ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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समूह यथास्थान रखे गये थे। वहाँ नाना प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ और मनोहर वाद्य बज रहे थे। ढक्का, दुन्दुभि, पटह, मृदङ्ग, मुरज, आनकसमूह, वंशी, ढोल और झाँझ आदिके शब्द हो रहे थे। विद्याधरियोंके नृत्य, भाव-भंगी तथा भ्रमणसे नन्दप्राङ्गणकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसके साथ ही गन्धर्वराजोंके मूर्छनायुक्त संगीत तथा स्वर्ण-सिंहासनों एवं रथोंके सम्मिलित शब्द वहाँ गूँज रहे थे।
इसी समय संदेशवाहकने प्रसन्नतापूर्वक आकर नन्दरायजीसे कहा—'प्रभो! आपके भाई-बन्धु गोपराज एवं गोपगण पधारे हैं। उनमेंसे कुछ लोग घोड़ोंपर चढ़कर आये हैं, कुछ हाथियोंपर सवार हैं और कितने ही रथोंपर आरूढ़ हो शीघ्रतापूर्वक पधारे हैं। रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित कितने ही राजपुत्रोंका भी यहाँ शुभागमन हुआ है। पत्नी और सेवकोंसहित गिरिभानुजी पधारे हैं। उनके साथ चार-चार लाख रथ और हाथी हैं। घोड़े और शिविकाओंकी संख्या एक-एक करोड़ है। ऋषीन्द्र, मुनीन्द्र, विद्वान्, ब्राह्मण, बन्दीजन और भिक्षुकोंके समूह भी निकट आ गये हैं। गोप और गोपियोंकी गणना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? आप स्वयं बाहर चलकर देखें।'
आँगनमें खड़े हुए दूतने जब ऐसी बात कही, तब उसे सुनकर व्रजराज नन्दजी स्वयं उन समागत अतिथियोंके पास आये। उन सबको साथ ले आकर उन्होंने आँगनमें बिठाया और तत्काल ही उनका पूजन किया। ऋषि आदिके समुदायको उन्होंने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया और एकाग्रचित्त हो उन सबके लिये पाद्य आदि समर्पित किये। उस समय नन्दगोकुल विभिन्न प्रकारकी वस्तुओं तथा गोपबन्धुओंसे परिपूर्ण हो रहा था। वहाँ कोई किसीके शब्दको नहीं सुन सकता था। साक्षात् कुबेरने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये वहाँ तीन मुहूर्ततक सुवर्णकी वर्षा करके गोकुलको सोनेसे भर दिया। नन्दकी यह सम्पत्ति देखकर उनके सभी भाई-बन्धु लज्जासे नतमस्तक हो गये। उन्होंने अपने कौतूहलको छिपा लिया। नन्दजीने नित्यकर्म करके पवित्र हो दो धुले वस्त्र धारण किये। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे अपने ललाट आदि अङ्गोंमें तिलक किया। इसके बाद गर्गजी तथा मुनीश्वरोंकी आज्ञा ले व्रजेश्वर नन्द दोनों पैर धोकर सोनेके मनोहर पीढ़ीपर बैठे। उन्होंने श्रीविष्णुका स्मरण करके आचमन किया। फिर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर वेदोक्त कर्मका सम्पादन करनेके अनन्तर बालकको भोजन कराया। आनन्दमग्न हुए नन्दजीने मुनिवर गर्गके कथनानुसार शुभ बेलामें बालकका मङ्गलमय नाम रखा—'कृष्ण'। इस प्रकार जगदीश्वरको सघृत भोजन कराकर उनका नामकरण करनेके अनन्तर नन्दरायने बाजे बजवाये और मङ्गल-कृत्य करवाये। उन्होंने ब्राह्मणोंको प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकारके सुवर्ण, भाँति-भाँतिके धन, भक्ष्य पदार्थ और वस्त्र दिये। बन्दीजनों और भिक्षुकोंको इतनी अधिक मात्रामें उन्होंने सुवर्ण बाँटा कि सुवर्णके भारी भारसे आक्रान्त होनेके कारण वे सब-के-सब चल नहीं पाते थे। ब्राह्मणों, बन्धुजनों और विशेषतः भिक्षुकोंको भी उन्होंने पूर्णतया मनोहर मिष्टान्नका भोजन कराया। उस समय नन्दगोकुलमें बड़े जोर-जोरसे निरन्तर यही शब्द सुनायी देता था कि 'दो और दो।' 'खाओ-खाओ'। परिपूर्ण रत्न, वस्त्र, आभूषण, मूँगे, सुवर्ण, मणिसार तथा विश्वकर्माके बनाये हुए मनोहर सुवर्णपात्र वहाँ ब्राह्मणोंको बाँटे गये। व्रजराज नन्दने गर्गजीके पास जाकर विनयपूर्वक अपनी इच्छा प्रकट की और नम्रतापूर्वक उनके शिष्योंको तथा शेष द्विजोंको सुवर्णके अनेक भार पूर्ण मात्रामें प्रदान किये।
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! श्रीहरिको