ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 569, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५५९ प्रेमके आँसू उमड़ आये और वे भावातिरेकसे उन गुणातीत प्राणेश्वरकी स्तुति करने लगीं। राधिका बोलीं- गोलोकनाथ ! गोपीश्वर ! मेरे स्वामिन् ! प्राणवल्लभ ! दीनबन्धो ! दीनेश्वर ! सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। गोपेश्वर ! गोसमुदायके ईश्वर ! यशोदानन्दवर्धन ! नन्दात्मज ! सदानन्द ! नित्यानन्द ! आपको नमस्कार है। इन्द्रके क्रोधको भङ्ग (व्यर्थ) करनेवाले गोविन्द ! आपने ब्रह्माजीके दर्पका भी दलन किया है। कालियदमन ! प्राणनाथ ! श्रीकृष्ण ! आपको नमस्कार है। शिव और अनन्तके भी ईश्वर ! ब्रह्मा और ब्राह्मणोंके ईश्वर ! परात्पर ! ब्रह्मस्वरूप ! ब्रह्मज्ञ ! ब्रह्मबीज ! आपको नमस्कार है। चराचर जगत्रूपी वृक्षके बीज ! गुणातीत ! गुणस्वरूप ! गुणबीज ! गुणाधार ! गुणेश्वर ! आपको नमस्कार है। प्रभो ! आप अणिमा आदि सिद्धियोंके स्वामी हैं। सिद्धिकी भी सिद्धिरूप हैं। तपस्विन् ! आप ही तप हैं और आप ही तपस्याके बीज; आपको नमस्कार है। जो अनिर्वचनीय अथवा निर्वचनीय वस्तु है, वह सब आपका ही स्वरूप है। आप ही उन दोनोंके बीज हैं। सर्वबीजरूप प्रभो ! आपको नमस्कार है। मैं, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, गङ्गा और वेदमाता सावित्री-ये सब देवियाँ जिनके चरणारविन्दोंकी अर्चनासे नित्य पूजनीया हुई हैं; उन आप परमेश्वरको बारंबार नमस्कार है। जिनके सेवकोंके स्पर्श और निरन्तर ध्यानसे तीर्थ पवित्र होते हैं; उन भगवान्को मेरा नमस्कार है। यों कहकर सती देवी राधिका अपने शरीरको जलमें और मन-प्राणोंको श्रीकृष्णमें स्थापित करके ठूँठे काठके समान अविचल- भावसे स्थित हो गयीं। श्रीराधाद्वारा किये गये श्रीहरिके इस स्तोत्रका जो मनुष्य तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीहरिकी भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है तथा उसे निश्चय ही श्रीराधाकी गति सुलभ होती है। * जो विपत्तिमें भक्तिभावसे इसका पाठ करता है, उसे शीघ्र ही सम्पत्ति प्राप्त होती है और चिरकालका खोया हुआ नष्ट द्रव्य भी उपलब्ध हो जाता है। यदि कुमारी कन्या भक्तिभावसे एक वर्षतक प्रतिदिन इस स्तोत्रको सुने तो निश्चय ही उसे श्रीकृष्णके समान कमनीय कान्तिवाला गुणवान् पति प्राप्त होता है। जलमें स्थित हुई राधिकाने श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका ध्यान एवं स्तुति करनेके पश्चात् जब आँखें खोलकर देखा तो उन्हें सारा जगत् श्रीकृष्णमय दिखायी दिया। मुने ! तदनन्तर उन्होंने यमुना तटको वस्त्रों और द्रव्योंसे सम्पन्न देखा। देखकर राधाने इसे तन्द्रा अथवा स्वप्नका विकार
- गोलोकनाथ गोपीश मदीश प्राणवल्लभ। हे दीनबन्धो दीनेश सर्वेश्वर नमोऽस्तु ते॥ गोपेश गोसमूहेश यशोदानन्दवर्धन। नन्दात्मज सदानन्द नित्यानन्द नमोऽस्तु ते॥ शतमन्योर्मन्युभङ्ग ब्रह्मदर्पविनाशक। कालीयदमन प्राणनाथ कृष्ण नमोऽस्तु ते॥ शिवानन्तेश ब्रह्मेश ब्राह्मणेश परात्पर। ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मज्ञ ब्रह्मबीज नमोऽस्तु ते॥ चराचरतरोर्बीज गुणातीत गुणात्मक। गुणबीज गुणाधार गुणेश्वर नमोऽस्तु ते॥ अणिमादिकसिद्धीश सिद्धेः सिद्धिस্বরূপक। तपस्तपस्विंस्तपसां बीजरूप नमोऽस्तु ते॥ यदनिर्वचनीयं च वस्तु निर्वचनीयकम्। तत्स्वरूप तयोर्बीज सर्वबीज नमोऽस्तु ते॥ अहं सरस्वती लक्ष्मीर्दुर्गा गङ्गा श्रुतिप्रसूः। यस्य पादार्चनान्नित्यं पूज्या तस्मै नमो नमः॥ स्पर्शने यस्य भृत्यानां ध्यानेन च दिवानिशम्। पवित्राणि च तीर्थानि तस्मै भगवते नमः॥ इत्येवमुक्त्वा सा देवी जले संन्यस्य विग्रहम्। मनः प्राणांश्च श्रीकृष्णे तस्थौ स्थाणुसमा सती॥ राधाकृतं हरेः स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। हरिभक्तिं च दास्यं च लभेद्राधागतिं ध्रुवम्॥ (२७।१००-११०)