भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 538

५२८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पाक करने लगे। रत्नदीपोंकी तथा धूपकी जगमगाहट और सुगन्धि चारों ओर फैल गयी। पुष्पमालाओंसे स्थान सुसज्जित हो गये। भाँति- भाँतिकी मिठाई, पक्वान्न, मीठे फल, हजारों- लाखों घड़े दूध, दही, घृत, मधु, मक्खन आदि इकट्ठे हो गये। सुरीले बाजे बजने लगे। नाना प्रकारके सोने-चाँदीके पात्र, श्रेष्ठ वस्त्र, आभूषण, स्वर्णपीठ आदि लाये गये। सभी चीजें अगणित थीं। नृत्यगीत होने लगे। दीप्तिसे ऐसा दमक रहा था, मानो शरद्-ऋतुका प्रफुल्ल कमल सूर्यदेवकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा हो। जगदीश्वर श्रीकृष्ण उनके बीचमें रत्नमय सिंहासनपर बैठे, मानो शरत्कालके चन्द्रमा तारामण्डलके बीचमें भासमान हो रहे हों। वह महोत्सव देखकर नीतिशास्त्रविशारद श्रीहरिने पितासे तत्काल ऐसी नीतिपूर्ण बात कही, जो अन्य सब लोगोंके लिये दुर्लभ थी। श्रीकृष्ण बोले-उत्तम व्रतका पालन करनेवाले गोपसम्राट् ! आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? आपके आराध्य देवता कौन हैं ? इस पूजाका क्या स्वरूप है और इस प्रकार पूजन करनेपर कौन-सा फल इसी बीच बलशाली बलराम तथा ग्वाल- बालोंके साथ साक्षात् श्रीहरि शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये। उन्हें देखकर सब लोग हर्षसे खिल उठे और उठकर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण क्रीडास्थानसे लौटकर आ रहे थे। उनका शान्त सुन्दर विग्रह बड़ा मनोहर था। विनोदकी साधनभूत मुरली, वेणु और शृङ्ग नामक वाद्योंकी ध्वनि उनके साथ सुनायी देती थी। रत्नोंके सार-तत्त्वसे निर्मित आभूषणों तथा कौस्तुभमणिसे वे विभूषित थे। उनका श्याम मनोहर शरीर अगुरु एवं चन्दनपङ्कसे चर्चित था। वे रत्नमय दर्पणमें शरद्-ऋतुके मध्याह्नकालमें प्रफुल्ल कमलके समान अपने मनोहर मुखको देख रहे थे। भालदेशमें कस्तूरीकी बेंदीके साथ पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर चन्दन लगा था। इससे उनका ललाट चन्द्रदेवसे अलंकृत आकाशकी भाँति शोभा पा रहा था। श्याम कण्ठ और वक्षःस्थल मालतीकी मालासे उज्ज्वल कान्ति धारण कर रहा था, मानो अत्यन्त निर्मल शरत्कालिक आकाश बगुलोंकी पंक्तिसे अलंकृत हुआ हो। मनोहर पीताम्बरसे उनके श्याम विग्रहकी अनुपम शोभा हो रही थी, मानो नवीन मेघ विद्युत्की कान्तिसे निरन्तर उद्भासित हो रहा हो। मस्तकपर एक ओर झुका हुआ टेढ़ा मोरमुकुट कुन्दके फूलों और गुञ्जाओंकी मालासे आबद्ध था, मानो आकाश नक्षत्रों तथा इन्द्र-धनुषसे सुशोभित हो रहा हो। उनका मुस्कराता हुआ मुख रत्नमय कुण्डलोंकी प्राप्त होता है ? इस फलसे कौन-सा साधन सुलभ होता है और उस साधनसे भी कौन-सा मनोरथ सिद्ध होता है? यदि पूजामें भी विघ्न पड़ जाय और देवता रुष्ट हो जायें तो क्या होता है? अथवा यदि देवता संतुष्ट हों तो वे इहलोक और परलोकमें कौन-सा फल देते हैं ? विप्ररूपधारी श्रीहरि नैवेद्यको साक्षात् ग्रहण करते हैं; अतः ब्राह्मणके संतुष्ट होनेपर सब देवता संतुष्ट हो जाते हैं। जो ब्राह्मणके पूजनमें लगा