्यकी उपलब्धि होती है, इसमें संशय नहीं है। 'ककार' का उच्चारण होते ही यमदूत काँपने लगते हैं। 'ऋकार' का उच्चारण होनेपर वे ठहर जाते हैं, आगे नहीं बढ़ते। 'षकार' के उच्चारणसे पातक, 'णकार' के उच्चारणसे रोग तथा 'अकार' के उच्चारणसे मृत्यु—ये सब निश्चय ही भाग खड़े होते हैं; क्योंकि वे नामोच्चारणसे डरते हैं। व्रजेश्वर! श्रीकृष्ण-नामके स्मरण, कीर्तन और श्रवणके लिये उद्योग करते ही श्रीकृष्णके किंकर गोलोकसे विमान लेकर दौड़ पड़ते हैं। विद्वान् लोग शायद भूतलके धूलिकणोंकी गणना कर सकें; परंतु नामके प्रभावकी गणना करनेमें संतपुरुष भी समर्थ नहीं हैं। पूर्वकालमें भगवान् शंकरके मुखसे मैंने इस 'कृष्ण' नामकी महिमा सुनी थी। मेरे गुरु भगवान् शंकर ही श्रीकृष्णके गुणों और नामोंका प्रभाव कुछ-कुछ जानते हैं। ब्रह्मा, अनन्त, धर्म, देवता, ऋषि, मनु, मानव, वेद और संतपुरुष श्रीकृष्ण-नाम-महिमाकी सोलहवीं कलाको भी नहीं जानते हैं।
नन्द! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पुत्रकी महिमाका अपनी बुद्धि और ज्ञानके अनुसार वर्णन किया है। इसे मैंने गुरुजीके मुखसे सुना था। कृष्ण, पीताम्बर, कंसध्वंसी, विष्टरश्रवा, देवकीनन्दन, श्रीश, यशोदानन्दन, हरि, सनातन, अच्युत, विष्णु, सर्वेश, सर्वरूपधृक्, सर्वाधार, सर्वगति, सर्वकारणकारण, राधाबन्धु, राधिकात्मा, राधिकाजीवन, रािकासहचरी, राधामानसपूरक, राधाधन, राधिकाङ्ग, रािकासक्त-मानस, राधाप्राण, राधिकेश, राधिकारमण, राधिकाचित्तचोर, राधाप्राणाधिक, प्रभु, परिपूर्णतम, ब्रह्म, गोविन्द और गरुडध्वज—नन्द! ये श्रीकृष्णके नाम जो तुमने मेरे मुखसे सुने हैं, हृदयमें धारण करो। शुभेक्षण! ये नाम जन्म तथा मृत्युके कष्टको हर लेनेवाले हैं। तुम्हारे कनिष्ठ पुत्रके नामोंका महत्त्व जैसा मैंने सुना था, वैसा यहाँ बताया है$^२$। अब ज्येष्ठ पुत्र हलधरके नामका संकेत
१. नाम्नां भगवतो नन्द कोटीनां स्मरणेन यत् । तत्फलं लभते नूनं कृष्णेति स्मरणान्नरः॥
यद्द्विधं स्मरणे पुण्यं वचनाच्छ्रवणात् तथा। कोटिजन्मांहसां नाशो भवेद् यत्स्मरणादिकात् ॥
विष्णोर्नाम्नां च सर्वेषां सर्वात् सारंपरात्परम्। कृष्णेति मङ्गलं नाम सुन्दरं भक्तिदायकम्॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड १३। ६३–६५)
२. कृष्णः पीताम्बरः कंसध्वंसी च विष्टरश्रवाः। देवकीनन्दनः श्रीशो यशोदानन्दो हरिः॥
सनातनोऽच्युतो विष्णुः सर्वेशः सर्वरूपधृक् । सर्वाधारः सर्वगतिः सर्वकारणकारणः॥