ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५५१
पार्वती, धर्म, इन्द्र, रुद्र, दिक्पाल, ग्रह, मुनिगण, अत्रि, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्षद तथा नर्तकगण आये और सबने दुर्वासाके अपराधको क्षमा करके उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णुसे करुण-प्रार्थना की।
[ तब ] श्रीभगवान् बोले—आप सब लोग मेरा नीतियुक्त और सुखदायक वचन सुनें। मैं आपकी आज्ञासे ब्राह्मणकी रक्षा अवश्य करूँगा; किंतु ये मुनि वैकुण्ठलोकसे पुनः राजा अम्बरीषके घर जायँ और उनकी प्रसन्नताके लिये वहीं पारणा करें। ये ब्रह्मर्षि अम्बरीषके अतिथि होकर भी बिना किसी अपराधके उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गये। इसलिये अपने रक्षणीय राजाकी रक्षाके लिये सुदर्शनचक्र इन ब्राह्मणदेवताको ही मार डालनेके लिये उद्यत हो गया। इन्हें भयभीत होकर भागते हुए आज पूरा एक वर्ष हो गया। तभीसे इनके लिये शोकग्रस्त हुए महाराज अम्बरीष अपनी पत्नीसहित उपवास कर रहे हैं। भक्तके उपवास करनेके कारण मैं भी उपवास करता हूँ। जैसे माता दूध-पीते बच्चेको उपवास करते देख स्वयं भी भोजन नहीं करती, वही दशा मेरी है। मेरे आशीर्वादसे मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा शीघ्र ही संतापमुक्त हो जायँगे। मार्गमें मेरा चक्र इनकी हिंसा नहीं करेगा। इनके भोजन करनेसे मेरा भक्त भोजन करेगा और तभी मैं भी आज निश्चिन्त होकर सुखसे भोजन करूँगा; यह निश्चित बात है। भक्तके द्वारा प्रीतिपूर्वक जो वस्तु मुझे दी जाती है, उसे मैं अमृतके समान मधुर मानकर ग्रहण करता हूँ। लक्ष्मीके हाथसे परोसे गये पदार्थको भी भक्तके दिये बिना मैं नहीं खा सकता। जिस पदार्थको भक्तने नहीं दिया, वह मुझे तृप्ति नहीं दे सकता। वत्स! महाप्राज्ञ मुनीन्द्र! तुम राजा अम्बरीषके घर जाओ तथा ये सब देवता, देवियाँ और मुनि अपने-अपने घरको पधारें।
ऐसा कहकर श्रीहरि तुरंत ही अपने अन्तःपुरमें चले गये तथा अन्य सब लोग उन जगदीश्वरको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट गये। मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले ब्राह्मण दुर्वासा राजा अम्बरीषके घरको गये। साथ ही करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान सुदर्शनचक्र भी गया। एक वर्षतक उपवास करनेके बाद राजाके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। वे सिंहासनपर बैठे हुए थे। उसी समय उन्होंने मुनिवर दुर्वासाको सामने देखा। देखते ही वे बड़े वेगसे उठे और तत्काल उनके चरणोंमें प्रणाम करके सादर भोजनके लिये ले गये। राजाने मुनिको स्वादिष्ट अन्न भोजन कराकर फिर स्वयं भी अन्न ग्रहण किया। भोजन करके संतुष्ट हुए द्विजश्रेष्ठ दुर्वासाने उन्हें उत्तम आशीर्वाद दिया। बारंबार उनकी प्रशंसा की। तदनन्तर उन्होंने शीघ्र ही अपने आश्रमको प्रस्थान किया। मार्गमें वे विप्रवर आश्चर्यचकित हो मन-ही-मन कहने लगे—'अहो! वैष्णवोंका माहात्म्य दुर्लभ है।'
(अध्याय २५)