भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५२६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मध्या नाड़ीके पास ले आये। उस वायुको घुमाकर विधाताने मध्या नाड़ीके साथ संयुक्त कर दिया। ऐसा करके वे निष्पन्द (निश्चल) हो गये और पूर्वकालमें श्रीहरिने जिसका उपदेश दिया था, उस परम उत्तम दशाक्षर-मन्त्रका जप करने लगे। मुने! श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका ध्यान करते हुए एक मुहूर्ततक जप करनेके पश्चात् ब्रह्माने अपने हृदयकमलमें उनके सर्वतेजोमय स्वरूपको देखा। उस तेजके भीतर अत्यन्त मनोरम रूप था, दो भुजाएँ, हाथमें मुरली और पीताम्बरभूषित श्रीअङ्ग। कानोंके मूलभागमें पहने गये मकराकृति कुण्डल अपनी उज्ज्वल आभा बिखेर रहे थे। प्रसन्न मुखारविन्दपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। भगवान् भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। ब्रह्माजीने ब्रह्मरन्ध्रमें जिस रूपको देखा और हृदयकमलमें जिसकी झाँकी की, वही रूप बाहर भी दृष्टिगोचर हुआ। वह परम आश्चर्य देखकर उन्होंने उन परमेश्वरकी स्तुति की। मुने! पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले श्रीहरिने ब्रह्माजीको जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, उसीके द्वारा विधाताने भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर उन परमेश्वरका विधिवत् स्तवन किया।

ब्रह्माजी बोले— जो सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, समस्त कारणोंके भी कारण तथा सबके लिये अनिर्वचनीय हैं; उन कल्याणस्वरूप श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका श्रीविग्रह नवीन मेघमालाके समान श्याम एवं सुन्दर है, जो सम्पूर्ण जीवोंमें स्थित रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होते, जो साक्षीस्वरूप हैं, स्वात्माराम, पूर्णकाम, विश्वव्यापी, विश्वसे परे, सर्वस्वरूप, सबके बीजरूप और सनातन हैं; जो सर्वाधार, सबमें विचरनेवाले, सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वाराध्य, सर्वगुरु तथा सर्वमङ्गलकारण हैं। सम्पूर्ण मन्त्र जिनके स्वरूप हैं, जो समस्त सम्पदाओंकी प्राप्ति करानेवाले और श्रेष्ठ हैं; जिनमें शक्तिका संयोग और वियोग भी है; उन स्वेच्छामय प्रभुकी मैं स्तुति करता हूँ। जो शक्तिके स्वामी, शक्तिके बीज, शक्तिरूपधारी तथा घोर संसारसागरमें शक्तिमयी नौकासे युक्त हैं; उन भक्तवत्सल कृपालु कर्णधारको मैं नमस्कार करता हूँ। जो आत्मस्वरूप, एकान्तमय, लिप्त, निर्लिप्त, सगुण और निर्गुण ब्रह्म हैं; उन स्वेच्छामय परमात्माकी मैं स्तुति करता हूँ। जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अधिदेवता, आवासस्थान और सर्वेन्द्रिय-स्वरूप हैं; उन विराट् परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो वेद, वेदोंके जनक तथा सर्ववेदाङ्गस्वरूप हैं; उन सर्वमन्त्रमय परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सारसे सारतर द्रव्य, अपूर्व, अनिर्वचनीय, स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र हैं; उन यशोदानन्दनका मैं भजन करता हूँ। जो सम्पूर्ण शरीरोंमें शान्तरूपसे विद्यमान हैं, किसीके दृष्टिपथमें नहीं आते, तर्कके अविषय हैं, ध्यानसे वशमें होनेवाले नहीं हैं तथा नित्य विद्यमान हैं; उन योगीन्द्रोंके भी गुरु गोविन्दका मैं भजन करता हूँ। जो रासमण्डलके मध्यभागमें विराजमान होते हैं, रासोल्लासके लिये सदा उत्सुक रहते हैं तथा गोपाङ्गनाएँ सदा जिनकी सेवा करती हैं; उन राधावल्लभको मैं नमस्कार करता हूँ। जो साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें सदैव सत् और असाधु पुरुषोंके मतमें सदा ही असत् हैं, भगवान् शिव जिनकी सेवा करते हैं; उन योगसाध्य योगीश्वर श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मन्त्रबीज, मन्त्रराज, मन्त्रदाता, फलदाता, फलरूप, मन्त्रसिद्धिस্বরূপ तथा परात्पर हैं; उन श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सुख-दुःख, सुखद-दुःखद, पुण्य, पुण्यदायक, शुभद और शुभ बीज हैं; उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ।

इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजीने गौओं और बालकोंको लौटा दिया तथा पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर रोते हुए प्रणाम किया। मुने! तदनन्तर जगत्स्रष्टाने आँखें खोलकर श्रीहरिके दर्शन किये। जो ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस